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‘वेंकटेश साहित्य मंच’ : मुकेश गुप्ता की कृति ‘क्या करूँ उलझनें सुलझती ही नहीं’ का विमोचन-चर्चा गोष्ठी : ‘ओपन माइक कविता प्रतियोगिता’-विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक,पर्यावरण के प्रति समर्पित संस्थाओं का सम्मान एवं रोजमर्रा की उलझनों को कैसे सुलझाया जाए? पर अपनों से अपनी बात एवं काव्य गोष्ठी

👉 • मुकेश गुप्ता की कृति ‘क्या करूँ उलझनें सुलझती ही नहीं’ का विमोचन करते हुए अतिथि
रायपुर वृंदावन हॉल से रिपोर्टिंग एवं प्रस्तुति प्रदीप भट्टाचार्य
रायपुर : बीते दिनों ‘वेंकटेश साहित्य मंच’ के तत्वावधान में मुकेश गुप्ता की नव प्रकाशित कृति ‘क्या करूँ उलझनें सुलझती ही नहीं’ के विमोचन कार्यक्रम में मंचासीन अतिथि थे- कृतिकार मुकेश गुप्ता, स्ववेदी सत्येंद्र, मनेश्वर नाग, मनोज मसंद, रुनाली चक्रवर्ती, वीरेंद्र शर्मा ‘अनुज’, शुभा शुक्ला ‘निशा’, सुरेंद्र केवट, बृजेश मल्लिक, जे के डागर और संजय शर्मा.
प्रारंभ में माँ सरस्वती वंदना, पूजन किया गया. सरस्वती वंदना गीत शुभा शुक्ला ‘निशा’ द्वारा मधुर स्वर में हुआ. पश्चात अतिथियों का पुष्प गुच्छ से स्वागत किया गया. स्वागत व्यक्तव्य कार्यक्रम के संयोजक मुकेश गुप्ता द्वारा दिया गया और संचालन संजय शर्मा ने की.
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‘ओपन माइक कविता प्रतियोगिता’ का आयोजन विगत दिनों इसी मंच के माध्यम से करवाया गया था. इस प्रतियोगिता में छत्तीसगढ़ के सभी जिलों से 50 से अधिक कवियों ने भाग लिए थे. निर्णायक जज उपस्थित कविगण ही थे, जिन्हें एक नम्बर शीट दिया गया था. सभी नम्बर शीट को जोड़कर अंकों के आधार पर विजेता रहे, कवियों को सम्मान राशि, प्रमाण पत्र, शॉल श्रीफल देकर सम्मानित किया गया.

👉 • भाविक दुबे अपने परिवार के साथ प्रमाण पत्र प्राप्त करते हुए…
* अनिल राय भारत [प्रथम]
* सुषमा पटेल [द्वितीय]
* भाविक दुबे [तृतीय]
सांत्वना पुरुस्कार-
* रामचंद्र श्रीवास्तव
* राकेश रूसिया
* सीमा पाण्डेय ‘सीमा’
* कु. अदिति तिवारी
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संस्थाएं जिन्हें सम्मानित किया गया-










* हमर गंवई गाँव
* उजियार
* सुग्घर साहित्य समिति
* मानवता फाऊंडेशन
* वक्ता मंच
* नवरंग काव्य मंच व जैन कवि संगम
* नारायणी साहित्य संस्थान
* श्री नटराज नृत्यालम
* साहित्य सागर मंच
* संकेत साहित्य समिति
* तिरंगा वंदन मंच
* हर संभव फाऊंडेशन
* संभावना फाऊंडेशन
* तराना म्युजिकल ग्रुप
* पहल एक नई सोच:जनसेवा- कल्याण समिति
* लव फॉर ह्युमेनिटी- नींव
* अखिल भारतीय ब्राह्मण एकता छत्तीसगढ़
* माँ आनंदिनी फाऊंडेशन
* मनीषा नाटाल
* पर्ल वेलफेयर फाऊंडेशन
* एबीसी पब्लिक स्कूल
* प्रभा फाऊंडेशन.
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समाज में विभिन्न क्षेत्रों में व्यक्ति गत योगदान के लिए सम्मान- श्रीमती प्रियंका मिश्रा, जय सिंह राजपूत, दीनूराम वर्मा, नवाब कादिर, डॉ. सत्यजीत साहू, संजीव सरकार, अजीत कुमार कुजूर, डॉ. आरती साठे, श्रीमती मीनाक्षी केशरवानी, श्रीमती प्रीति रानी तिवारी,और संजीव ठाकुर.
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विगत 18 वर्षों से निरंतर प्रकाशित सम-सामयिकी विचारशील पत्रिका ‘छत्तीसगढ़ आसपास’ के ऊर्जावान संपादक एवं प्रगतिशील कवि प्रदीप भट्टाचार्य को ‘पत्रकारिता गौरव’ सम्मान से सम्मानित किया गया.

