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‘बंगीय साहित्य संस्था छत्तीसगढ़ भिलाई’ : संस्था के तत्वावधान में संस्था की उप सभापति एवं बांग्ला की ख्यातिलब्ध कवयित्री एवं लेखिका स्मृति दत्त के निवास में संस्था की 350वीं साहित्य सभा : साहित्यिक गोष्ठी, गीत-संगीत और काव्यपाठ : इस बार का काव्य पाठ का विषय था- ‘गुपचुप’ और ‘आईसक्रीम’

👉 • ‘बंगीय साहित्य संस्था’ की उप सभापति स्मृति दत्त और प्रदीप भट्टाचार्य
‘छत्तीसगढ़ आसपास’ [12 जुलाई, 2025 : रिपोर्ट- प्रदीप भट्टाचार्य, फोटो क्लिक- पल्लव चटर्जी]
कला,साहित्य और संस्कृति के प्रति समर्पित ‘बंगीय साहित्य संस्था’ की 350वीं साहित्य सभा संस्था की उप सभापति एवं बांग्ला की चर्चित लेखिका श्रीमती स्मृति दत्त के निवास [नेहरू नगर, भिलाई] में सम्पन्न हुई.’बंगीय साहित्य संस्था’ इस्पात नगरी भिलाई में मासिक साहित्य सभा/प्रति सप्ताह कॉफी विथ साहित्यिक विचार-विमर्श आड्डा और लिटिल साहित्यिक पत्रिका ‘मध्यबलय’ का प्रकाशन विगत 65 वर्षों [स्थापना वर्ष-1960] से निरंतरता के साथ कर रही है.



350वीं साहित्य सभा की अध्यक्षता संस्था द्वारा बांग्ला भाषा में प्रकाशित लिटिल पत्रिका ‘मध्य बलय’ के संपादक एवं बांग्ला- हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि दुलाल समाद्दार ने की. सभा के प्रारंभ में माँ सरस्वती की पूजा अर्चना और सरस्वती वंदना हुई. स्वागत भाषण देते हुए स्मृति दत्त ने उपस्थित सभी रचनाकारों एवं गणमान्य श्रोताओं का अभिवादन किया.
साहित्य सभा की 350वीं बैठक में उपस्थित हुए रचनाकार एवं प्रभुद्धजन श्रोता-


* श्रीमती स्मृति दत्त
* दुलाल समाद्दार
* समरेंद्र बिश्वास
* गोविंद पाल
* प्रकाशचंद्र मण्डल
* पल्लव चटर्जी
* वीरेंद्रनाथ सरकार
* प्रदीप भट्टाचार्य
* बृजेश मल्लिक
* विपुल सेन
* सुजॉशा सेन
* पं. बासुदेव भट्टाचार्य
* सुबीर रॉय
* रविंद्रनाथ देबनाथ
* शंकर भट्टाचार्य
और
* श्रीमती शर्मिला दत्त
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साहित्य सभा के प्रथम सत्र में ‘गुपचुप’ और ‘आइसक्रीम’ विषय को लेकर कविता पाठ हुआ. प्रतिभागी रचनाकारों को प्रथम, द्वितीय और तृतीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया. निर्णायक थे- स्मृति दत्त और रविंद्रनाथ देबनाथ. भाषाशैली, वाचन और गुणवता के आधार पर प्रकाशचंद्र मण्डल [प्रथम], दुलाल समाद्दार [द्वितीय] और गोविंद पाल [तृतीय] रहे.

