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प्रगतिशील एवं जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ का गठन : भिलाई-दुर्ग के 15 साहित्यिक चिंतकों ने संगठित होकर बनाया, प्रगतिशील सृजन का ‘आरंभ’ : मूल उद्देश्य है- ‘आरंभ’ हो अंत न हो-चिंतन कभी कलांत न हो

👉 [बैठे में] बाएँ से- डॉ. सोनाली चक्रवर्ती, त्रमब्यक राव साटकर ‘अम्बर’, विनोद साव, रवि श्रीवास्तव, प्रदीप भट्टाचार्य, कैलाश जैन बरमेचा, सुबीर रॉय.
👉 [खड़े में] बाएँ से- दीप्ति श्रीवास्तव, अनिता करडेकर, शानू मोहनन, नुरूस्साबाह खान ‘सबा’, डॉ. रजनी नेलसन, संध्या श्रीवास्तव.
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• साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ का गठन
• मुख्य संरक्षक कैलाश जैन बरमेचा
• अंतरिम अध्यक्ष प्रदीप भट्टाचार्य बने
• पंजीयन के बाद पूर्णकालीन अध्यक्ष एवं अन्य पदाधिकारी की नियुक्ति
• साहित्यिक पत्रिका ‘आरंभ’ का प्रकाशन किया जाएगा
• ‘आरंभ’ सम्मान
• साहित्यिक आयोजन वर्षभर

👉 • भिलाई निवास में प्रथम सांगठनिक बैठक [11 नवम्बर, 2025] : बैठक की अध्यक्षता कैलाश जैन बरमेचा ने की. मोटिवेशनल स्पीच [Motivational-Inspirational Speech] रवि श्रीवास्तव एवं विनोद साव ने दिया.
भिलाई निवास के इंडियन कॉफी हाउस के सभागार में लेखक, कवि एवं समाजसेवी एकजुट होकर एक नई साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ का गठन किया. पहली सांगठनिक बैठक की अध्यक्षता समाजसेवी कैलाश जैन बरमेचा ने की. मोटिवशनल स्पीच [प्रेरक उद्बोधन] के लिए विशेष आमंत्रित किए गए थे. सुप्रसिद्ध कवि रवि श्रीवास्तव और सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार विनोद साव.

👉 • कैलाश जैन बरमेचा, रवि श्रीवास्तव और विनोद साव का पुष्पगुच्छ से स्वागत किया डॉ. रजनी नेलसन, डॉ. सोनाली चक्रवर्ती और दीप्ति श्रीवास्तव ने.
प्रारंभिक संचालन डॉ. सोनाली चक्रवर्ती ने किया. ‘आरंभ’ की परिकल्पना और भूमिका के बारे में प्रदीप भट्टाचार्य ने बताया.
शायरा नूरुस्सबाह खान ‘सबा’ ने संस्था के उद्देश्य को पढ़ा-

