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कहानी : विद्या गुप्ता

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सज़ा एक सदी की…
– विद्या गुप्ता
[ छत्तीसगढ़-दुर्ग ]

एक कहानी सुनिए -एक नानी थी, उसकी एक बेटी और उसकी एक बेटी थी. यानी सत्यवती की बेटी मैनावती और मैनावती की बेटी रानी.यानि एक पूरी सदी. ‘औरत’ की एक सदी की यात्रा………. नानी की ज़िन्दगी को बचपन से ही ग्रहण लग गया था. पूरी ज़िन्दगी जंग लगे लोहे सी सुरसुराती अंततः जहाँ की तहां बिखर कर भूमिसात हो गयी.अस्सी साल की पहाड़ सी इंसानी जिंदगी तिल तिल कटते पूरी हुई……!!
एक साठ साल के पुरुष की मृत्यु हुई, उसी दिन मात्र पन्द्रह वर्ष की अर्ध यौवना भी मृत घोषित कर दी गयी…… अब उसे इच्छाओं के साथ जीने का हक नहीं था. अब वह केवल दूसरों की दया पर, याचनाओं और समझौतों के साथ ही जी सकती थी. …..’नानी की जिंदगी ‘..एक सामान्य घटना का असामान्य परिणाम बनकर पथरा गई. कोरे कागज सी हो गई थी. जिसकी सफेदी बचाना भी उसकी शक्ति और अधिकार से बाहर था. और न्याय के लिए आवाज उठाना, इन निरीह पंखों के लिए असम्भव था……..
‘बाल विधवा’ हो जाना उस युग की उतनी ही सामान्य बात थी, जितनी एक अधेड़ से अधिक उम्र के आदमी की मौत. अलबत्ता अधेड़ की मृत्यु के अफ़सोस का पक्ष बाल विधवा की तुलना में अधिक भारी था.
-जैसे- ‘सेठ सुखलाल जी मर गये,
-अरे कैसे ?…. कल ही तो मिले थे, बड़े भले आदमी थे …… अच्छा पैसा कमाया था ….. कंजूस थे, पर बेटों के लिए खूब धन छोड़ गये. बहुत जीवट मजबूत आदमी थे तीन- तीन ब्याह किये,आठ दस बच्चों का भरा पूरा परिवार ……..वो तो सिर में चोट लगने से मरे, नहीं तो तीसरी के भी बाल बच्चे होते ही.बेचारे सेठ सुखलाल जी ……जिंदगी भर कमाया ,मगर जब सुख भोगने का समय आया तो चले गये…..
किन्तु, इस सारे स्यापे में सत्यवती के वैधव्य या उसकी शेष बची ज़िन्दगी अब कैसे कटेगी ? इसका कहीं कोई अफ़सोस या चर्चा नही थी.जैसे सत्यवती का वैधव्य एक क्रिया की प्रतिक्रिया भर था . बस अब आगे कहने को इतना ही है कि, उसकी उम्र से बड़े, सौतेले बच्चों द्वारा निर्वासित कर दी गई सत्यवती को अंतत: उन भाइयों के साथ ही सारी जिंदगी जीना पड़ी ,जिनके पास सुबह शाम की रोटी ही सबसे बड़ा सवाल थी. चार कौर रोटी और छत के लिए पूरी जिंदगी को रहन रखना पड़ी……सूरज के उगने से ढलने तक ,सिर्फ काम ही काम…!!और ऐसे ही खटते घिसटते जीवन की शाम हो गई .
हां एक छोटी सी घटना का जिक्र और जरूरी है कि, सत्यवती के साथ एक करीबी रिश्तेदार ने उसकी निरीहता का फायदा उठाकर जबरदस्ती की और नाम उजागर करने पर जान से मार देने की धमकी…..एक डरी हुई औरत, अर्धविक्षिप्त सी हो गई,….. क्योंकि वह चीख भी नहीं पाई…..!! ऊँगली नहीं उठा पाई उसकी ओर …..!!क्योंकि उस आदमी का गिरेबान उसकी उगंलियों की पहुंच से बाहर था. और ऐसे हुआ सदी की दूसरी औरत का जन्म हुआ|
दूसरी औरत यानि सत्यवती की बेटी मैनावती……!! एक अर्धविक्षिप्त, कुलटा और अभागन माँ की बेटी के भाग्य को किस गज से नापे !! उसके भाग्य की थाली में इतना बड़ा छेद था कि, उसमें से आंसुओं के अलावा सब चू जाता था. उसके पैदा होने पर घर में थाल बजाने की परम्परा चू गई ,क्योंकि कुकर्म का फल थी…..तुतलाते बचपन पर न्योछावर होने वाली ऑंखें चू गई …… डिठौना लगाती और बलाएं लेती नजरें चू गई ….डगमगाते पैरों ने चलना सीखा, मगर आंगन ने देखा तक नहीं ….किशोर होती उम्र को देहरी ने टोका नहीं ……और जवानी की खुशबु महसूस हो उसके पहले ही नफरत और घृणा से भरे एक अहसास निट्ठले बौने गोपाल को जिंदगी भर के लिए उसके तन मन और आत्मा के साथ बांध दिया गया.जवान होती मैनावती ऐसा कमल थी जिसके साथ उपर तक कीचड़ लिपटा हुआ था.