👉 [बाएँ से] प्रकाशचंद्र मण्डल, प्रथम विजेता : दुलाल समाद्दार, द्वितीय विजेता और गोविंद पाल, तृतीय विजेता
• पं. बासुदेव भट्टाचार्य ने शीर्षक- ‘पूचके’ और ‘आईसक्रीम’/ • बृजेश मल्लिक ने ‘पुचका चाटेर ठेला…’ / • गोविंद पाल ने ‘पुचका होए जाओ…’/ • दुलाल समाद्दार ने ‘जितेंद्रीय पुचका वाला…’/ • प्रकाशचंद्र मण्डल ने ‘आहा मानुष रे सृष्टि कि अपरूप सृष्टि…/ • विपुल सेन ने ‘पुचका’ और • वीरेंद्रनाथ सरकार ने एक व्यंग्य लघु कॉथा ‘पुचका वाला’ पढ़ा.

स्मृति दत्त ने ‘नाम की तार… और ‘ऐसे गो शीतल कॉरो देह मोन प्राण को…’ कविता पढ़कर ‘गुपचुप’ और ‘आईसक्रीम’ के शाब्दिक अर्थ को बहुत ही सुंदर ढंग से चित्रण किया.
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द्वितीय सत्र में बांग्ला-हिंदी में अन्य विषयों पर कविता पाठ उपस्थित बंगीय सदस्यों द्वारा किया गया-

• पं. बासुदेव भट्टाचार्य ने ‘आमार अंगिता’/ • बृजेश मल्लिक ने हिंदी कविता ‘जन्म दात्री माँ की वृद्धाश्रम गबन’/ • गोविंद पाल ने ‘कबिता की…’/ • दुलाल समाद्दार ने ‘बांध भेंगे जाए…’/ • प्रकाशचंद्र मण्डल ने ‘नामेर पाँचाली’.

• विपुल सेन ने बांग्ला कहानी – ‘कागोजेर टुकड़ों’ [कागज का टुकड़ा]/ • वीरेंद्रनाथ सरकार ने लघुकथा- ‘संस्कार और संस्कृति’/ • शंकर भट्टाचार्य ने हिंदी कविता ‘ जिंदा लाशों का शहर’ • पल्लव चटर्जी ने छोटी-छोटी दो गंभीर कविता ‘सृष्टि नोरे बृष्टि पोरे’ और ‘तुमी एले ना? अंत में • प्रदीप भट्टाचार्य ने छोटी-छोटी प्रगति शील हिंदी मुक्तक ‘सोच कर बोलें/प्रिय बोलें, कम बोलें/धीरे बोलें, मीठा बोलें. दूसरी मुक्तक थी- आप के मौन को/जो नहीं समझ सकता/वह आप के शब्दों को भी/नहीं समझ सकता.
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अंतिम सत्र में गीत-संगीत का गायन सुजॉशा सेन और शर्मिला दत्त की जोड़ी ने गाया. मधुर स्वर से शमा में चार-चाँद लग गया.

👉 {बाएँ से} सुजॉशा सेन और शर्मिला दत्त
* आमार गांनेर माला, आमी कोर बोकॉर गांन…
* प्रेम, एक बारे एसे छिलो निरोबे…
* सेई गांन केनो ऑमी पारी ना गेते…
* कभी पास बैठो…
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साहित्य सभा-350वीं की अध्यक्षता करते हुए दुलाल समाद्दार ने अंत में अपने उद्बोधन में कहा कि-
‘बंगीय साहित्य संस्था’ की इस लंबी यात्रा के लिए आप सभी को मेरी शुभकामनाएं. संस्था के संस्थापक स्व. शिबब्रत देवानजी को नमन है, जिनका हम अनुशरण कर रहे हैं. इस यात्रा को हमेशा जीवंत रखना है. साहित्य में संवाद एक माध्यम होता है. ‘बंगीय साहित्य संस्था’ बांग्ला भाषा का एक शोध पीठ है. नव लेखकों के लिए साहित्यिक सृजन भी है. यह संस्था साहित्यिक रिश्तों को विगत 65 वर्षों से एक सूत्र में बाँधकर रखा है, यह हम सब के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि है.
संचालन प्रकाशचंद्र मण्डल और आभार व्यक्त स्मृति दत्त ने किया.
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कार्यक्रम की कुछ सचित्र झलकियाँ-




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