👉 • प्रदीप भट्टाचार्य को सम्मान करते हुए ‘वेंकटेश साहित्य मंच’
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‘क्या करूँ उलझनें सुलझती ही नहीं’ पर अपने विचार जिन्होंने रखा-
संजीव ठाकुर, राजेश जैन ‘राही’, डॉ. प्रभात शुक्ला, कु. अदिति तिवारी, सुषमा बग्गा, सिंधु झा, सुषमा पटेल,डॉ.महेंद्र सिंह ठाकुर, गोपाल सोलंकी, निलेश साहू, बलजीत सिंह ‘सब्र’, अंजू पाण्डेय, विजया पाण्डेय, आशा पाठक और कृतिकार मुकेश गुप्ता ने विस्तृत रूप से अपने विचारों को प्रकट करते हुए कहा कि- ‘मुझे लगा कि हर व्यक्ति की उलझनें प्रकारांतर से एक जैसी ही होती है और प्राय: उसके रोजमररे में अलग-अलग हालातों और घटनाओं में विविध रूपों में प्रकट होती है. तो शुरू करें… लेकिन अंत नहीं’
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सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार संजीव ठाकुर ने “क्या करूँ उलझनें सुलझती ही नहीं” पर अपनी विस्तार से टिप्पणी करते हुए कहा कि-