नवचिंतन का आलंब है ‘आरंभ’. साहित्य मात्र शब्दों का जाल नहीं है, यह वह शक्ति है जो सीधे जुबान से दिल में उतरकर आत्मा को छू लेती है. इसकी व्याख्या करने में यदि सदियाँ भी लग जाएं तो कम है. यही कारण है कि साहित्य ने समाज में समय- समय पर बड़े-बड़े परिवर्तन किए हैं. आज आवश्यकता इस बात की है कि साहित्य के नाम पर अनर्गल प्रस्तुतियों के बीच हम उस साहित्य को आगे लाएं जो समाज को दिशा दें. आत्मा को तृप्त करें और इंसानियत के मूल्यों को मजबूत बनाए. इसी संकल्प के साथ हमारी नई साहित्यिक संस्था नव चिंतन का आलंब है ‘आरंभ’ की नींव रखी है. हम मानते हैं साहित्य एक का नहीं, सबका है. ज़रुरी नहीं है कि हर व्यक्ति लेखक, कवि, शायर हो. यदि आप अच्छे श्रोता हैं या पाठक हैं तो भी आप साहित्य को अपना योगदान दे रहे हैं. साहित्य सेवा है, साधना है, जो अंतिम सांस तक निरंतर चलती रहती है. किसी भी साहित्यकार की असली पहचान उसकी लेखनी से झलकती है न कि दिखावे और झूठे सम्मानों से. विश्व प्रसिद्ध कथाकार प्रेमचंद ने कहा था- ‘हर वह सफलता हार है जिसका लक्ष्य किसी को नीचा दिखाना है’. हरिशंकर परसाई का कथन भी स्मरणीय है- ‘सत्य को भी प्रचार चाहिए, अन्यथा वह मिथ्या मान लिया जाता है’. इन्हीं प्रेरणाओं के आधार पर हम सबने बनाया नव चिंतन का आलंब है ‘आरंभ’. बिना भेदभाव के सबको जोड़ना. हर साहित्य साधक को सम्मान देना. ‘मैं’ से ऊपर उठकर ‘हम’ की भावना को स्थापित करना और साहित्य को समाज और आम लोगों से जोड़ना.
फाउंडर सदस्य ‘सबा’ ने कहा कि- हमारी प्रतिबद्धता- हमारे प्रयास गागर में सागर भरने जैसे होंगे. यदि ईश्वर ने चाहा तो यह संस्था एक ऐसा मंच बनेगी जहां साहित्यिक साधक अपनी साधना से समाज को नई दिशा देंगे. आरंभ हो अंत न हो-चिंतन कभी कलांत न हो. हमारी संस्था हर उस व्यक्ति का स्वागत करेगी जो साहित्य की शक्ति में विश्वास रखता है, जो समाज को बदलने का सपना देखता है और जो बिना किसी स्वार्थ के लेखनी को मानवता की सेवा मानता है. कौन कहता है कि आसमान में सुराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों. प्रगतिशील सृजन की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ का प्रारंभ इसी विश्वास के साथ किया जा रहा है कि हम सब मिलकर [कैलाश जैन बरमेचा, डॉ. महेशचंद्र शर्मा, प्रदीप भट्टाचार्य, डॉ. सोनाली चक्रवर्ती, डॉ. रजनी नेलसन, नुरूस्साबाह खान ‘सबा’, अनिता करडेकर, तारकनाथ चौधुरी, पल्लव चटर्जी, त्रयम्बक राव साटकर ‘अम्बर’, शानू मोहनन, दीप्ति श्रीवास्तव, संध्या श्रीवास्तव, सुबीर रॉय, ठाकुर दशरथ सिंह भुवाल, आलोक कुमार चंदा] साहित्य के इस अथाह सागर से कुछ बूंदें लेकर अपनी आत्मा को भी तृप्त करेंगे और समाज को भी एक नई दिशा प्रदान करेंगे.
इस कड़ी में साहित्यिक पत्रिका ‘आरंभ’ का शुभारंभ होगा. देश में प्रकाशित तमाम साहित्य की पत्रिकाओं में हम एक नई पहचान बनाने की कोशिश करेंगे. और वर्ष भर होते रहेंगे अनेकों साहित्यिक आयोजन, साथ में ‘आरंभ’ के स्थापना दिवस पर देंगे ‘आरंभ सम्मान’.

👉 • विनोद साव और रवि श्रीवास्तव ने सारगर्भित उद्बोधन दिया और अध्यक्षता कैलाश जैन बरमेचा ने की.
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बैठक में अंतरिम अध्यक्ष का सर्वसम्मति से मनोनयन किया गया-
सदन में डॉ. सोनाली चक्रवर्ती ने प्रदीप भट्टाचार्य के नाम का प्रस्ताव रखा, जिसका अनुमोदन डॉ. रजनी नेलसन ने किया. उपस्थित सभी संस्थापक सदस्यों ने समर्थन किया. प्रदीप भट्टाचार्य द्वारा आगामी बैठक में बाकी पदों और कार्यकारणी का गठन करेंगे.
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बैठक के दूसरे सत्र में सदस्यों ने अपना-अपना परिचय दिया.
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अध्यक्षता कर रहे कैलाश जैन बरमेचा ने संगठन के बारे में दिशा-निर्देश दिए. जिसका पालन करने का सभी सदस्यों ने संकल्प लिया. आभार व्यक्त अनिता करडेकर ने किया.
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