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- विशेष : मोहर्रम : बातिल के अंधेरों में रोशनी की किरण : करबला की 10 दिन की वह दास्तान, जो इंसानियत, सब्र और सच्चाई का पैगाम बन गई – नुरूस्सबाह ‘सबा’
विशेष : मोहर्रम : बातिल के अंधेरों में रोशनी की किरण : करबला की 10 दिन की वह दास्तान, जो इंसानियत, सब्र और सच्चाई का पैगाम बन गई – नुरूस्सबाह ‘सबा’

मोहर्रम : इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना नई शुरुआत का प्रतीक नहीं बल्कि एक महान बलिदान की याद है। यह महीना इमाम हुसैन (अलैहिस्सलाम) की कुर्बानी की गूंज है, जिन्होंने करबला के तपते रेगिस्तान में अन्याय के खिलाफ अपने प्राण न्यौछावर कर दिए।
सन 680 ई. (10 अक्टूबर) को करबला (वर्तमान इराक) में एक ऐतिहासिक टकराव हुआ। यज़ीद, जो इस्लामी सत्ता पर काबिज हो चुका था, चाहता था कि इमाम हुसैन उसकी बैअत करें और उसको अपना ख़लीफ़ा बनाएं तो वो उनकी इज़्ज़त करेगा और उनकी जान बख़्श देगा लेकिन इमाम ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “एक ज़ालिम और भ्रष्ट शासक की बैअत करना इस्लाम की आत्मा के विरुद्ध है।”
उन्होंने कहा मुझ जैसा तुझ जैसे की
बैअत कभी नही करेगा ।लेकिन कूफ़ी जो पहले यज़ीद के ख़िलाफ़ थे
उन्होंने उनको लगातार पत्र
लिखकर ये प्रस्ताव रखा के वो आपसे बैअत करेंगे, और आपको अपना इमाम बनाएंगे।
आपने पहले मुस्लिम बिन अक़ील जो आपके चचेरे भाई थे उनको कूफ़ा भेजा के वहां के हालात कैसे हैं पता करो और जब वो वहां गए तो 18000 कूफ़ियों ने उनकी बैअत स्वीकार की मुस्लिम बिन अक़ील ने इमाम हुसैन को चिट्ठी लिखी के कूफ़े के हालात बिल्कुल ठीक हैं आप यहां आ सकते हो और उस बीच कुफ़ियों ने यज़ीद के डर से उनके साथ ग़द्दारी की, मुस्लिम बिन अक़ील का क़त्ल कर दिया और उधर इमाम हुसैन जो की हज की नीयत से मक्का गए थे वो क़ूफ़ीयों का पत्र पाकर कूफ़े के लिए रवाना हो गए। आपको इस बात का इल्म नहीं था के कूफ़ी ग़द्दारी करने पे उतर आए हैं।
वो कूफ़ा जंग की नीयत से नही गए थे
इसलिए उनके साथ उनका पूरा कुनबा गया था जिसमें 6 महीने के अली असगर से लेकर 75 साल के बुजुर्ग तक उनके साथ गए थे
इमाम हुसैन अपने परिवार और करीब 72 साथियों के साथ कूफ़ा के लिए रवाना हुए, लेकिन रास्ते में करबला में यज़ीद की सेना ने उन्हें रोक लिया। आपको इस बात का इल्म था के आप शहीद होंगे । फिर भी आपने यज़ीद के सामने घुटने नही टेके।

मोहर्रम के पहले 10 दिन :
करबला की घटनाएं
1 मोहर्रम हुसैन अपना छोटा सा कारवाँ लेकर करबला पहुंचे और आपने यज़ीद की बैअत ठुकरा दी।
यज़ीदी सेना ने उन्हें घेर लिया।
2 मोहर्रम यज़ीदी सेना ने हुसैन के काफ़िले को फ़रात नदी का पानी लेने से रोक दिया।
3-6 मोहर्रम हुसैन और उनके साथियों ने यज़ीदी सेना के साथ बातचीत की कोशिश की इस दौरान पानी की कमी के बावजूद हुसैन ने अपने साथियों को युद्ध की तैयारी के लिए प्रेरित किया।
7 मोहर्रम यज़ीदी सेना ने पानी की आपूर्ति को पूरी तरह से बंद कर दिया।
8 मोहर्रम हुसैन ने यज़ीदी सेना के कमांडर उमर इब्न साद से आख़री बार बात की और शांति का प्रस्ताव रखा, जिसे यज़ीद के आदेश के काऱण ठुकरा दिया गया।
9 मोहर्रम **शब -ए- आशूरा
हुसैन के भाई अब्बास ने पानी लाने की कोशिश की लेकिन वह घायल हो गए
10 मोहर्रम ( आशूरा )
– सुबह से जंग शुरू।
– एक-एक कर परिवार के सदस्य शहीद।
– छह महीने के अली असगर को भी बाण से मारा गया।
– अंत में इमाम हुसैन अकेले यज़ीदी सेना से लड़े ओर शिम्र के हाथों जो की यज़ीद का सिपाही था वीरगति को प्राप्त हुए।
– खेमों में आग लगा दी गई, महिलाओं-बच्चों को बंदी बना लिया गया।

इमाम हुसैन पैग़ंबर मोहम्मद (स.अ.) के नवासे थे।
करबला की लड़ाई सिद्धान्तों की
लड़ाई के साथ साथ त्याग ,तपस्या और इंसान के सब्र की मिसाल है
आइये हम हुसैन के त्याग से प्रेरित होकर समाज मे सकारात्मक बदलाव लाएँ इस लड़ाई में 72 लोगों ने 30 हज़ार की सेना का सामना किया — बिना पानी, बिना संसाधन। जो इस बात की मिसाल है की हौसला अगर बुलन्द हो तो बड़ी से बडी कठिनाइयों का सामना किया जा सकता है
महात्मा गांधी ने कहा: “अगर भारत को जीतना है तो हमें हुसैन से सबक लेना होगा ।”
मोहर्रम केवल मातम का नहीं, आत्मा की रोशनी का महीना है। करबला की घटना बताती है कि सच्चाई के लिए लड़ा गया संघर्ष कभी व्यर्थ नहीं जाता। इमाम हुसैन की कुर्बानी ने इस बात को अमर कर दिया कि बातिल चाहे जितना ताकतवर हो, अंत में जीत हक़ की ही होती है।
आख़िर में अपने एक शेर से मैं इस
दास्तान को ख़त्म करती हूँ।
तारीख़ ने अशख़ास हमे ऐसे दिए हैं*
बिन जिनके कभी ज़िक्रे पयम्बर नहीं होता
लहराता कहां अज़मते इस्लाम का परचम
शब्बीर का नेज़े पे अगर सर नहीं होता

• नुरूस्सबाह ‘सबा’
• 99267 72322
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chhattisgarhaaspaas
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