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मुलाकात : कविता संग्रह ‘चैत की चंदनिया’ कृतिकार- अरुण कुमार निगम : मेरी कलम से- प्रदीप भट्टाचार्य

यूँ तो अरुण कुमार निगम से मेरा परिचय 20-25 वर्षों से है. मैं भिलाई में और अरुण निगम दुर्ग में रहते हैं, फिर भी हमारी मुलाकात कभी-कभी वर्षों तक नहीं हो पाती है. भिलाई-दुर्ग के साहित्यिक आयोजन में मुलाकात हो जाया करती है. ऐसी ही एक चर्चा मुलाकात विगत दिनों ‘इंडियन कॉफी हाउस’ सेक्टर-10 में हुई. इस आत्मीय मुलाकात में उन्होंने मुझे अपनी एक काव्य कृति ‘चैत की चंदनिया’ सप्रेम भेंट की. मैं कोई आलोचक, समालोचक तो हूँ नहीं. या यूं कहिये कवि भी नहीं हूँ. कभी-कभार मूड हुआ तो दो-चार लाइन लिख लिया करता हूँ. अब तो दो-चार लाइन लिखना भी मुश्किल हो जाता है, जब से पत्रकारिता क्षेत्र में आ गया हूँ. अरुण कुमार निगम ने जब यह कृति दी है तो कुछ ना कुछ तो लिखना ही है. लिखना है तो पहले पूरी किताब को पढ़ना है. फुर्सत में सभी कविताओं को पढ़ा. फिर लिख रहा हूँ…

• कृति भेंट करते हुए [बाएँ से] अरुण कुमार जायसवाल, प्रदीप भट्टाचार्य और अरुण कुमार निगम
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‘चैत की चंदनिया’
-कृतिकार : अरुण कुमार निगम

