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लेख : मेरा छत्तीसगढ़, मेरा अभिमान – नूरस्सबाह ‘सबा’

“मेरा छत्तीसगढ़ मेरा अभिमान” – यह नारा मेरे लिए महज शब्द नहीं, बल्कि मेरे दिल की गहराइयों में बसी भावना है। यह उस धरती की कहानी है, जिसकी सोंधी खुशबू ने मुझे अपने आगोश में लिया, मेरे परिवार को नया आशियाना दिया, और एक ऐसी पहचान दी, जो मेरे वजूद का हिस्सा बन गई। यह लेख छत्तीसगढ़ के प्रति मेरे प्रेम और कृतज्ञता का चित्र है, जो इस माटी की आत्मा को शब्दों में पिरोता है।

पहला कदम: अनजानी धरती पर
मेरा जन्म मध्य प्रदेश के जबलपुर में हुआ। आठ वर्ष की उम्र में, जब पिताजी का तबादला डिविजनल एम्प्लॉयमेंट ऑफिसर के रूप में रायपुर छत्तीसगढ़ में हुआ, हमारा परिवार – माँ, दादी, दादाजी, और मैं – इस नए शहर की ओर बढ़ चला। दादाजी, जो जबलपुर में एक प्रसिद्ध यूनानी चिकित्सक और लेखक और शायर थे,उनके द्वारा लिखी किताब लगाई बुझाई उस दौर में लोगों ने ख़ूब पसन्द की दादी जी अपनी मशहूर डिस्पेंसरी को पीछे छोड़ बेटे के साथ रायपुर चले आए। हम सबके मन में एक पूर्वाग्रह था कि छत्तीसगढ़ शायद पिछड़ा और अनजाना होगा। शुरुआती दिन अनिश्चितताओं से भरे थे। छत्तीसगढ़ी बोली, स्थानीय लहजा, और खान-पान चावल-दाल की सादगी, ठेठरी-खुरमी की मिठास, फरा का स्वाद – हमें अटपटा लगा। दादी को लगता था कि शायद हम यहाँ कभी अपने नहीं हो पाएँगे।

छत्तीसगढ़ की माटी का जादू
समय के साथ छत्तीसगढ़ की माटी ने हमें अपने रंग में रंग लिया। रायपुर के रंगमंदिर मैदान में सहेलियों के साथ साइकिल चलाते, महानदी के किनारे सूर्यास्त देखते, और बस्तर के जंगलों की ताजगी में खोते हुए मैं कब बड़ी हो गई, पता ही नहीं चला। यहाँ के त्योहारों तीजा-पोरा की उमंग, बस्तर दशहरा का जोश, छेरछेरा की मस्ती ने हमारे दिल जीत लिए। यहां के लोगों की बोली, “काय ला बेबी चाय पियबे का?” बासी-भात की सादगी ने अपनापन सिखाया। स्कूल की सहेलियों के साथ गुड्डे-गुड़िया का ब्याह रचाना और गाँव की गलियों में दौड़ना – इन यादों ने मेरे मन में गहरी छाप छोड़ी।
पिताजी तो छत्तीसगढ़ी में बात करने लगे थे। धीरे-धीरे यह धरती हमारी आत्मा में बस गई। अब छत्तीसगढ़ अनजाना नहीं था; इसकी माटी की खुशबू मेरे वजूद का हिस्सा बन चुकी थी।

छत्तीसगढ़ की जीवंत आत्मा
छत्तीसगढ़ सिर्फ एक राज्य नहीं, बल्कि संस्कृति और प्रकृति का खजाना है। बस्तर और सरगुजा की हरी-भरी वादियाँ, चित्रकोट जलप्रपात की गर्जना, सिरपुर के प्राचीन बौद्ध स्थल, और रतनपुर की माँ महामाया का मंदिर इसकी समृद्धि के प्रतीक हैं। पंडवानी की गूँज, राउत नाच की थिरकन, और सुवा नृत्य की मस्ती यहाँ की जीवंतता को दर्शाती हैं। बेल मेटल की शिल्पकला, कोसा साड़ियों की चमक, और मिट्टी के बर्तनों की सादगी विश्व भर में छत्तीसगढ़ की पहचान बनाते हैं। हर साल गौर मेला और मड़ई जो की मुझे किसी शॉपिंग मॉल से ज़्यादा पसन्द है, यहां के उत्सव इस धरती की एकता और उमंग को दर्शाते हैं।

मेरा छत्तीसगढ़, मेरा घर
आज जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूँ, तो लगता है कि छत्तीसगढ़ ने हमें नया जीवन, नई यादें, और एक नई पहचान दी। मेरी साहित्यिक परवरिश – साहिर, मीर, ग़ालिब की शायरी और दादाजी-पिताजी की लेखनी मेरी प्रेरणा स्रोत है जिसने मेरे लेखन को गहराई दी, और छत्तीसगढ़ की संस्कृति ने उसे रंग। यह धरती मेरे लिए मिट्टी और पत्थरों का समूह नहीं, बल्कि मेरा अभिमान है। यहाँ की धान की खुशबू, बच्चों की हँसी, और बुजुर्गों की कहानियाँ मेरे दिल में हमेशा जिंदा रहेंगी। छत्तीसगढ़ ने मुझे सिखाया कि घर वह नहीं, जहाँ आप पैदा होते हैं, बल्कि वह, जहाँ आपका दिल बसता है।
अंतिम पंक्तियाँ-
बासी बोरे, ठेठरी-खुरमी, फरा है इनकी जान,
सीधे-सादे लोगों का ये सीधा-सादा खान-पान।
देश के हर प्रांत के लोगों का घर है यहाँ,
मेरे इस छत्तीसगढ़ में बसता है हिंदुस्तान।
अन्न-धन की ये ज़मीं, है एकता की मिसाल,
है अलग छत्तीसगढ़ की मेरे इस दुनिया में शान।

[ • शायरा नूरस्सबाह ‘सबा’ दुर्ग शहर से है. देश के अनेकों प्रतिष्ठित अखबारों/पत्रिकाओं में ‘सबा’ की रचनाएँ निरंतर प्रकाशित हो रही है. आकाशवाणी रायपुर में भी अपनी प्रस्तुति समय-समय पर दे रही हैं. ]
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