पुस्तक की समीक्षा करने से पहले पुस्तक के नाम की चर्चा करना चाहूंगा क्या करूं उलझने सुलझती ही नहींl
यह संरचना का एक गुलदस्ता जिसमें रोचक प्रस्तुतियां दी गई है यह किताब जिंदगी की सुबह से शाम तक घटनाओं से दो चार होने की प्रक्रिया ही है जिसे बड़े सलीखे से प्रस्तुत किया गया है। किताब बड़ी रोचक एवं आकर्षित करने वाली रचनाओं से परिपूर्ण है। पुस्तक की भाषा शैली अद्भुत है और रचनाशीलता का समावेश है। पाठकों को शुरू से लेकर अंत तक बांधे रखने में सफल इस किताब की संप्रेषण क्षमता भी अपने आप में सलीके से प्रस्तुत की गई है। इसमें सर्वप्रथम इन्होंने शुरुआत की है 1तो शुरू करें लेकिन अंत नहीं है। कहानी की शुरुआत एक छोटे कस्बे से शुरू होती है जो कस्बे से छोटे शहर में रूपांतरित हो रहा है और शहर की प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष सच्चाई का प्रमाण भी है
लेखक ने खुद कहा है कि यह कहानी सड़क की है सड़क से शुरू हुई है और सड़क पर ही खत्म क्योंकि इसके आगे बहुत कुछ भी है और वह प्रतिबद्ध हैं कि जहां बोर होंगे वहां मैं बंद कर दूंगा अपने विचार अनावश्यक नहीं रोपित करूँगा। जो कुछ सड़क कहेगी वहां बयान करूंगा। छपी हुई किताब में कुल 43आलेख है सब का वर्णन करना अल्प समय में संभव प्रतीत नहीं होता है किताब के गुण दोष पर बात करता हूं और इस किताब की बहुत सारी खूबियां कुछ कमियों पर मैं बात करना चाहूंगा। लेखक किस विचारधारा के हैं उन्होंने अपने प्रस्तावना अभिलेख में स्पष्ट कर दिया जो काबिले तारीफ है।
इन्होंने अपने कुछ क्षण प्रकृति के संघ में उल्लेख किया है की चिड़िया गौरैया कोयलिया अन्य परिंदे वृक्ष तालियां हरे-भरे पेड़ आकाश भास्कर उसकी कणिकाएं आपको अपनी और आकर्षित करते हैं क्योंकि इनकी विराट सत्ता के दर्शन होते हैं। लेखक ने आगे लिखा कि जिस खूबसूरती की परिकल्पना मात्र से और असीम कृपा से विशिष्ट कृतियों के दर्शन मात्र से आप प्रफुल्लित होते हैं उसकी निकटता आपको कितनी कितनी चिरकालिन खुशी दे सकती है इसका आपको अंदाजा भी नहीं होगा। अपने आलेख 16 नंबर लेखक ने बहुत सारा गर्भित बातें लिखी है कुछ पल का सुख निसंदेह कुछ पल के सुख के लिए हम बहुत कुछ न्योछावर करने की तैयार रहते हैं लेखक ने लिखा है आप कुछ फलों के सुख के लिए वह सब कुछ करने को तैयार हो जाते हैं जिसकी खुशियां क्षणभंगुर है क्या यह आपको मालूम है कि आज जितनी भी इस समाज में विसंगतियां व्याप्त है इसके पीछे हमारी प्रवृत्तियां अत्यंत सक्रिय और क्रियाशील है हम ऐसा प्रयास क्यों नहीं करते कि हम हर पल हर क्षण खुशी के समंदर में हिलोरे लेते रहें क्या ऐसा कुछ हो सकता है ऐसे कई अन सुलझे प्रश्न को अपनी किताब में लेखक ने बड़े सटीक तरीके से उठाया है एवं उसका समाधान देने का भी प्रयास किया है एक महत्वपूर्ण आलेख अति सरवर्त वर्जयेत मैं उन्होंने बड़ी मौजू बात कही है आप जरा ध्यान से विचार करें कि अति शब्द से अपनी सुरक्षा कैसे की जाए आप अपनी अति भावुकता से अपने आप को अनेक मुसीबत में डाल लेते हैं और आपका दयालु हृदय आपको अनावश्यक उलझन में फंसा देता है और अति कठोरता आपके लिए अभिशाप बन जाती है और अति क्रोध की परिणति विकराल रूप धारण कर लेती है इस अति शब्द की मीमांसा तथा विवेचना बड़े ही तार्किक तरीके से लेखक ने प्रस्तुत किया है। किताब क्योंकि श्री गुप्ता जी ने स्वयं प्रकाशित की है तो जाहिर है कि इसकी साज साज बहुत सुंदर है लिखने में गलतियां कम है परंतु कई आलेखों में कठिन
शब्दों का उपयोग किया है जो की पाठक की पठनीय गति को भंग भी करते हैं, महात्मा गांधी और प्रेमचंद हमेशा सरल लिखा करते थे तुलसीदास ने भी बहुत सरल लिखा है इसीलिए उनकी रचनाएं आज हर घर में पढ़ी जाती है और उनका पाठक वर्ग सिर्फ देश में ही नहीं पूरे विश्व में फैला हुआ है। इसीलिए मुकेश गुप्ता जी को अपनी अगली किताब में सरलतम शब्दों का प्रयोग कर रचनाओं को बोधगम्य में बनाना चाहिए।
लेखक ने परंपरागत तथा जीवन की कथावस्तु तथा सभी पात्रों को चुना है जो सटीक हैंलेकिन लेखक ने लेखक की प्रतिबद्धता को प्रतिपादित किया है लेखक ने मानवीय जीवन और मानवीय प्रवृत्तियों को सही ढंग से उभार कर सामने रखा है। रोजमर्रा की बातें जो हम विस्मृत कर देते हैं उसे बहुत अच्छे ढंग से उभर कर आलेखों के कैनवास पर उभरा है मैं उन्हें बहुत-बहुत साधुवाद देता हूं ऐसी कृतियों से समाज में जागरूकता के लाने का प्रयास होता रहना चाहिए और ऐसे प्रयासों की सराहना की जानी चाहिए मैं उन्हें साधुवाद देता हूं बधाई देता हूं और शुभकामनाएं देता हूं और पाठकों के लिए सलाह है कि इस खरीद कर पढ़ें यह जनउपयोगी है.
👉 • कृतिकार मुकेश गुप्ता कृति पर अपनी बात रखते हुए…
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अधिवक्ता एवं कवि वीरेंद्र शर्मा ‘अनुज’ ने अपने शब्दों की बानगी कुछ इस तरह बयाँ की-

“उलझन में ऐसी उलझन हुई/सुलझाना भी चाहा/सुलझ न सकी.”
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इस गरिमामय समारोह में उपस्थित थे-

👉 [बाएँ से] मुकेश गुप्ता, संजीव शर्मा, बृजेश मल्लिक, वीरेंद्र शर्मा ‘अनुज’ और प्रदीप भट्टाचार्य [कार्यक्रम शुरू होने के पहले एक फोटो क्लिक]

