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कहानी : दीप्ति श्रीवास्तव
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ऊलन कपड़े
– दीप्ति श्रीवास्तव
[ छत्तीसगढ़-भिलाई ]

रानी ने झाड़ू लगाते हुए पलंग पर रखे स्वेटरों का ढ़ेर देखा तो मन ललचा गया।
‘काश मैडम इसमें से एक मुझे दे देती। सुबह साइकिल से आने में ठंड से राहत रहती ‘ मांगना उसकी फितरत में नही । ठंड दिन ब दिन बढ़ रही है दिसम्बर और जनवरी में कहर ढ़ाने लगती है। सुबह उठने की जरा भी इच्छा नहीं होती। मजबूरी है वरना सुबह चार बजे कौन उठता । घर के काम निबटा सर्दी में कुड़कुड़ाते छः बजे तक मैडम के घर पहुंचती जरा सी देर होने पर मैडम की झल्लाहट से दिन शुरु होता तो दूसरे घरों में सारा दिन वह किट किट करती । हाड गला देने वाली ठंड में हाथ जवाब देते काम जल्दी नहीं होता और समय भागते रहता है। सब घरों में समय से पहुंच नहीं पाती।
आज ठंड कुछ ज्यादा थी चार साल पहले दिवाली पर तीन नंबर वाली मैडम ने पुराना शाल और स्वेटर दिया था। वह धो धो कर झीना हो गया ठंड उससे रूकती नहीं और स्वेटर बेटी स्कूल पहन कर जाती। और एक यह मैडम है गरीबों से कसकर काम लेना जानती पर बड़ा छोटा दिल है इनका फटी पुरानी चीजें भी कभी भूल से नहीं देती फल सब्जी रखे रखे सड़ जायेगी मजाल है कभी बोले ‘ रानी घर ले जा बच्चों के लिए।’
’अरे रानी …कितनी देर से झाड़ू लगा रही है जल्दी कर ’
आज प्रोग्राम है गरीब लोगों को ऊलन वस्त्र बांटने का मेरे पास बांटने लायक कुछ स्वेटर शाल नही है सब कपड़ो की मैचिंग वाले ऊनी कपड़े है। सबके साथ खडे हो फोटो खिंचवा लूंगी वही अखबार में छपने दे दूंगी आखिर अध्यक्ष जो हूं । इस बात का रानी क्या जवाब देती ? मन ही मन बोली इतने ठसाठस कपड़े भरे पड़े है किसी गरीब को एकाध दे देती तो कोई फर्क नही पड़ता। वह चुपचाप अपना काम करते रही। बड़े लोगों की बातें वही जाने जितने बड़े लोग उतने तंग दिल ।
सुबह काम पर निकली सामने सड़क किनारे नजर बूढ़े बाबा से मिली ठंड से ठिठुरते कांपते निरीह से दिखे ,उससे रहा नही गया अपनी शाल उतार उन्हें उढ़ा दिया और स्वयं को ठंड से दो दो हाथ करने तैयार कर लिया ।
’बाबा चार दिन पहले तो नया कंबल रात्रि में कोई उढ़ा गया था वह कहां है। ’
’बिटिया सामने वाले फुटपाथ पर जो रामदिन …’ ’अरे रामदीन बाबा को क्या हुआ जल्दी बोलो ’ बहुत बीमार था सरकारी अस्पताल में इलाज चल रहा था कंबल बेचकर उसके लिए दवाई खरीदे, अच्छा हुआ रात भगवान ने उसकी अर्जी मंजूर कर लिया । भरपूरा परिवार रहकर बेघर था बेचारा… दुख भरी मार्मिक आह छोड़ी बाबा ने। धन सम्पति रामदिन ने पत्नी की मृत्यु के बाद भावावेश में बिटिया के नाम कर दी इकलौती आँखों का तारा थी।आगे का हाल तो तुम देख ही रही हो ,कैसा जमाना है उससे से हम ही अच्छे ’आगे नाथ न पीछे पगहा।’
दुखद खबर सुन भारी मन से रानी काम पर चल पड़ी । साईकिल के पैडल ऐसे मार रही थी जैसे रामदीन के घर वालों पर अपना गुस्सा उतार रही हो साईकिल की चैन उस बूढ़े के जीवन चक्र जैसे घूम रही थी। इससे अच्छा तो हम लोग है पैसा नही पर प्यार अथाह है। हमारे घर के बूढ़े हमारी थाती है बच्चों को उनकी देखरेख में छोड़ निश्चिंत हो काम पर जाते है। छप्पन भोग न सही जिंदगी अपनों के बीच सुकून भरी होती है।आज रानी को अपनी जिंदगी और हैसियत से शिकायत न रही
• लेखिका संपर्क-
• 94062 41497
• email- •vksdeepti2014@gmail.com
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chhattisgarhaaspaas
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