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शिक्षक दिवस पर विशेष : शत् शत् नमन त्रिलोकीनाथ क्षत्रिय
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त्रिलोकीनाथ
महाराष्ट्र में पचास वर्ष की उम्र में चले गए राजनेता मंत्री श्रीकांत जिचकर को लेकर कहा जाता है कि उनके पास बीस डिग्रियों का ढेर था क्योंकि वे जीवन भर पढ़ाकू रहे। वे उन बुलंदियों तक नहीं पहुंचे जहां शिक्षा के कारण पहुंच भी सकते थे। यही हाल हमारे दोस्त त्रिलोकीनाथ क्षत्रिय का रहा है। बारह साल हो गए। वे चले गए और मैं उनकी याद करता कभी कुछ ठीक से लिख भी नहीं पाया। एक बेहद दिलचस्प इंसान, मनुष्यता और अच्छाइयों से गहरा सरोकार, अपमानित और उपेक्षा होने पर भी मुस्कराहट से जवाब और साधारण होने की परिभाषा को अपने आचरण द्वारा असाधारण बनाने का अपराजित हौसला-इस दोस्त में ‘एकमेवो द्वितीयो नास्ति‘ की तरह रहा है। छात्र जीवन से ही उनसे परिचय होने से भिड़ंत होनी शुरू हो गई थी। हम दोनों का जन्मवर्ष एक है और उम्र में बमुश्किल 40 दिनो का फासला है।
वे इंजीनिरिंग के विद्यार्थी थे और मैं साइंस के बाद आर्टस का। हम दोनों अपने अपने क्षेत्र में बहुत प्रतिभाशाली छात्र नहीं थे। सही समझा जाता था। इसीलिए वादविवाद, भाषण, निबंध वगैरह की बौद्धिक प्रतियोगिताओं में अपने को बेहतर जताने की भड़ास निकालते रहते थे। जाहिर है दोनों प्रतिद्वंदी की तरह टकराते थे। मैं वाचाल तो था लेकिन मुस्करा नहीं पाता था। आज तक वह आदत कायम है। त्रिलोकीनाथ प्रतिद्वंदिता में दूर से मुस्कराता आता था और प्रतियोगिता का परिणाम कुछ भी हो, वह आपको अपने स्वभाव से ढेर कर देता था। उसके चेहरे पर पराजय, मायूसी, निराशा और हताशा को बहुत देर ठहरने का आदेश नहीं था। हम लोग उसके उलट थे।
तब पता नहीं था उसके अंदर कोई छोटा मोटा दार्शनिक दिमाग उथलपुथल कर रहा है। नौकरी तो उसने पेट पालने को भिलाई स्टील प्लांट में कर ली। लेकिन आठ विषयों में स्नातकोत्तर और वेद में पी.एच.डी. की उपाधि सहित वकालत और कई डिग्रियां बेहद धीरज और अध्यवसाय के साथ बटोरता गया। मैं तो कहता था तुम डिग्रियां लील रहे हो और जब कभी विमर्श करते हो तुम डिग्रियों की डकार लेते हो। वह इंजीनियर और मैं वकील बनकर दुर्ग जिले में साथ रहे। दोनों की अभिरुचियां, साहित्यिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और अन्य तरह की बौद्धिक गतिविधियेां में समान होने से भेंट और मुठभेड़ परस्पर होती रहती। कई गोष्ठियों में उसे बोलने जब निमंत्रित नहीं किया जाता, वह सहनशील श्रोता चुपचाप बैठा रहता। बैठक खत्म होते होते उठकर अपनी अभिव्यक्ति की आजादी के डैने पसारता। उसे चुप कराना मुश्किल होता। लेकिन समय का बंधन भी कई बार आयोजक को मजबूर करता है। त्रिलोकीनाथ का कहना होता कि आयोजन में यदि आप किसी श्रोता को सम्मान सहित बुलाते हैं तो उसकी ज्ञानेन्द्रियों का क्या होगा। यदि आप उसे मूक बधिर पशु की तरह समझें। यह कहने में संकोच नहीं है कि छात्र जीवन की दोस्ती के कारण उसे चुप कराने में मुझे आर्डर आर्डर कहने जैसी फितरत का इस्तेमाल करना होता। तब हम बाहर आकर एक दूसरे से चोंच लड़ाते। लेकिन उसका संतुष्ट होना सैद्धांतिक और व्यावसायिक रूप से जरूरी होता।
वह भौतिक और व्यावासायिक जीवन में बहुत कुछ हासिल नहीं कर पाया। दस्तूर तो यही है जमाने का कि प्राप्त सफलता से मनुष्य के गुणों का कोई रिश्ता नहीं होता। कैसे कैसे ऐसे वैसे हो गए हैं और ऐसे वैसे कैसे कैसे हो गए। त्रिलोकीनाथ की मुस्कराहट, गंभीरता, अतिथि सत्कार की भावना, दोस्त बनाने की कला और चरित्र से दुर्गन्ध को बीन बीनकर बाहर फेंकने का उसका जतन यादों के कबाड़खाने में बल्कि दिमाग की पाठशाला में पारचून की तरह पड़े हैं। आज उसका जनमदिन है। होता तो गलबहियां करने का अवसर देता। यह अवसर उसने हमसे छीन लिया।
[ • कनक तिवारी चाचाजी द्वारा पूज्य पिताजी को स्मरणांजलि- शुचि ‘भवि’. मेरे आदर्श कनक त्रिवारी जी को मैं हमेशा पढ़ता रहता हूँ, ये संस्मरण मैं शुचि ‘भवि’ के पटल से लिया है. • कनक जी और प्रिय शुचि माफ करना, स्वीकृति लिए बिना ‘छत्तीसगढ़ आसपास’ के पाठकों के लिए इस स्मरणांजलि को प्रकाशित कर रहे हैं- संपादक]
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