इलाहाबाद [प्रयागराज] के अंजुमन प्रकाशन से प्रकाशित लगभग 112 पृष्ठों की यह काव्य संग्रह ‘चैत की चंदनिया’ अरुण कुमार निगम ने पूज्य पिताजी स्व. कोदूराम दलित को सादर समर्पित किया है. अरुणजी,छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध कवि ‘दलित’ जी के ज्येष्ठ पुत्र हैं. काव्य लेखन की प्रतिभा अरुण जी को विरासत के रूप में प्राप्त हुई है. इनका जन्म 4 अगस्त,1956 को दुर्ग छत्तीसगढ़ में हुआ. दुर्ग जिले में ग्राम टिकरी [अर्जुन्दा] इनका पैतृक गाँव है. यह गाँव अब बालोद जिला में है. अरुण जी भारतीय स्टेट बैंक के मुख्य प्रबंधक पद से 31 अगस्त, 2016 को सेवानिवृत्त हुए. आप ‘छंद के छ:’ के विशेषज्ञ माने जाते हैं.
उत्तरप्रदेश हिंदी संस्थान के प्राक्तन उपाध्यक्ष प्रो. सोम ठाकुर ने इस किताब की भूमिका लिखी है- डॉ. हरिवंश राय बच्चन की पांचवी पीढ़ी के गीत-कवि अरुण कुमार निगम की नवीन कृति ‘चैत की चंदनिया’ मेरे समक्ष है. संग्रह के सारे गीतों में यथा सम्भव सृजनशीलता के नियमों का पालन किया गया है. विषय वैविध्य के कारण ‘चैत की चंदनिया’ कृति में जीवन और समाज के सभी आयामों को छूने का सफल प्रयास किया गया है. संग्रह की भाषा सहज अर्थात भाव के साथ जन्मी भाषा है.
छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध कवि, गीतकार और गायक लक्ष्मण मस्तुरिया ने लिखा है – निर्मल मन का चितेरा कवि अरुण कुमार निगम के काव्य संग्रह ‘चैत की चंदनिया’ को पढ़कर मन आल्हादित हुआ. ऐसी सरस सरल हिंदी की रचना छत्तीसगढ़ की धरती को सुवासित करती है. यह इस धानी धरती की निश्चल संवेदना है जो राष्ट्रीयता से जुड़कर अपनी महत्ता स्थापित करती है. कवि अरुण की सवंदेना, करुणा अपने आसपास के दुखद सुखद भावों में मुखरित होती है. मनुष्य की भाषा अलग हो सकती है, उसके आतंरिक भाव प्राय: समान होते हैं. अभिव्यक्ति के अंदाज से ही उसका मुल्यांकन होता है. “चादर सी चूनर सी/चैत की चंदनिया…/झांझर सी झूमर सी/चैत की चंदनिया…/महुआ की मधुरता सी/मनभाती मदमाती/छिटके गुलमोहर सी/चैत की चंदनिया…” गाँव के ऐसे आत्मीय स्वरूप का चित्रण निर्माण का चितेरा कवि ही कर सकता है.
संग्रह के रचियता अरुण कुमार निगम लिखते हैं – गीत बनाए नहीं, बन जाते हैं. जो स्वत: उपजते हैं उनमें आत्मा होती है. आत्मा अजर-अमर होती है. अत: मन से उपजे गीत ही अमर होते हैं. ‘चैत की चंदनिया’ में मेरी किशोरावस्था से लेकर आज तक की प्रतिनिधि कविताओं और गीतों का संकलन है. मेरा मानना है कि विधा कोई भी हो गीत, गज़ल, कविता या छंद, विधान और नियमों का पालन करना मात्र पर्याप्त नहीं होता बल्कि रचना में रचनाकार का चिंतन और दर्शन भी दिखाई देना चाहिए. रचना में शब्दों का आडम्बर नहीं बल्कि भावों की गूढ़ता ही महत्वपूर्ण होती है. मन से उपजे गीत और कविताएं ‘चैत की चंदनिया’ के रूप में आपके हाथों में है.
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‘चैत की चंदनिया’ में कुल 72 गीत-कविता है. पाठकों के लिए मेरी पसंदीदा 3-4 कविता/गीत प्रकाशित कर रहे हैं. आपकी निष्पक्ष प्रतिक्रिया का इंतज़ार रहेगा, हर बार की तरह…इस संग्रह में कुल-72 गीत/कविता का शीर्षक अनुक्रम इस तरह है-
तब कविता जन्म लेती है/कैसे कहूँ आजाद हूँ/मृत्यु सुंदरी ब्याह करोगी?/शायद प्रेम वही कहला ये/भेज रहा हूँ तुझे निमंत्रण/चंदन हमें बबूल लगे/सबके अपने रास्ते हैं/अब तो जाने दो भाई! /रिश्तों का स्वामित्व खो गया/बंधन/जाना तय है/होम करते हाथ/तन जहाँ मंदिर सरीखा/मुझको नींद नहीं आती/मनमीता/मेरे सुख को जाने दो/माया/सपन संजोते देखो/एकाकीपन गीत-सृजन का तत्व हुआ/किसको घर कहता है पगले/सुर्ख लबों पर कड़वी बातें/मन को जरा टटोलो जी/मान जा ओ प्रिये/मसखरी कर गये/मन का दीप जला कर देख/मिसरी की डली लगे/अब तो ताना धूप पर/सूनी कलाई/नन्ही सी आशा/कल किये थे हाथ पीले/बेटी की व्यथा/बाल-दिवस का पर्व/एक बूँद तो छलक उठी होगी/नग़्में हुए उदास मेरे/बहुत देर कर दी/मैं और तुम/मैं केवल उच्चारण हूँ/पीड़ा होगी/तुम पास नहीं होती/पतझर जैसा मधुमास हुआ/कौन तारा झील से टकरा गया/न उसके नमक को भुलाना सखा! /मैं क्या करता/मत दो जीवन का वरदान/पगडंडी का राही हूँ मैं/उपमेय बने उपमान/तुम्हीं प्रेरणा कवि हृदय की/मंत्र कर्मों का/जन गण मन के मधुर सुरों से/कर्तव्य लौह के अरे! /दीपक क्या कहते हैं/अच्छे दिन/मजदूर दिवस पर विशेष/नहीं है पास कुछ अपने, मगर हम मुस्कुराते हैं/संबोधन!!!! /बचपन की स्मृतियां/चैत की चंदनिया/सावन आया याद [रोला गीत]/पहले सी अब नज़र न आती गौरैया/अब तो बसंत का बस, अंत नज़र आता है/किस मन से श्रृंगार करूँ/बस्तर बाला/तब फागुन, फागुन लगता था/कूँए की पीड़ा/गाँव/मेथी की भाजी/मटर/हरीमिर्च/पालक/गाज़र और टमाटर.
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तब कविता जन्म लेती

जब अपरिमित शून्य में मन को मिले सोते गरल के/लेखनी के अश्रु छलके, सिंधु ज्यों नमकीन जल के.
शुभ्र कागज का धरातल/सावनी सपने संजोये/भावना हल को चलाये/अक्षरों के बीज बोये/रूप धरते भाव सारे/खेत में तब कृषक-दल के
लेखनी के अश्रु छलके
गीत के बिरवा सुकोमल/पर्ण शब्दों से सजाये/सुमन छंदों के खिले ऋतुराज आये या न आये/सुख तितलियाँ, दु:ख भ्रमर तो पाहुने दो-चार पल के
लेखनी के अश्रु छलके
इस धरातल से अलग ही/कौन सा है वह धरातल/साधना तप ध्यान में मन, डूब जाता है ये चंचल/जब मथा जाता समुंदर/रत्न आते हैं निकल के
लेखनी के अश्रु छलके
अंत है अस्तित्व खोता/दरकती सीमा तनय की/नव-सृजन की पीर में जब/बाँसुरी बजती समय की/तब कविता जन्म लेती/दूर होते हैं धुंधलके
लेखनी के अश्रु छलके
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मृत्यु सुंदरी ब्याह करोगी?