मैना जवानी की खिलन को कुछ समझे उससे पहले ही गोपाल जैसे सर्द कोहरे ने उसे आपादमस्तक ढांक दिया. मैना का ब्याह….!! कैसे होगा ?कौन करेगा इससे ब्याह, जिसके बाप का ही पता न हो.माँ विधवा उपर से कुल्टा……हर प्रश्नों का हल लेकर गोपाल मिला. कद और बुद्धि से बौना गोपाल किसी भी प्रश्न के जवाब में फिस्स से हँस देना या अपने बड़े से सिर को हिला कर झुका लेना ,बस इतनी ही भाषा जानता था. उसकी सबसे बड़ी विशेषता थी कि, वह सजातीय वर था. मैना कुछ कह नहीं सकती थी. जन्म के साथ सिर पर महापाप का काला टीका जो लगा था,….. क्योंकि उसके अवांछित बाप ने उसे अपना नाम नहीं दिया ….क्योंकि बलात शिकार हुई उसकी मां, उस रात चीख कर, उस आदमी को सरे बाजार उजागर ना कर सकी, इसलिए ये सज़ा तो उसे कर्म फलके रूप में भोगनी ही थी .दस दरवाजों पर सिर झुकाकर खींसे निपोरता सजातीय गोपाल सबको उसकी सज़ा का सहीं मापदंड लगा. किसीने गोपाल से पूछा- ‘ब्याह करेगा रे’,गोपाल ने खीसें निपोरते हुए सिर हिलाकर, झुका लिया,
कहा- हां, बस उसी दिन से, उस घर के कानून ने मैनावती की सश्रम उम्रकैद की सज़ा जारी कर दी.
गोपाल पानी ला …..गोपाल न्हानी खोली में गर्म पानी रख …गोपाल गाय भेंस का दूध दुह ले…..गोपाल उपर से सूखे कपड़े उतर ला …गोपाल कोठार साफ क्यों नहीं किया ….जैसे पचासों काम गोपाल को ख़ुशी देते थे, मगर, मैनावती हर बार जी कर मरती थी….हर आवाज ,एक बेआवाज खरोंच को दागती थी. कई बार उसने रेगिस्तान को सींचने की कोशिश की ……कई बार गोपाल को अपने वजूद के लिए जिन्दा करने की कोशिश की…मगर हर बार नतीजा सिफर. गोपाल मैना की बहुत अधिक रोक टोक से बचता, हमेशा उससे दूर भागता. दिनभर सबको खुश करने का बीड़ा उठाए , कभी मैना के पास भी नहीं फटकता और रात सबके पैर हाथ दबाता मालिश करता ,वहीं बाहर ओसारे में नीम बेहोश सा सो जाता.
दुःख ,अपमान, उपेक्षा और कुंठा के घने अँधेरे में डूबी मैना, गोपाल को लेकर कभी कभी विक्षिप्त सी, अजीब हरकतों पर उतर आती थी. एक दिन आधी रात को शोर उठा,….क्या हुआ …क्या हुआ ?
शोर ….खुसफुसाहट में बदला,…अरे वही….. जैसी कुलच्छनी माँ, वैसी ही बेटी….बिल्कुल अपनी माँ पर गई हें फुसफुसाते इशारों ने शोर को समझा, उपेक्षा से देखा और मैना के चरित्र पर पिच्च से थूंका……बेहया कही की…..!! मैना की उसी बेहयाई की परिणति रानी के जन्म के रूप में हुई, जो सुलगती, धुंधआती अर्धशती की कथा में एक पृष्ठ और जोड़ गई.
