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मुलाकात और कृति भेंट : लेखिका दीप्ति श्रीवास्तव ने ‘छत्तीसगढ़ आसपास’ के संपादक व प्रगतिशील कवि प्रदीप भट्टाचार्य से मुलाकात की और अपनी नव प्रकाशित कृति कहानी संग्रह ‘माँ उदास क्यूँ’ सप्रेम भेंट की

👉 • मुलाकात और कृति ‘माँ उदास क्यूँ’ भेंट करते हुए लेखिका दीप्ति श्रीवास्तव साथ में ‘छत्तीसगढ़ आसपास’ के संपादक प्रदीप भट्टाचार्य
• छत्तीसगढ़ आसपास
• 17 जुलाई, 2025
‘अखिल भारतीय उत्कृष्ट बहुउद्देशीय संस्था’ द्वारा आयोजित कीर्तिशेष स्व. राम मोहनन स्मृति सम्मान में ‘छत्तीसगढ़ आसपास’ की शुभचिंतक छत्तीसगढ़-भिलाई से देश की लब्धप्रतिष्ठित लेखिका दीप्ति श्रीवास्तव से मुलाकात हुई. दीप्ति जी ‘छत्तीसगढ़ आसपास’ की नियमित लेखिका है, मगर मेरी रु-ब-रु मुलाकात कभी नही हुई. इस आयोजन में आत्मीय मुलाकात से खुशी हुई. दीप्ति जी ने अपनी नव प्रकाशित कहानी-संग्रह “माँ उदास क्यूँ” मुझे भेंट की. “माँ उदास क्यूँ” मैंने पूरी पढ़ ली.

“माँ उदास क्यूँ” संग्रह में प्रकाशित सभी कहानी [कुल-25] बिल्कुल एकांत में एक सांस में पढ़ डाली. इस पुस्तक में शीर्षक – किल्लत/बीज का प्रस्फुटन/उसका छक्का/खूबसूरती जरूरी नहीं/माँ की अनुभूति/परजीवी विचार/बदलाव/एक भाई ऐसा भी/पनोई/भोला बचपन/टोका-टोकी/एक था स्काट/लालच/शिष्टाचार के परे/और वह परास्त न हुई/ठगा सा रह गया/संस्कृति/वास्तविक सौंदर्य बोध/माँ उदास क्यूँ/आठ सौ रुपये/दिलदार पीपल पर्न/आसमां की व्यथा/गर्म खाना/वक्त का तकाज़ा और ‘मातृत्व’ कहानियां छपी है. सभी कहानी अंतर्मन को छू जाती है. कुछ बेहतर कहानी में से एक कहानी ‘मातृत्व’ सर्वश्रेष्ठ कहानी में से एक है. पाठकों के लिए यह कहानी प्रकाशित कर रहे हैं.
“माँ उदास क्यूँ” में दीप्ति ने लिखा है-
इस कहानी संग्रह का केंद्र “माँ” है. माँ यह मात्र शब्द नहीं अपितु दिल से निकली वह आवाज़ होती है जो भावना रूपी गगरी से छलकती है. माँ व्याख्या और व्यंजना दोनों से परे सृष्टि की आधारशिला बनकर न जाने कितने रूपों में हमारे सामने आती है. माँ के रूपों को अलग-अलग लघु कथाओं के माध्यम से अभिव्यक्त करने का विचार मन में आया और उन्हें एक संग्रह के रूप में प्रस्तुत करने की इच्छा पूरी हुई “माँ उदास क्यूँ” के माध्यम से.
“माँ उदास क्यूँ” माँ को समर्पित संग्रह है. सभी कहानियां हमारे आस-पास की घटनाओं को लेकर लिखी गई है. दीप्ति की लिखी सभी कहानियों में नया कुछ गढ़ने और बनाने की कल्पना है. दीप्ति की कहनियों में सरल शब्दों के साथ-साथ गहराई है. जैसे – • ‘पीने का पानी तो सबने बोतल बंद वाला खरीद लिया तथापि निस्तारण के लिए पानी तो चाहिए?’ • ‘हर माँ की ममता भरी अनुभूति एक सी होती है’ • ‘आज के जमाने में हम अपने स्वार्थ को पहले रख दूसरे की इंसानियत को उसका काम है कह पतली गली से निकल जाते हैं अहसानमंद होने के स्थान पर उससे दूर भागते हैं’ • ‘गोदना ही तो मरने पर साथ जाता है बाकि सब यहीं रह जाता है रे पनोई’ • ‘जमाने को मशीनों ने बदला या मशीनों ने जमाने को, यह बूढ़ी दादी नहीं जानती’ •’माँ ने मुझे उपकृत कर उपकार की पथ प्रदर्शक बनी. आज तेरहवां दिन है, माँ के जाने का, पर लगता है उनका शरीर हमें छोड़ कर गया है. आत्मा हम सब के हृदय में समा उसी संयम को विस्तृत आकाश प्रदान कर रही है. लगता है माँ ने की उदासी दूर हो गई.’
“माँ उदास क्यूँ” संग्रह में 2 छोटी-छोटी कहानी है. ‘लालच’ और ‘संस्कृति’. मेरे ख्याल से यह लघुकथा है. ‘माँ उदास क्यूँ’ संग्रह के शीर्षक की कहानी अच्छी है. दुनिया में माँ से बड़ा कोई नहीं होता. एक आदर्श माँ को दीप्ति ने सुंदर भाषा में लिखा है.
मैं दीप्ति को एक संभावनाशील कथाकारा के रूप में देख रहा हूँ. दीप्ति आने वाले समय में और ऊँचाई की ओर अग्रसित होंगी, मेरी शुभकामनाएं है कि उनकी एक नई किताब जल्द पढ़ने को मिलेगी, इंतज़ार में… – प्रदीप भट्टाचार्य, संपादक.




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