- Home
- Chhattisgarh
- कृति काव्य नाटक ‘अनंत के अंतिम क्षण’ और कृतिकार शिवमंगल सिंह : समीक्षा प्रदीप भट्टाचार्य
कृति काव्य नाटक ‘अनंत के अंतिम क्षण’ और कृतिकार शिवमंगल सिंह : समीक्षा प्रदीप भट्टाचार्य

👉 कृति भेंट करते हुए [बाएँ से] कृतिकार शिवमंगल सिंह और प्रदीप भट्टाचार्य
छत्तीसगढ़ आसपास
साहित्यिक डेस्क
शिवमंगल सिंह और मेरी मित्रता लगभग 25-30 वर्षों से भी अधिक हो गई होगी. इनकी सभी संग्रह मेरे पास सुरक्षित है. साहित्यिक आयोजन में यदा-कदा मिलना-जुलना होते रहता है. बीते दिनों हम कुछ साहित्यिक मित्रों ने संगठित होकर एक संस्था बनाई. प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’. ‘आरंभ’ का टैग लाइन हमने दिया “आरंभ हो अंत न हो-चिंतन कभी कलांत न हो”. 21 सदस्यों द्वारा गठित की गई ‘आरंभ’ के संस्थापक सदस्यों में प्रगतिशील कवि शिवमंगल सिंह भी हैं. बीते दिनों शिवमंगल सिंह ने मुझे अपनी प्रकाशित काव्य नाटक कृति ‘अनंत के अंतिम क्षण’ भेंट में दी. पूर्व में प्रकाशित कृति ‘उस दिन’ [काव्य संग्रह], ‘मंथन’ [काव्य नाटक], ‘इतिहास का सच’ [काव्य नाटक] और ‘मुखौटे वाले चेहरे’ [कविता संग्रह] मेरे पास हैं. ‘अनंत के अंतिम क्षण’ को पढ़ा, फिर कुछ लिखने का साहस जुटा पा रहा हूँ. मैं कोई आलोचक या समालोचक नहीं हूं. मित्रों द्वारा भेंट में दी गई पुस्तकों को फुर्सत के क्षणों में पढ़ता जरूर हूँ.
शिवमंगल सिंह ने अपनी कृति ‘अनंत के अंतिम क्षण’ में अपनी बात में लिखा-