तोड़ने, और ठोकर मारने के लिए फिर एक औरत का जन्म हो गया. बेजुबान सत्यवती की जिंदगी चुप के अंधेरो में चुप हो गई. मैना मरी नहीं, जिन्दा लाश सी खुद को ढोती, कभी अपने पक्ष में बगावत नहीं कर सकी. रानी के जन्म के बाद, मैना ने शायद ही गोपाल का मुख देखा हो. अपने हिस्से का जहर तो उसने नसीब मान कर पी लिया, मगर बेटी के सामने फिर एक बार भाग्यहीनता विष पात्र भर कर ले आये, यह मैना को किसी कीमत पर बर्दाश्त नहीं था.अपने वजूद से निर्वासित सत्यवती और उसकी बेटी को अपने घर में आश्रय देने के दम्भ में भाइयों ने रोटी के चंद कौरों के एवज में उनकी ज़िदगी खरीद ली.मगर अब नहीं ……!!
धुंधआते उपले ने लकड़ी को जलना सिखाया…. अंगारों को तड़कना और शोला बनना सिखाया….. सदी के शर्तनामे में नई शर्ते लिखना चाही ….गर्भ की ठंडी शिला की तह में आक्रोश के अंगारों ने रानी को ‘निर्णय’ बनाकर ही पैदा किया ….चार साल की रानी ,’मैं भी स्कूल जाउंगी’ ज़िद्द और गुस्से में आटे के कनस्तर में पानी डाल दी,
अरे अरे…..!!मरी नासपीटी…तेरा सत्यानाश हो.रानी पिट कर भी विजयी होती रही, उसके बाद तो पिटाई कुटाई ने रानी को और मजबूत बना दिया … नई स्लेट किताब के लिए,बाल्टी कुंए में फेंक कर हंगामा किया …किसी की दाल में नमक घोल कर अपने आक्रोश को जाहिर किया, तो किसी के नये कपड़े को गोबर में फेंक कर अपने वजूद की गवाही देती, अपने ‘होने’ को स्थापित करती रही. रानी को मार खाकर भी बड़ा संतोष मिलता था. मगर अपने कारनामों का सारा भार माँ पर उलटते देख, एक दिन चौदह बरस की रानी, माँ के लिए गालियों का जखीरा खड़ा कर,पड़ोसी के बेटे को अगवा कर घर से भाग गई.
कहाँ गई ?, कैसे ?क्यों? बहुत सी बौखलहटों ने जमीन खोद डाली ….गालियों से आकाश छलनी कर डाला मगर रानी को नहीं मिलना था, वह नहीं मिली.
पूरे सात साल बाद एक दिन आंधी की तरह रानी लौटी तो,….! सारा घर जडवत देखता रह गया …..मांग में सिंदूर ,हाथ भर चूड़ियाँ ….आँखों में गणित के खतरनाक हल ……जोड़ बाकि गुणा भाग की तीरंदाजी करती ऑंखें ……..
-कौन ?…अरे रानी तू ,अरे कुलच्छनी कहाँ थी अब तक, और तेरी हिम्मत कैसे हुई घर में घुसने की,…. खटिया पे पड़ी डोकरी चीखी !
-यह क्या !! ब्याह कर लिया तूने ?…नाक कटवा दी हमारी ….सहन की देहरी ने कुछ भाले उछाले ….हमारा मुंह काला कर दिया ….कुछ मर्दानी दीवारे गरजी, जैसी नानी कुलच्छनी थी ,वैसी ही माँ और वैसी ही ये कलमुही भी ,कडवी बेल में मीठे फल थोड़े ही लगेंगे…!!
-बस….चुप.. !! ……अधूरे स्यापे पर विराम लगाते हुए रानी ने तरकश सम्हालते कहा – क्या किया मैंने ? ब्याह ही तो किया है ना !!, इसमें किसी का मुंह काला कैसे हो गया.
-अरे कौन जातपात का है !! जानती भी है
-हां जानती हूँ, आदमी जात है उसकी, ऐसा जानवर नहीं की, पत्नी को जानवरों सा पीटे और घर से निकाल दे. रानी ने सदी के पूर्वार्ध पर वार किया. माहौल में बारूद की चिंगारियां छूट रही थी….. जो पिछले बीस बरस से रानी के अचेतन में लगातार दहक रही थी.
तभी किसी ने तीखे स्वर में भर्त्सना की- ,’अरी कोई जात समाज का नहीं मिला तुझे, ‘,अपने से छोटी उमर के लड़के से ब्याहकर लिया …..करमजली !!
-रानी ने ऑंखें फैला कर उस कोने की ओर देखा – हां गलती हो गई, अपनी उमर से चालिस साल बड़े आदमी से ब्याहना था मुझे, है ना !! और मेरे सजातीय पिता जैसे एक गोपाल से ब्याह करना चाहिये था, ताकि सजातीयता की भट्टी में एक आहुती और पड़ जाती. सात साल संघर्ष के काँटों पर चलती रानी अब मजबूत पेड़ की तरह अपनी जड़ों के साथ खड़ी थी.
