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कविता आसपास : पल्लव चटर्जी [छत्तीसगढ़-भिलाई]
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भाषाहीन प्लेटफाॅर्म

ठंड के मौसम में
ट्रैन निकल जाने के बाद
पुनः भाषाहीन हो जाता है प्लेटफार्म
कम्बल ओढ़ कर सोये हुये इंसान
मिश्र के ममी जैसे पड़े रहते हैं
इधर -उधर ।
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परिवर्तन

इन दिनों पुजा , होम करने को
प्रेरित किया जा रहा है .देशभर में…
अब किसान धान बेचकर
पर्याप्त कमा नहीं पा रहा है अतः
घी बेचने में उत्साहित दिखाई देता है।
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दर्द अच्छा है

वर्षों से कभी दर्द को पालता रहा हूं मैं
कभी दर्द मुझे ,
ऐसे में दर्द सहने की
मुझे आदत हो गई और अब
दर्द मुझे अच्छा लगने लगा है।
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[ • प्रख्यात बांग्ला कवि पल्लव चटर्जी ने हिंदी में भी प्रगतिशील कविता लिखी हैं. • छोटी-छोटी कविता में संभावना तलाशती रचनाएँ हमें बहुत कुछ सिखा जाती हैं. कम पंक्तियों में पल्लव चटर्जी की कविताएँ ज्यादा घेराबंदी करती हैं. समकालीन कविता को जोड़ती हुई सार्थक रचनाशीलता आपकी कविता में दिखाई देती है. • ‘बंगीय साहित्य संस्था’ और ‘आरंभ’ साहित्यिक समिति के आप सक्रिय सदस्य हैं और लेखन कार्य निरंतर जारी है. • कवि संपर्क : 81093 03936 ]
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chhattisgarhaaspaas
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