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साहित्यिक स्तम्भ ‘आरंभ’ में इस सप्ताह शामिल हैं – त्रयम्बक राव साटकर ‘अंबर’ और डॉ. बीना सिंह ‘रागी’

[ • इस स्तम्भ ‘आरंभ’ में आयोजनों पर रचनाकारों द्वारा पठन की जाने वाली रचना को प्रकाशित की जाएगी. बीते दिनों ‘भिलाई वाणी’ सम्मान समारोह में काव्य गोष्ठी हुई. काव्य पाठ करने वालों में त्रयम्बक राव साटकर ‘अंबर’ और डॉ. बीना सिंह ‘रागी’ ने ‘छत्तीसगढ़ आसपास’ को अपनी पढ़ी गई पूरी रचना को हमें भेजी, हम उनकी कविता/गीत को स-सम्मान प्रकाशित कर रहे हैं. आप भी किसी साहित्यिक कवि सम्मेलन में शिरकत करते हैं तो आयोजन की तस्वीर के साथ अपनी पूरी रचना को प्रेषित करें- संपादक]
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– कवि त्रयम्बक राव साटकर अंबर [छत्तीसगढ़-भिलाई]

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गीत : लेखन के कर्णधार

वो लेखन के कर्णधारों
तुम्हें नमन, तुम्हें नमन
वो लेखन के कर्णधारों…
मन की गंगा,
अब हुई प्रवाहित है.
करने सृजन समाज का
मन समाहित है.
हर दिल में तुम प्यार जगाओ,
और खिला दो
नया सुमन, नया सुमन, नया सुमन
वो लेखन के कर्णधारों…
कुरीतियों का सर
कुचल दो कागज पर.
कलम की धार
पैनी कर दो कागज पर.
घर-घर में तुम दीप जलाओ,
और फैला दो
नई किरण, नई किरण, नई किरण
वो लेखन के कर्णधारों…
रिश्ते दर-दर की
ठोकर खाने लगी है.
रिश्तों में परत
धूल की जमनें लगी है.
रिश्तों को तुम वापस लाओ,
और बना दो
नया चमन, नया चमन, नया चमन.
वो लेखन के कर्णधारों…
अम्बर की बुलंदी
छूने मन आतुर है.
धरा को स्वर्ग बना
देने मन व्याकुल है.
प्यार की वर्षा हो धरा पर,
ऐसा रच दो
नया गगन, नया गगन, नया गगन.
वो लेखन के कर्णधारों…
तुम्हें नमन, तुम्हें नमन, तुम्हें नमन.
दंगों का तुम चोला चीरो
और पहना दो
नया वसन, नया वसन, नया व सन.
ऐसी रचना का सृजन कर दो,
सबका धुल जाए मन
धुल जाए मन, धुल जाए मन.
वो लेखन के कर्णधारों…
[ • कवि, गीतकार, उपन्यासकार, विचारक बाल साहित्यकार त्रयम्बक राव साटकर ‘अंबर’ भिलाई इस्पात संयंत्र से संबद्ध ‘लिट् टरी क्लब’ के अध्यक्ष रहे. ‘धरा का प्यार’/’अभी स्फुर्ति है पैरों में’/’लेखन के कर्णधार’/’लहरों की हड़ताल’/’ मिट्टी का घड़ा’/’हिम्मत की पोटली’ और वर्ल्ड रिकॉर्ड की एन्थोलॉजी बुक ‘द मेगा मेनुस्क्रिप्ट’ के लेखक ‘अंबर’ ने अब तक 20 से अधिक किताबें लिख चुके हैं. हाल में गठित प्रगतिशील एवं जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ के संस्थापक सदस्य हैं. ]
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डॉ. बीना सिंह ‘रागी’
[ छत्तीसगढ़-भिलाई]

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प्रणय गीत

डोर रिश्ते की
तन कोमल श्यामल सी देह नवल
सोंधी सोंधी खुशबू लिए पुरवाई थी/स्वर्णिम किरणों को तन पे ओढ़े/हाँ मैं उनको खूब भायी थी.
बड़े मोहक दिन थे/मदहोश कर देता उनका आलिंगन/मृदुल वाहू पाश/मैं समर्पित करती तन-बदन/कजरारे चंचल नैना/उस पर अधरों पर मुस्कान/बातों से पुष्प झरा/घायल हुआ पुरुष अभिमान/यौवन की दहलीज पर कामदेव और रति ने आयाम पाठ पढ़े.
अहम तिरोहित हुआ/हमने होले-होले प्रेम पाठ पढ़े/साथ जन्मों तक संग-संग जीने मरने का आश्वासन/नारी के समर्पण से डोल उठा पुरुष का सिंहासन/गंगा जल की भांति निर्मल मन ना संशय की भाषा/मिट्टी की सोंधी महक सा गढ़ डाला हमने रिश्ते की परिभाषा.
मनी मानिक स्वर्ण रजत नहीं/अप्सरा नहीं देविका/अनजाने पथ पर चल पड़ी तुझ संग तेरी साधका/अहो कितने अनमोल घड़ी थे/जब व मुझको और मैं उनको रास आई थी.
स्वर्णिम किरणों को तन पर ओढ़े,
हाँ मैं उनको खूब भायी थी.
तन कोमल श्यामल सी देह,
नवल सोंधी-सोंधी,
खुशबू लिए पुरवाई थी.
[ • डॉ. बीना सिंह ‘रागी’ देश में हो रहे अनेकों मंचों पर काव्य पाठ के लिए आमंत्रित की जा रही हैं. नामचीन साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित ‘रागी’ जी आकाशवाणी एवं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित/प्रसारित हो रही हैं. ]
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chhattisgarhaaspaas
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