मृत्यु सुंदरी ब्याह करोगी?
गीत मेरे सुन वाह करोगी?
सुख-दु:ख की आपाधापी ने,
रात-दिवस है खूब छकाया.
जीवन के संग रहा खेलता,
प्रणय निवेदन कर ना पाया.
क्या जीवन से डाह करोगी?
कब आया अपनी इच्छा से,
फिर जाने का क्या मनमीचा.
काल-चक्र कब मेरे बस में,
कौन भला है इससे जीता.
अब मुझसे क्या चाह करोगी?
श्वेत श्याम रतनार दृगों में,
श्वेत पुतलियां हैं एकाकी.
काले कुंतल श्वेत हो गए,
सिर्फ झुरियां तन पर बाकी.
क्या इनको फिर स्याह करोगी?
आते-जाते जल-घट घुंघट,
कब पनघट ने प्यास बुझाई.
स्वप्न-पुष्प की झरी पांखुरी,
मरघट ही अंतिम सच्चाई.
अंतिम क्षण निर्वाह करोगी?
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हरीमिर्च

हरी मिर्च की छबि निराली
बड़ी चुलबुली नखरे वाली.
चिकनी हरी छरहरी काया
रूप देख कर मन ललचाया.
ज्योंहि मुंह से इसे लगाया
सी सी सी सी कह चिल्लाया.
पानी पीकर शक्कर खाई
तब जाकर राहत मिल पाई.
मिर्ची बिन सब्जी तरकारी
स्वादहीन हो जाय बेचारी.
चटनी चाट कचौड़ी फीकी
जबतक मिर्ची ना हो तीखी.
तरुणाई तक हरा रंग है
ढली उमरिया लाल बंम है.
शिमला मिर्च है गूदे वाली
मिर्च गोल भी होती है काली.
हरी मिर्च दिखलाती शोख़ी
लाल मिर्च लगती है चोखी.
शिमला मिर्च बदन से मोटी
काली मिर्च औषधि अनोखी.
भिन्न-भिन्न है इसकी किस्में
विटामिन-सी होता इसमें.
इसके गुण का ज्ञान है जिसमें
विष हरने के करे करिश्में.
सब्जी में यह डाली जाए
कोई इसको तल कर खाए.
जब अचार के रूप में आए
देख इसे मुँह पानी आए.
हरी मिर्च की चटनी बड़िया
गर्म-गर्म हो मिर्ची भजिया.
फिर कैसे ना मनवा डोले
फूंक के खाए हौले-हौले.
खाने में तो काम है आती
कभी मुहावरा भी बन जाती.
मिर्च देख कर प्रीत जगी है
काहे तुझको मिर्च लगी है.
फिल्मी गीतों में भी आई
छोटी सी छोकरी नाम लाल बाई.
इच्चक दाना बिच्चक दाना
याद आया वो गीत पुराना?
नींबू के संग कैसा चक्कर
जादू-टोना, जन्तर-मन्तर.
धूनी में जब डाली जाए
बड़े-बड़े यह भूत भगाए.
मिर्च बड़ी ही गुणकारी है
तीखी है लेकिन प्यारी है.
लेकिन ज्यादा कभी न खाना
कह गए ताऊ, दादा, नाना.
अति सदा होता दु:खदाई
सेवन कम ही करना भाई.
रखना बस व्यवहार संतुलित
मन को कर देगी ये प्रमुदित.
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चैत की चंदनिया

चादर सी, चूनर सी-चैत की चंदनिया
झांझर सी, झूमर सी-चैत की चंदनिया
महुआ की मधुता सी, मनभाती- मदमाती
छिटके गुलमोहर सी-चैत की चंदनिया
अनपढ़-अनाड़ी सी, सल्फी सी- ताड़ी-सी
मादक-सी, मनहर सी-चैत की चंदनिया
अधपकी इमली सी, खटमीठी- खटमीठी
सरसों सी, सुंदर सी-चैत की चंदनिया
मनभाये बैरी सी, अमुआ की कैरी सी
टेसू सी, सेमर सी-चैत की चंदनिया
कोयल की कुहू-कुहू सी,
पपीहे की पीहू-पीहू सी
उड़ते कबूतर सी-चैत की चंदनिया
सतरंगी सपनों सी, दूर बसे अपनों सी
प्रिय की धरोहर सी-चैत की चंदनिया
मंगतू की मेहनत सी, चैतू की चाहत सी
गेहूँ सी, अरहर सी-चैत की चंदनिया
हल्बी सी, गोंडी सी, छत्तीसगढ़ी बोली सी
भोले से बस्तर सी-चैत की चंदनिया
ज्योति की शक्ति सी, भक्तों की भक्ति सी
माता के मंदिर सी-चैत की चंदनिया.
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प्रिय कवि मित्र अरुण कुमार निगम की कृति ‘चैत की चंदनिया’ पर जो भी कम बुद्धि में लिख पाया, लिख दिया. मेरे लिए आपकी प्रतिक्रिया ही सम्मान है, प्रतीक्षा रहेगी.
• अरुण कुमार निगम संपर्क-
[ 99071 74334 ]
• प्रदीप भट्टाचार्य संपर्क-
[ 94241 16987 ]
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chhattisgarhaaspaas
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