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लेख : चार दिन के तीजा, जिनगी भर के स्मृति : आलेख, विजय अग्रवाल

तीजा पर्व नारी जीवन के सबसे भावुक पर्वों मं गिनाय जाथे।
ये दिन सिरिफ व्रत अउ धार्मिक परंपरा नइ, बल्कि बेटी बर अपन मायके ल लौटे के पावन अवसर होथे।
बरस भर के इंतजार के बाद जऊन चार दिन बेटी अपन मां-बाबू, भाई अउ सखी-सहेली संगे बिताथे, ओ ह ओकर बर जिनगी भर के अमिट स्मृति बन जाथे।
गांव के बड़का आंगन मं चिरैया जइसन फुदकत रहिस नंदनी।
मां के अंचरा के ओट मं लुकाछिपी खेलना, बाबू संग गली-गली दौड़ लगाना अउ संगी-साथिन संग झूला झूलना – ये सब्बो पल ओकर बचपन के मया बनके बस गे रहिस।
बरस भर बाद तीजा आय।
नंदनी बर तीजा के माने सिरिफ उपवास नइ, बल्कि अपन मायके मं बचपन के हर पल ला फेर से जीना रहिस।
दरवाजा खोले के संग ही मां अपन अंचरा पसार के गले लगा लेवय, बाबू के आंख चमक उठिस।
गांव के गली मं खुसर-पुसर होए लगिस – “नंदनी आ गे हे!”
सखी फूलबाई कहे – “याद हे का, जब हमन डोंगरी के डहर पंखा खोजे गेन रहेन अउ तंय रोवत रहिस?”
कमली हंसत कहिस – “सावन मं झूला झूलत तंय गिरे रहिस अउ हमन ठहाका मारके हंसत रहिन।”
तीन दिन के तीजा नंदनी बर बचपन के पुनर्जन्म बन गे।
मां संग चूल्हा-चौका, बाबू संग बरगद के छांव मं गोठियाना अउ बहिनी-भाई संग खीर-पूरी खावत हंसी-ठिठोली – सब्बो पल ओकर मन मं नवा जिनगी जगाइस।
फेर चौथा दिन के बिहान बिदाई आ गे।
दरवाजा मं खड़ा बाबू के गला भारी हो गे – बस इतना ही कह पाय –
“औ, आवत रहु बेटी…”
मां अपन अंचरा मं लुकाय रुपया नंदनी के हथेली मं धरिस अउ बोली –
“कतेक जल्दी जात हस नोनी… कुछ दिन अउ रह गे रहित।”
आंसू पोछत-हंसत सखी-मन हाथ हिलाइन, अउ नंदनी धीरे-धीरे दूर जावत रहिस।
ओस दिन मां-बाबू दरवाजा मं खड़ा, आंख भर-भर के अपन तिजहारिन बेटी ला ताकत रहिन।
तीजा पर्व हमनला सिखाथे के –
बेटी सिरिफ जिम्मेदारी नइ, बल्कि मायके अउ ससुराल दुनों घर मं मया के सेतु आय।
समाज जऊन बेटियों के अपनापन अउ खुशी ला महत्व देवथे, ओ समाज हच सच्चा समृद्ध होथे।
बेटी के मायके संग जुड़ाव ला तीजा जइसन पर्व जिनगी भर जिन्दा रखथे।
बेटियां अपन मया अउ संस्कार ले घर-परिवार के असली आधार हवंती।
तीजा पर्व ह ये गवाही देवथे के बेटी बर मायके के चार दिन, पूरा जिनगी भर के संबल बन जाथे।
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chhattisgarhaaspaas
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