👉 • सभागार में उपस्थित साहित्यकार

👉 • सभागार में उपस्थित साहित्यकार
‘छत्तीसगढ़ आसपास’ के संपादक प्रदीप भट्टाचार्य, कवियित्री सोनिया सोनी, छबिलाल सोनी, राजकुमार निषाद, रामेश्वर शर्मा, कमलेश कुमार वर्मा, दीपक निषाद, मिनेश साहू, ईश्वर साहू बंधी, कु. रश्मि शकुंतला मिश्रा, नागेश वर्मा, कमलेश कुमार साहू, आदित्य साहू, कोमल कांत यादव, जितु दुलरु वा, प्रांजल राजपूत, ललिता साहू, नारायण प्रसाद वर्मा, जगदीश सोनी, सुरेश निर्मलकर, लिलेश्वर देवांगन, विकास कश्यप, कु. अरुणा आदिले, सहेत्र लाल आदिले, संतोषी कुर्र, अनूप कुमार आदिले, रुकमणी गायकवाड़, अरुण कुमार आदिले, रिती देशलहरे, वीर अजीत शर्मा, ममता खरे ‘मधु’, सीमा पाण्डेय, उमेश कुमार सोनी,पं. अंजु पाण्डेय ‘अश्रु’, डॉ. रामेश्वरी दास, राकेश अग्रवाल, आरडी अहिरवार, राजेश पराते, शुभम सोनी, डॉ. मृणालिका ओझा, राजेंद्र ओझा, भट्ट नेहा पटनायक, रविंद्र सिंह दत्ता, डॉ. माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’, डॉ. मुकेश शाह, राजकुमार निषाद राज, पुष्पलता त्रिपाठी, नीलिमा यादव, कैलाश छाबड़ा, नागेश वर्मा, नारायण प्रसाद वर्मा चंदन, अलक्षेन्द्र मोगरे, सुभाष राठी, ज्योति शर्मा, विजय शर्मा, अरुण मिश्रा, मांडवी शर्मा, गिरिजा शर्मा, नंदिनी शर्मा, नंदिनी विनोद ढगे, मनीषा नाटाल, राजेश गोयल, सुनीता वैष्णव, तिरबाला देवांगन, एचएल चंद्राकर, मन्नू लाल यदु ‘नाथ’, प्रीविका पाण्डेय, अर्चना श्रीवास्तव, मनीष कुमार धुरंधर, सौरभ सेन, डॉ. सिधार्थ कुमार श्रीवास्तव, रामेश्वर शर्मा, राजेंद्र सिंह, जीएस चौहान, दिनेश साहू, जगबंधु साहू और अनेक गणमान्य नागरिक एवं ‘वेंकटेश साहित्य मंच’ के सदस्य.
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कार्यक्रम का कुशल संचालन संजय शर्मा और आभार व्यक्त कवि बृजेश मल्लिक ने किया.
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समारोह की कुछ प्रमुख सचित्र झलकियाँ-

👉 मंचासीन अतिथि [बाएँ से] ‘विहंगम लोक संस्थान’ काशी के सत्येंद्र जी, मनोज मसंद, सुरेंद्र कुमार केवट, रुनाली चक्रवर्ती, शुभा शुक्ला ‘निशा’, वीरेंद्र शर्मा ‘अनुज’, डॉ. जेके डागर, बृजेश मल्लिक और मुकेश गुप्ता

👉 • मंचासीन अतिथि [बाएँ से] प्रथम संजय शर्मा

👉 • उद्बोधन देते हुए डॉ. महेंद्र सिंह ठाकुर

👉 • संजीव ठाकुर का सम्मान ‘वेंकटेश साहित्य मंच’ द्वारा किया गया

👉 • ‘विहंगम आध्यात्मिक योग संस्थान’ काशी-वाराणसी के मध्य भारत के प्रचारक योग गुरु सत्येंद्र जी का सम्मान

👉 • ‘संकेत साहित्य मंच’ का सम्मान

👉 • विजेता कवि रामचंद्र श्रीवास्तव का सम्मान

👉 • विजेता कवयित्री सीमा पाण्डेय ‘सीमा’ का सम्मान

👉 • विजेता कवयित्री कु. अदिति तिवारी के सम्मान

👉 • ‘साहित्य सृजन संस्था’ का सम्मान

👉 • राष्ट्रवादी कवि बृजेश मल्लिक का सम्मान
[ • रिपोर्टिंग एवं प्रस्तुति : प्रदीप भट्टाचार्य ]
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