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साड़ी दिवस पर विशेष : दीप्ति श्रीवास्तव
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व्यक्तित्व में निखार लाती
– दीप्ति श्रीवास्तव
[ छत्तीसगढ़-भिलाई ]

मेरी बेटी को साड़ी पहनना नहीं आता ।आजकल यह जुमला ज्यादातर माताओं को कहते सुना होगा । सुनकर लगता है क्या हमारी पारंपरिक साड़ी का अस्तित्व खतरे में तो नहीं पड़ने वाला है । यही साड़ी हमारे देश की नारियों की पहचान, आन बान शान का प्रतीक है ।
मै भी गर्व से कहती हूं साड़ी में जो व्यक्तित्व का निखार है वह किसी भी महंगी से महंगी ड्रेस में नहीं । साड़ी की अपनी गरिमा है पहनने वाले के व्यक्तित्व को भव्यता प्रदान करती है ।
हमारे रीति रिवाजों में भी साड़ी को विशेष स्थान मिला है । महाभारत में द्रौपदी के चीर हरण की घटना में चीर यानी साड़ी ही थी परंतु समय के साथ परंपरा में बदलाव की वजह से और अति व्यस्त आपाधापी भरी जिन्दगी में हमारी साड़ी पहनने की आदत छूटने लगी है ।भगमभाग भरी दिनचर्या में साढ़े पांच मीटर की साड़ी एक किनारे होती जा रही है। आज कि नारी को पश्चिमी पोषक ज्यादा लुभाने लगी है चाहे उन पर फबे या ना फबे। साड़ी पहनने वालों को एक वर्ग दकियानुसी, पिछड़े विचार वाला मानता है। एक जमाना था जैसे आज जींस टॉप पहनते है हम लोग साड़ी पहन कर ऑफिस जाया करते थे। कभी साड़ी बोझ नहीं लगी । ना ही पहनने में समय लगता था । सभी काम साड़ी पहनकर करते यहां तक साड़ी पहन साइकिल भी चलाते थे। अब तो कार का जमाना है।
आज तो लड़कियों की मां ही आपाधापी भरी जिंदगी में उन्हें उनके पारम्परिक परिधान से दूर करते जा रही है । हाल ही का वाकया है रिश्तेदार के यहां शादी में जाने का मौका लगा दुल्हन आई टी प्रोफेसनल, शादी में सारे मॉर्डन ड्रेस लेकर आई किसी ने कमेंट किया क्यों बहू एक भी साड़ी साथ नहीं लाई क्या ? उसका उत्तर सुनकर बैठे लोग अवाक रह गए ‘मां बोली आजकल साड़ी पहनता कौन है एक बार के बाद वार्ड रोब में पड़ी रहेगी इन कपड़ों को तुम कभी भी पहन सकती हो ।’ अब मां की सोच ऐसी तो क्या कर सकते है । पास बैठी बुआजी ने प्रश्न करना बंद नहीं किया बहू तुमको साड़ी कैसे लगती है…..
वह तपाक से बोली ‘बहुत अच्छी पर पहनना नहीं आता ‘ फिर क्या था बुआ जी ने बहू को देने लाई साड़ी पहनाई साथ ही साड़ी पहनना भी सिखा दी बहू की खुशी का परवार ना रहा । आज वह त्यौहार उत्सव में साड़ी में नजर आती है साथ ही अपनी सहेलियों और यू ट्यूब पर भी पहनने का तरीका सीखती है।
साड़ी को लेकर आज की युवा पीढ़ी जागरूक है देश विदेश के फैशन मोबाइल में देखती है ।
उन्हें समझ आ रहा है हमारा पारंपरिक परिधान साड़ी को जीवित रखना हमारा कर्तव्य है हमारी पहचान है । इसलिए कुछ समय पहले फेसबुक पर हैश टैग साड़ी को पहन कर फोटो डालने का अभियान चला था जो काफी सफल भी रहा । मध्यम उम्र की माताओं की सोच आज की युवा होती लड़कियों पर भारी है बेचारी को समय कहां कि साड़ी लपेटते फिरे हमारा जमाना नहीं यह मॉर्डन युग है । आज हमारी लड़की अपने पैरों पर खड़ी है उस पर कोई थोप नहीं सकता वह क्या पहने और क्या न पहने । इन्ही विचारों के साथ सूटकेस भरा जाता है । इसके विपरीत जब आज की युवती को समय मिलता है तो बड़े चाव से पारंपरिक साड़ी धारण करने से पीछे नहीं हटती ।
हमारे देश के प्रत्येक राज्य में अलग अलग तरह की साडियों का निर्माण होता है आज बुनकर द्वारा हैण्डलूम हस्तकला कसीदाकारी की सबसे ज्यादा उपयोगिता इन्हीं साड़ियों में देखने मिलती है । जहां जरी के काम से लेकर सोने चांदी की कामदार साड़ियां बनाई जाती है । साधारण नग से लेकर हीरे जवाहरात जड़ी साड़ियों से बाजार गुलजार है। इन्ही साड़ियों से एकता में अनेकता के दर्शन होते है यही हमारी कलात्मक समृद्धि का प्रतीक है।
भारतीय संस्कृति में साड़ी का विशेष महत्व रहा है और यह हम स्त्रियों की पारंपरिक पोशाक है हर प्रदेश में इसके पहनने के तौर तरीके अलग अलग होते है । जैसे मराठी साड़ी तो बंगाली साड़ी गुजराती साड़ी आदि को धारण करने का विशेष तरीका होता है ।
आजकल साड़ी वही पर उसके पहनने के तरीके भिन्न-भिन्न है । युवा महिलाओं में आज इसका लगाव देखते बनता है और इसे खास मौकों पर वे पहनना भी पसंद करती है।
हमारे देश में साड़ी का इतिहास युगों पुराना है।एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तान्तरित भी होती है स्त्रियां साड़ी बड़े करीने से सहेज कर रखती है। अपने इस प्राचीन भारतीय पहनावे को आगे ले जाने का भार आज की युवा पीढ़ी पर है।
[ • दीप्ति श्रीवास्तव प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ की उपाध्यक्षा और कथाकारा हैं. • संपर्क- 94062 41497 ]
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