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- ‘साहित्य सृजन संस्थान’ के तत्वावधान में आयोजित काव्य संध्या में पूर्व आईएएस अधिकारी एवं साहित्यकार व इतिहासकार डॉ. संजय अलंग एवं संस्थान के अध्यक्ष वीर अजीत शर्मा की अध्यक्षता में काव्य पाठ हुआ : श्रेष्ठ काव्य पाठ में दीपिका ऋषि झा, पूर्व श्रीवास्तव, डॉ. चंद जैन अंकुर, डॉ. आरके अग्रवाल और विनोद कुमार को सम्मानित किया गया
‘साहित्य सृजन संस्थान’ के तत्वावधान में आयोजित काव्य संध्या में पूर्व आईएएस अधिकारी एवं साहित्यकार व इतिहासकार डॉ. संजय अलंग एवं संस्थान के अध्यक्ष वीर अजीत शर्मा की अध्यक्षता में काव्य पाठ हुआ : श्रेष्ठ काव्य पाठ में दीपिका ऋषि झा, पूर्व श्रीवास्तव, डॉ. चंद जैन अंकुर, डॉ. आरके अग्रवाल और विनोद कुमार को सम्मानित किया गया

👉 • काव्य संध्या में शामिल रचनाकार
रायपुर [छत्तीसगढ़ आसपास] : प्रस्तुति- डॉ. नौशाद अहमद सिद्दीकी ‘सब्र’

रायपुर : राज्य की प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्था ‘साहित्य सृजन संस्थान’ का चतुर्थ स्थापना दिवस विगत दिनों शहर के रचनाकारों की उपस्थिति में मनाया गया. आयोजन ‘विमतारा हॉल’ [मधु पिल्ले चौक, शांति नगर, रायपुर] में था. इस काव्य संध्या के मुख्य अतिथि थे, वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. संजय अलंग और अध्यक्षता संस्थान के अध्यक्ष वीर अजीत शर्मा ने किया. विशिष्ट अतिथि पत्रकार आसिफ इकबाल, राममूरत शुक्ला और सुरेंद्र रावल थे.
इस अवसर पर श्रेष्ठ काव्य पाठ सम्मान से श्रीमती दीपिका ऋषि झा, श्रीमती पूर्व श्रीवास्तव, डॉ. चंद जैन अंकुर, डॉ. आरके अग्रवाल और विनोद कुमार को संस्थान की तरफ से स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया.
काव्य संध्या का संचालन श्रीमती सीमा पाण्डेय ‘सीमा’ और संस्थान के संयोजक उमेश कुमार सोनी ‘नयन’ ने किया.
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काव्य संध्या में उपस्थित हुए-





डॉ. सिद्धार्थ श्रीवास्तव, अनामिका शर्मा, किशोर लालवानी, हबीब खान ‘समर’, अजय सोनी, विक्रम शारदा, सुनील शर्मा, विजया ठाकुर, वीरेंद्र शर्मा ‘अनुज’, विनय अंथवाल, उमाशंकर मिश्रा, आरडी अहिरवार, मनोहर सिंघ, रमनीत कौर, संजय पांडेय, डॉ. अर्चना पाठक, सुरेंद्र रावल, चैतन्य गोपाल, शिव शंकर गुप्ता, आशा मानव, डॉ. साधना कसार, अशोक शर्मा, संतोष शर्मा, उत्तम देवहरे, विद्या भट्ट, नेहा त्रिवेदी,सफदर अली, यशवंत साहू ‘यश’, विनोद कुमार और सुश्री कुमुद लाड.
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कुछ प्रमुख रचनाकारों की चंद पंक्तियाँ-

बस्ती जला बैठा गुमान देखो/कोई है नहीं बाकी मकान देखो/पैरों तले छाले न देख मेरे/है देखना तो इंमतिहान देखो…
– रोशन सुरेश
जिंदगी को कुछ अपनी सरल कीजिए/है सघन ये बहुत अब तरल कीजिए…
– सीमा पाण्डेय ‘सीमा’
उठा लाये हैं साजों को तराना छोड़ आये हैं/लबों पर उनके गीतों का खज़ाना छोड़ आये हैं/नयी फसलें उगाने का जतन करना है तुमको ही/मशीनी दौर में हम हल चलाना छोड़ आये हैं…
– उमेश कुमार सोनी ‘नयन’
अंधे लोग अंधा तंत्र/अंधी सोच अंधा मंत्र/सो रहे हैं इसी अंधकार में सभी की जैसे/खत्म न होगी ये रात कभी…
– हिना लखिसरानी
खिलने लगी हैं ज़हन में शाम से यादें,पारिजात सी/झरने लगी हैं यादें, आहिस्ता-आहिस्ता पारिजात सी…
– विद्या भट्ट
ये मेले हैं, तमाशे हैं, जहाँ जिधर देखो/सुकूँ की खोज में तो खोज में तो आज हर इंसान लगता है…
– पूर्वा श्रीवास्तव
ये जानते हैं जो भी हैं आईनादार लोग/उजले लिबास में हैं कई दाग़दार लोग/अपने लिए तो रखते हैं फूलों की आरजू/गैरों के रास्ते में बिछाते हैं खार लोग…
– सुखनवार हुसैन
मेरे इस जनाजे को कलम से सजा देना/पढ़ के मेरी ग़ज़ल मुझे आखिर विदा देना/सफेद पन्नों में नीला लफ्ज़ खूब जँचता है/ज़रा मेरे कफ़न में थोड़ी स्याही लगा देना…
– चैतन्य गोपाल
एक किलकारी घर में गूंजी/आंगन आंगन महक उठा/परी से प्यारी बिटिया आयी/पिता का मन लहक उठा…
– अदिती वर्मा
सुकून से बैठा हूँ मैं अपने गाँव में/हवा बहती है बरगद की छाँव में/डूबने निकला था उनकी आँखों में/बचाने आ गई वो अपनी नाव में…
– राहुल कलिहारी
उड़ता नहीं हूँ ऊँचा मैं तन्हाई के डर से/हर चीज़ नज़र आती है छोटी सी शिखर से/जो कुछ है मेरे पास/है मेहनत का नतीज़ा/आग़ाज़-ए-सफ़र था/मेरा सचमुच में सिफ़र…
– आरडी अहिरवार
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आयोजन की कुछ और प्रमुख सचित्र झलकियाँ-




[ • रिपोर्ट : डॉ. नौशाद अहमद सिद्दीकी ‘सब्र’ ]
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