‘अनंत के अंतिम क्षण’ नामक नाटक में भगवान श्रीकृष्ण के स्वधाम प्रस्थान करने की पृष्ठभूमि से लिया गया है. इनका सहस्त्र नामों में से एक नाम ‘अनंत’ भी है. इस कालचक्र के साम्राज्य में अनंत के भी अंत होने की सुनिश्चित प्रक्रिया है. श्रीमद् भागवत पुराण से लेकर महाभारत में भगवान श्रीकृष्ण की भूमिका महानायक की रही है. किंतु,अब अनंत के भी अंत हो जाने का समय निकट आ गया है. इससे अब वे द्वारिकाधीश के रूप में कपिला और हिरण नदी के पावन तट पर संगम के निकट के जंगल में पीपल के पेड़ के नीचे ध्यानस्थ होकर अपने जीवन काल के समस्त स्मृतियों खोये हुए हैं’
‘भगवान श्रीकृष्ण का बहुआयामी विराट व्यक्तित्व समस्त कलाओं में विभूषित होकर उस लीलाधर की लीलाएं भी अनंत हैं अब उनके जीवन समस्त दायित्व पूर्व हो चुके हैं. इसलिए स्वलोक प्रस्थान करने के कुछ क्षण अपने श्रीकृष्ण जीवन का मंथन करते हैं. अब वे गोकुल के कान्हा से लेकर द्वारिकाधीश तक लक्ष्मी जीवन यात्रा के एक-एक क्षण को याद करते हैं. उनके आत्मकथा को रोचक बनाने के लिए लकड़हारा और लकड़हारे की पत्नी को रोचक बनाने के लिए में निर्मित किए गए हैं, इनका उल्लेख कहीं भी नहीं मिलता है’. कृतिकार शिवमंगल सिंह का कहना है कि इस काव्य नाटक को लिखने की प्रेरणा ‘अखंड ज्योति’ के पुराने अंकों को पढ़ने के बाद मिली.
इस काव्य नाटक को 4 भागों में बाँटा गया है. प्रथम भाग में पात्र परिचय है- श्रीकृष्ण, लकड़हारा और लकड़हारे के पात्रों को लेकर नाट्य प्रस्तुति दी गई है. एक काव्य दृष्य में वर्णन है- पूर्ण हो चुके हैं/सम्पूर्ण उद्देश्य/अब बैकुंडधाम की ओर/करने होंगे प्रस्थान/जिन-जिन कार्य हेतु/सर्व कलाओं से विभूषित/मेरा अवतार हुआ/अब पूर्ण हो चुके हैं.
द्वितीय भाग में श्रीकृष्ण, बहेलिया और भगवान विष्णु का पात्र परिचय को लेकर नाट्य प्रस्तुति दी गई है. भगवान श्रीकृष्ण समस्त चिंता से मुक्त होकर घोर निद्रा में सोये हुए हैं. लेकिन दूसरी ओर जरा नामक बहेलिया शिकार की तलाश में भटकते-भटकते उस स्थल के आसपास पहुँच जाता है, जहाँ द्वारिकाधीश गहन निद्रा में सोये हुए हैं. बैठा है, हिरण/उस पीपल के झुरमुट में/इस अवसर का लाभ उठाना चाहिए/अपने शिकार पर/बाण चलना चाहिए. बहेलिया कमान से तीर निकालकर, निशाना साधकर बाण चला देता है. उसे क्या मालूम उसके हाथों से कितना बड़ा अनर्थ हो गया? वह अपने शिकार को प्राप्त करने तेजी से चल पड़ता है.
तृतीय भाग में अर्जुन, बहेलिया और परिचारक के पात्र परिचय को लेकर नाट्य प्रस्तुति का वर्णन किया गया है. मंच पर अर्जुन दिखाई देते हैं, उनके चेहरे पर तनाव की झलक दिखाई देती है. अर्जुन मंच पर टहलते हुए अपने आप ही संवाद करते हैं- मैंने स्वप्न देखा है/रात्रि के अंतिम प्रहर में/उस स्वप्न से/न जाने क्यों? मुझे भयावह लग रहे हैं/उठ रहे/मेरे हृदय में/अन्तरात्मा में/होने वाली है/अप्रत्याशित हृदय विदारक/घटना के संकेत. परिचारक को बुलाते हुए- अर्जुन- परिचारक….!
कृति ‘अनंत के अंतिम क्षण’ के अंतिम भाग चतुर्थ अंक में पात्र परिचय है- अर्जुन, उद्धव और काल्पनिक श्रीकृष्णा. एक दृश्य में उद्धव श्रीकृष्ण से बातचीत करने में इतने अधिक तल्लीन हो गए कि उन्हें ऐसा प्रतीत होने लगा मानो श्रीकृष्ण से बातें कर रहे हों. अर्जुन शांत मुद्रा में बैठ जाते हैं. उद्धव के संवाद को आगे बढ़ाने के लिए मंच पर काल्पनिक कृष्ण से बातें कर रहे हो. [नेपथ्य से] उद्धव अपने प्रिय सखा/श्रीकृष्ण के स्मृतियों में/इतने अधिक तल्लीन हो गए/मानो कृष्ण उनके सामने खड़े हैं. प्रिय दर्शकों! आप देख रहे हैं मंच पर काल्पनिक कृष्ण को.
▪️
कृति भेंट की कुछ तस्वीर-

👉 [बाएँ से] • देश के सुप्रसिद्ध लेखक गिरीश पंकज और शिवमंगल सिंह

👉 [बाएँ से] • त्रयम्बक राव साटकर ‘अंबर’, प्रदीप भट्टाचार्य, गिरीश पंकज और शिवमंगल सिंह

👉 [बाएँ से] • डॉ. बीना सिंह रागी, त्रयम्बक राव साटकर ‘अंबर’, प्रदीप भट्टाचार्य, गिरीश पंकज, शिवमंगल सिंह, ब्रजेश मल्लिक और प्रकाशचंद्र मण्डल

👉 [बाएँ से] • डॉ. बीना सिंह रागी, त्रयम्बक राव साटकर ‘अंबर’, प्रदीप भट्टाचार्य, गिरीश पंकज, शिवमंगल सिंह, ब्रजेश मल्लिक और डॉ. नौशाद अहमद सिद्दीकी ‘सब्र’

👉 प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ के सूत्रधार शिवमंगल सिंह और प्रदीप भट्टाचार्य
शिवमंगल सिंह की यह कृति दीक्षा प्रकाशन [नई दिल्ली] से प्रकाशित हुई है. इस काव्य नाटक को मंचों पर प्रदर्शन कर आकृष्ट किया जा सकता है.
कृति प्राप्ति के लिए लेखक से संपर्क कर सकते हैं या amazon में भी उपलब्ध है.
मो. नं. 87709 50984
shivmangalsingh8559@gnail.com
प्रस्तुति-
प्रदीप भट्टाचार्य, अध्यक्ष ‘आरंभ’
संपर्क- 94241 16987
🟥🟥🟥
chhattisgarhaaspaas
विज्ञापन (Advertisement)