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संस्मरण : वंदना अब सयानी हो गई – कैलाश जैन बरमेचा

वंदना कब हमारे घर की धड़कन बन गई, यह किसी तारीख़ या मौसम ने नहीं बताया। समय की अपनी चाल होती है—धीमी, शांत, अनदेखी। पिंकी जब पहली बार उसे हमारे साथ लाई थी, वह सात–आठ वर्ष की मासूम गुड़िया जैसी बच्ची थी। मेरे सामने आते ही वह पिंकी के पीछे छिप जाती थी और धीरे-धीरे कोने से सिर निकालकर मुझे देखती थी। उसकी आँखों में डर भी था और अपनापन भी—एक ऐसा मिश्रण, जो दिल को छू ले।
धीरे-धीरे वह हमारे घर के हर काम का हिस्सा बनती चली गई। मंजू आंटी के साथ काम करते-करते, उनसे सीखते-सुनते, घर की आवाज़ों और दिनचर्या में घुलती-मिलती हुई वह बच्ची से लड़की और लड़की से परिवार की सदस्य बन गई।
और हाँ… वह अपनी उम्र के बच्चों की तरह जिद्दी और नटखट भी थी। काम करते-करते कई बार वह मंजू आंटी की बातों को काट देती, उल्टा जवाब दे देती, या उन्हें इग्नोर कर जाती। मंजू कभी-कभी हँसते हुए, कभी गुस्सा दिखाते हुए कहतीं—
“अभी तेरी मम्मी को बताती हूँ… या अभी अंकल को बताती हूँ।”
यह सुनते ही वंदना का पूरा चेहरा एकदम गंभीर हो जाता। वह फटाफट अपनी गलती सुधारती, झाड़ू वहीं उठाती या बर्तन तुरंत धोने लगती। यह उसकी नटखट फितरत भी थी और आंटी के प्रति गहरा सम्मान भी—वह प्यार से बिगड़ती थी, पर अनुशासन का नाम आते ही सधा हुआ व्यवहार कर लेती थी।
पर उसकी सबसे अनोखी खूबी उसका मौन “जय हिंद” सलाम था।
हर सुबह आते ही वह दाहिना हाथ अपने मस्तक पर रखकर बिना बोले मेरा अभिवादन करती थी। उसकी आँखों की चमक में इतना साफ़ भाव होता था कि शब्दों की आवश्यकता ही नहीं रहती थी। कई बार 8:30 भी बज जाते और वह न आती तो मुझे बेचैनी घेर लेती। और जैसे ही वह देहरी पर आती, वह मौन सलाम करती—मेरे भीतर एक अजीब-सी शांति उतर आती।
वह बड़ी होती चली गई। समय जैसे उसके चेहरे पर अपनी कोमल उंगलियों से सौंदर्य का हल्का रंग भरता गया। दस–बारह वर्ष की उम्र पता ही नहीं चला कब सोलह साल में बदल गई। और सोलह वर्ष की उम्र वह होती है जब प्रकृति किसी लड़की की आँखों में सपने और चेहरे पर सितारे टांक देती है। वंदना भी बदल रही थी—उसकी आँखों में चमक, चाल में लय और मुस्कान में मासूम गरिमा आ गई थी।
अब मोहल्ले के लड़के उसे पलट-पलटकर देखने लगे थे। कोई उसके पास से गुजरते हुए ठिठक जाता, कोई उसके बालों की उड़ती लट को देखकर मन ही मन मुस्कुरा देता, कोई बिना कहे ही रुक जाता। वंदना यह सब महसूस करती थी। वह घर आते ही मंजू आंटी को सारी बातें बताती—
“आंटी, आज वो लड़का फिर देख रहा था…”,
या
“अंकल, आज मोहल्ले में दो-तीन लड़के पलट-पलट कर देख रहे थे…”
उसकी बातें सुनकर मंजू कभी डाँट देती, कभी हँस पड़ती, और कभी उसे समझाती कि दुनिया को देखकर घबराना नहीं चाहिए। वंदना अपनी बातें साझा करके हल्की हो जाती—यह उसकी सच्चाई और मासूमियत दोनों का प्रमाण था। वह सयानी हो रही थी, पर सयानी होकर भी अपने अंकल-आंटी पर वही भरोसा रखती रही जैसा बचपन में रखती थी।
12वीं के बाद मैंने और मंजू आंटी ने वंदना को आगे बढ़ाने का निर्णय दृढ़ता से लिया। हमने उससे कहा—
“वंदना, तुम नर्स बन सकती हो। यह पेशा सेवा, सम्मान और स्वाभिमान का रास्ता है।”
उसने कुछ नहीं कहा, लेकिन उसके सिर झुकाने में सहमति थी। उसकी आँखों में सपनों की चमक पहली बार साफ दिखाई दे रही थी।
हमने उसका नर्सिंग कॉलेज में दाखिला करवाया। फीस, किताबें, यूनिफॉर्म, सबका पूरा सहयोग दिया। उसे एक्टिवा भी दिलाई ताकि वह आसानी से अस्पताल जा सके। पर कॉलेज में पहुँचने के बाद भी वह अपने घर और अपने लोगों को नहीं भूली। रोज़ शाम को लौटकर वह सबसे पहले हमारे घर आती। मंजू आंटी का काम करती, सफाई करती, किचन में मदद करती। वह हमेशा कहती—
“अंकल, आंटी… यह घर मेरा है, मैं काम क्यों न करूँ?”
