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कहानी : दीप्ति श्रीवास्तव
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ममता का कहर
– दीप्ति श्रीवास्तव
[ छत्तीसगढ़-भिलाई ]

सन्नाटे को चीरती कुत्तों की आवाज बड़ी खतरनाक मालूम हो रही थी । मुहल्ले के लोगों को उन कुत्तों के बीच जाने की हिम्मत नहीं हो रही थी। जहां गंदगी इक्कठा थी वह ये क्यों भौंक रहे है परंतु उस पगले का क्या ? जिसे रोज मुहल्ले वाले दया कर खाने को दो निवाले दे देते थे रात टीन के शेड के नीचे , जो उन लोगों के मुहल्ले का बस स्टॉप था वहीं गुजारता । कहां से आया कहां का है कोई नहीं जानता बरसों से उसे वहीं पड़े देखते क्या गुनता और क्या बुनता रहता किसी को नहीं मालूम फिर भी दयावश खाना देते । हां इतना जरूर था कि कभी किसी को नुकसान या अपशब्द नहीं कहता। परोपकार की भावना से वशीभूत हो उसे कभी कभी नहलवा दिया जाता नाई बुला कर हजामत बनवा देती है.
उसमें विशेष बात जो मुहल्ले वालो ने देखी बच्चों के प्रति उसे बहुत लगाव था । मुहल्ले के बच्चे जहां खेलते वह घंटों एक आसन में बैठा रहता । लोगो को लगता पगला बैठा है तो बच्चे सुरक्षित है। कोई बच्चा गिरता तो दौड़ के उसको उठने पहुंच जाता ।
खूंखार कुत्तों के बीच पहुंच उनको लकड़ी से मार भगाया गनिमत थी कुत्ते उस पोटली को मुंह नहीं लगाया । भौंक भौंक कर उस पोटली का मुआयना कर सूंघ रहे थे.
वरना उस पोटली में बंधे मांस के लोथड़े का क्या हाल होता सोच कर रूह कांप जाती । वह कौन बेबस या निर्दयी ममता विहीन जिसने इसे यहां कूड़े में डाल गया ,पोटली उठा पगला शेड में ले आया नवजात के रोने की आवाज बंद नहीं हो रही थी । मुहल्ले के लोग भी पहले कुत्तों की आवाज सुन क्या हुआ करके अपने घरों से झांकते रहे फिर पगले को उस ओर जाते देख घरों में चले गये पहले तो कुत्तों की आवाज में नवजात की आवाज दब गई थी ।अब जोर जोर से रोने की की आवाज आ रही थी.
शिशु की आवाज से घर की औरते भी निकल शेड में आ गई। नजारा देख सभी का मुंह खुला का खुला रह गया अचंभित से मूर्तिवत खड़े रह गए।
पगला बच्चे को कलेजे से चिपका चुप करा रहा था
“मेरा राजा बेटा , मेरा मुन्ना …यह दृश्य देख”
उन लोगों को दिल पसीज गया किसी को ध्यान आया कि बच्चा भूखा है इसलिए रो रहा है
दूध और दवा पिलाने वाला ड्रापर ले आया
बच्चे को पगले से लेने की कोशिश किए तो उसने और जोर से उसे भींच कर कस लिया। कोई उपाय न देख दूध और ड्रापर भी जमीन पर रख दर्शक बन ताकने लगे.
घोर आश्चर्य ? पगला ड्रापर से बच्चे को दूध पिलाने लगा ऐसा हस्तसिद्ध जैसे बरसों से इस काम को कर रहा है । उससे बच्चे को लेने की हिम्मत किसी के पास नहीं थी । सलाह मशविरा कर पुलिस को खबर करना लोगो को उचित लगा ।
पुलिस आई जबरजस्ती बच्चे को ले अस्पताल पहुंचा दिया । पगला जार जार सिसक सिसक कर रोता रहा । किसी को उस पर तरस नहीं आया और न किसी के पास इतना समय था सोचने का कि बच्चे से इतना लगाव कैसे ? पगले की भावनाओं में इतना उफान क्यूं ? क्या इसके पीछे कोई वजह है। खैर एक पागल के लिए समाज तो क्या घर में भी जगह नहीं होती तभी तो यहां पड़ा था । जमाना तेजी से भाग रहा है हम सब उसके साथ कदम ताल कर चल रहे हैं। परिवार टूट रहे है बच्चे असुरक्षित हो रहे है । लोगों का मानसिक तनाव बढ़ रहा है जो उसे झेल नहीं पाया वह पागल हो गया । कही इस पागल के पीछे भी ऐसी ही कोई घटना तो नहीं छुपे हुए सत्य से दुनिया अंजान …।
दूसरे दिन अखबारों की सुर्खियों में भूख से मरने वालों की खबर में मुहल्ले के पागल की तस्वीर छपी थी । मुहल्ले वाले न्यूज पढ़कर अवाक.. उन लोगों का मानना था उसके मरने की वजह भूख नहीं बल्कि वह नवजात शिशु था जिसे उसने जिगर के टुकड़े की तरह सीने से चिपटाए रखा था।
नम आंखों से मुहल्ले वालो ने उसका अंतिम संस्कार किया किसी को उसका नाम जाति धर्म नहीं मालूम । पर हां वह उस मुहल्ले का एक सदस्य था जो वोट की राजनीति से परे था उसकी बच्चे के प्रति ममता देख मानव धर्म पर सबकी आस्था बढ़ गई।
[ • दीप्ति श्रीवास्तव, कथाकार के रूप में छत्तीसगढ़ में मुक्कमल स्थान रखती हैं. दीप्ति जी नवगठित प्रगतिशील व जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ की संस्थापक सदस्य हैं. ]
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chhattisgarhaaspaas
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