एक अभिशप्त सदी सी खम्बे के पीछे खड़ी मैनावती अवाक् सी, एक स्त्री के अदम्य साहस को विस्फारित आँखों से देख रही थी. दुःख और सुख के मिले जुले बादलों में डूबती उतरती, बेटी के निर्णायक स्वरों को कानों में सहेजती जा रही थी. उसकी देह से आत्मा तक गोपाल को नकारती चेतना हलचल मचाने लगी. उपेक्षा और अपमान के कीचड़ में आकंठ डूबी अपनी पीड़ा के आवेग को आंचल मुंह में ठूंस कर रोक रही थी.अपनी निर्दोषिता पर बेटी की थपक पड़ते ही ऑंखें बहने लगी. बेटी को सामने पा पूरी सदी की पीड़ा उसके रोम रोम में करवट लेने लगी…….कुछ कहने के लिए शब्द खोजने लगी,…मगर चुप रहने की आदत या कुछ बोल पाने की अनाधिकृता बस हुलस कर रह गई…..उसके कानों में, माँ सत्यवती के फुसफुसाते स्वर स्पष्ट आवाज में गूंजने लगे – … उसका जी चाहा चीख चीख कर ,अपनी माँ सत्यवती की फुसफुसाहट को सरे बाजार कर दे जिसे, एक बार माँ ने बहुत धीरे से फुसफुसाकर कर बताया था-
‘ मैना मैं उस आदमी को पहचान गई थी री,जिसने मेरे साथ कुकर्म किया था, मगर कैसे बताती !! कौन मेरी बात पर विश्वास करता की,वह दुष्ट बड़े पिताजी का बेटा सोहन था.वह मार मारकर जान ही ले लेता.’
सहसा वही रहस्य आज मैनावती के होंठों की बंदिशों को फाड़कर बाहर निकला ..वह चीख कर बोली- माँ कुलटा नहीं थी…वह राक्षस बड़े पिताजी का बेटा सोहन था, जिसने माँ के साथ कुकर्म किया था.
क्या????,सारी दिशाएं एक साथ चीखी …….
समय ने ढेर सारी कालिख सोहन के चेहरे पर मल दी,खूब छी:छी:..थूंथू हुई मगर बूढी हो चुकी सदी की आँखों में ढेर सारे सवाल थे – यह कैसी सज़ा ??
तभी मैना के गोबर सने हाथों को हाथों से सहेजते हुए रानी की आवाज उसे बिलकुल समीप सुनाई दी -चलो माँ !!
कहाँ !!!!
जहाँ तुम्हारी आत्मा ,इन सड़ी गली परम्पराओं की बेड़ियों से मुक्ति पा सकें ,……..जहाँ तुम गोपाल जैसे लिजलिजे अहसास का विरोध कर सको ……जहाँ तुम अस्मत पर हाथ डालने वाले का मुंह नोच सको …..!!
मैना को लगा उसका अंग प्रत्यंग पिघल कर गिर रहा है ….उसकी जगह नये अंग उग रहे है ….ठंडी हवा के झोंके उसे छू कर,उसके जिन्दा होने की गवाही दे रहे थे…….वह कभी बाहर की दुनिया देख पाएगी ये उसकी कल्पना से बाहर की बात थी.
अपने बैग से रंगीन किनारी की साड़ी निकाल ,माँ की देह पर लपेटती रानी ने एक बार सबको तीखी नजर देखा और बाहर दरवाजे की ओर मुड़ गई. किसीमें हिम्मत नहीं थी की पूछे वह कहाँ जा रही है या ‘रांड पिछले सात साल कहाँ रही, मगर रानी को लग रहा था आज …..आकाश कुछ नीचे झुक आया ,दिशाएँ मुस्कुरा रही थी.ताजी,खुली हवा ने रानी का स्वागत करते हुए तालियाँ बजाई..!!
….अभी अभी एक औरत एक सदी की सज़ा से मुक्त हुई.
[ • विद्या गुप्ता प्रगतिशील विचारधारा की सुपरीचित लेखिका व कवयित्री हैं. • हाल ही में विद्या जी की कथा संग्रह ‘मैं हस्ताक्षर हूँ’ प्रकाशित हुई है और बेहद लोकप्रिय संग्रह है. • ‘मैं हस्ताक्षर हूँ’ कथा संग्रह से एक कहानी ‘सज़ा एक सदी की…’ ‘छत्तीसगढ़ आसपास’ के पाठकों के लिए इस अंक में प्रकाशित कर रहे हैं. – संपादक ]
• लेखिका संपर्क-
• 96170 01222
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