₹25,000 वेतन मिलने के बाद भी उसके स्वभाव में कोई बदलाव नहीं आया।
वह एक्टिवा पर कभी अपनी माँ पिंकी को बाज़ार ले जाती,
कभी मंजू आंटी को भीड़ में सब्ज़ियाँ दिलाने ले जाती,
कभी उन्हें चाट खिलाती,
कभी घर का सामान लाती।
उसकी सादगी और अपनेपन की महक हमेशा वैसी ही रही।
इसी दौरान पीयूष उसके जीवन में आया। बातचीत हुई, परिवारों ने पसंद किया, रिश्ता तय हो गया। शादी के दिन मंजू आंटी ने उसे छोटी बेटी की तरह विदा किया। मैं उसके माथे पर हाथ रखकर आशीर्वाद देता रहा। जाते समय उसने एक बार फिर वही मौन “जय हिंद” किया—और मेरे मन ने कहा, “हमारी वंदना अब सचमुच सयानी हो गई है।”
शादी के पाँच वर्षों बाद मेरा भयंकर एक्सीडेंट हुआ। मेरे पैर की हड्डी टूट गई, और मैं महीनों तक बिस्तर पर पड़ा रहा। शरीर का दर्द तो था ही, पर मन का दर्द उससे कहीं अधिक था—अपनी असहायता का, अपनी निर्भरता का।
जिस दिन यह खबर वंदना तक पहुँची, वह एक पल की भी देर किए बिना अपने ससुराल से निकलकर सीधे घर पहुँची। देहरी पर पहुँचकर वह ठहर गई। उसने दीवारों को देखा, खिड़कियों को छुआ, आँगन पर कदम रखे—और उसे लगा जैसे घर की हर चीज़ उससे बात कर रही हो।
“याद है वंदना, तुमने यहाँ झाड़ू लगाया था…”
“यही खिड़की तुमने रोज़ साफ की थी…”
“यही आँगन है जहाँ तुम बड़ी हुई हो…”
वह रोई भी, मुस्कुराई भी। यह घर उसके लिए केवल ईंट और पत्थर का ढाँचा नहीं था, यह उसके बचपन की कोख था।
वह मेरे पास आई, मेरा हाथ पकड़ा और बिना बोले ही कह दिया—
“अंकल… मैं आ गई हूँ।”
उसके बाद उसने रात-दिन मेरी सेवा की।
दवाइयाँ, पट्टियाँ, ग्लूकोस, नर्सिंग—सबकुछ पूरे मन, प्रेम और समर्पण से किया।
उसकी सेवा में करुण रस की गहराई थी,
उसकी निगाहों में श्रृंगार रस की कोमल मानवीयता थी,
और उसके साहस में वीर रस की चमक थी।
तभी समझ आया—
जीवन में कोई भी अच्छा काम कभी व्यर्थ नहीं जाता। वह सौ गुना प्रेम, सौ गुना सेवा बनकर लौट आता है।
वंदना कोई गरीब लड़की नहीं थी,
वह स्वाभिमान और हौसले से जीने वाली लड़की थी।
अगर वह ठान लेती, तो दुनिया की कोई ताकत उसे आगे बढ़ने से नहीं रोक सकती।
और उसने यह सिद्ध करके दिखाया।
वंदना अब सयानी हो गई—
और सयानी होकर उसने दुनिया को यह सिखा दिया
कि असली सौंदर्य चेहरे में नहीं,
बल्कि हृदय में छिपी कृतज्ञता में होता है।
[ • छत्तीसगढ़-दुर्ग के समाजसेवी कैलाश जैन बरमेचा साहित्य में रुचि रखते हैं.नवगठित प्रगतिशील एवं जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ के मुख्य संरक्षक व सलाहकार हैं. ]
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