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कवि और कविता : पल्लव चटर्जी [छत्तीसगढ़-भिलाई]

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अंतहीन लगाव

एक हल्की सी रोशनी से
ज़िन्दगी शुरू होती है
और अंधेरे में समाप्त।
एक अंतहीन लगाव के साथ
बारंबार आते हैं इंसान
इस दुनिया में।
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सुना मकान

मकान छोटा हो या बड़ा
इसे सुना छोड़ देने पर
खंडहर में तब्दील हो जाता है
जंगली पेड़,पौधे अपना अस्ताना
बना लेता है।
उसका सहारा लेकर
आसमां स्पर्श करना चाहता है।
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तुम चाहो तो

अगर तुम चाहो तो
बंजर जमीन में भी
फसल उगा सकते हों।
पथरीली जमीन पर –
फुल उगा सकते हों
गर तुम चाहो तो।
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किनारे

प्रवाहित नदी में
तैरता चला आ रहा हूं मैं
न जाने कब से ,
एक किनारे की चाहत में।
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बसंत ऋतु

लाशें बिछी हुई थीं
साल, पलाश,सेमल फुलों की–
पगडंडियों पर
क्यों न हो ,ये
बसंत ऋतु जो है।
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वाकयुद्ध

अक्सर हाजी से मुलाकात होता था
सुबह झील के पास ,
सैर करते हुए अभिवादन किया करते थे
हम दोनों एक दूसरे को मुस्कुरा कर।
उस दिन जब मैं उन्हें
मटन दुकान पर देखा था
बकरा काटते –
शरीर पर अनगिनत खुन के छीटें लिए हुए
कुछ समय के लिए, वाकरूद्ध हों गया था मैं।

👉 • [बाएं से] प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ के अध्यक्ष प्रदीप भट्टाचार्य के साथ ‘आरंभ’ के संस्थापक सदस्य व बांग्ला-हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि पल्लव चटर्जी ]
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chhattisgarhaaspaas
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