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‘मैं शिवनाथ हूँ’ – भाग 2 : छत्तीसगढ़ की लोककथाओं में शिवनाथ नदी – नूरस्सबाह ‘सबा’

[ • लेखिका नूरस्सबाह ‘सबा’ ने अपने पिछले आर्टिकल में छत्तीसगढ़ की धड़कन ‘शिवनाथ नदी’ और उसके आर्थिक,सामाजिक योगदान और उसकी भौगोलिक स्थिति का वर्णन किया था. • अब इस क्रम में आगे देखें ‘मैं शिवनाथ से जुड़ी लोककथा’, ‘सबा’ की कलम से… – संपादक]

कई वर्ष पहले, गढ़चिरौली के एक गाँव में शिवनाथ नाम का एक मेहनती और ईमानदार आदिवासी युवक रहता था। वह एक जमींदार के खेतों में काम करता था। जमींदार की बेटी पारू (या फुलवाशन, कुछ कथाओं में) उसकी सुंदरता और सादगी के लिए जानी जाती थी। शिवनाथ की मेहनत और ईमानदारी ने पारू का दिल जीत लिया, और दोनों में प्रेम हो गया।
हालांकि, पारू के भाइयों को यह रिश्ता मंजूर नहीं था, क्योंकि शिवनाथ गरीब और आदिवासी था, जबकि पारू एक समृद्ध परिवार से थी। जमींदार के बेटे ने भी पारू की सुंदरता पर मोहित होकर उससे विवाह की इच्छा जताई और पारू के भाइयों को लालच देकर शिवनाथ को रास्ते से हटाने की साजिश रची। एक रात, पारू के भाइयों ने शिवनाथ को लाठियों से पीट-पीटकर मार डाला और उसका शव एक गड्ढे में छिपा दिया।
जब पारू को शिवनाथ के गायब होने का पता चला, वह उसे ढूंढते हुए खेतों में पहुंची। वहां उसे शिवनाथ का शव गड्ढे में मिला। अपने प्रेमी के वियोग में पारू ने भी वहीं प्राण त्याग दिए। कथा के अनुसार, उनके प्रेम और बलिदान से वहाँ एक जलधारा फूटी, जो शिवनाथ नदी बन गई। इस नदी को उनके शुद्ध और निःस्वार्थ प्रेम का प्रतीक माना जाता है, जो आज भी “सदानीरा” के रूप में बहती है।शिवनाथ नदी को सदानीरा कहा जाता है क्योंकि इसका पानी कभी सूखता नहीं है।
एक अन्य कथा में, शिवनाथ एक आदिवासी युवक था और फुलवाशन एक राजकुमारी थी। फुलवाशन को शिवनाथ से एकतरफा प्रेम हो गया। राजकुमारी के भाइयों ने इस रिश्ते का विरोध किया और शिवनाथ को एक बांध बनाने की कठिन परीक्षा दी। राजा को स्वप्न में बताया गया कि बांध के लिए एक बलि आवश्यक है। भाइयों ने साजिश रचकर शिवनाथ को बांध में चुनवा दिया। जब फुलवाशन को यह पता चला, वह बांध पर पहुंची और रेत में दबी लाश से उंगली दिखाई दी शिवनाथ की अंगूठी देखकर उसे पहचान लिया। दुखी होकर उसने अपने प्रेम को सती करने का निर्णय लिया, और दोनों की आत्माएँ नदी के रूप में बहती
जलधारा बन गईं। इस प्रकार शिवनाथ नदी उनके प्रेम का प्रतीक बन गई।
सांस्कृतिक महत्व।
यह कथा न केवल शिवनाथ नदी को एक प्राकृतिक संसाधन बनाती है, बल्कि इसे छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा भी बनाती है, जो प्रेम, बलिदान और प्रकृति की शक्ति को दर्शाती है।पंडवानी जैसे प्रदर्शन और मौखिक परंपराओं के माध्यम से ये गाथा आज भी जीवित है।और छत्तीसगढ़ की एक अलग सांस्कृतिक
पहचान बनाती है।
आख़री में मैं अपने ही एक शेर से कहानी को विराम देती हूँ।

मोहब्बत करने वालों का ज़माना जब हुआ दुश्मन
मोहब्बत करने वालों ने ही फिर बढ़कर बगावत की.
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chhattisgarhaaspaas
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