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उन्वान : ‘निकाह’ – साजिद अली सतरंगी
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‘मरयम’ – माँ की दुआओं में लिपटी, अब्बा की उम्मीदों से बँधी और अपने भाई-बहनों की दुनिया थी…
– साजिद अली सतरंगी
[ मेरठ-उत्तरप्रदेश ]

घर की पुरानी दीवारों पर वक़्त ने अपने निशान छोड़ दिए। छत के एक कोने से टपकता पानी, दीवारों पर सीलन और आँगन में उगा नीम का पेड़—दोनों जैसे एक ही कहानी कहते हो: सब्र की कहानी। उसी आँगन में “मरयम” की ज़िंदगी पली-बढ़ी थी।
“मरयम”– माँ की दुआओं में लिपटी, अब्बा की उम्मीदों से बँधी, और अपने भाई-बहनों की दुनिया थी।
“मरयम” अपने छ: भाई बहनों में मंझली थी। जब छोटी थी, तो बहुत ज़्यादा नटखट थी, उसे गुड़ियों से खेलना बहुत पसंद था। वह अपनी गुड़ियों का भी “निकाह” कराती, किसी को दुल्हन बनाती, तो किसी को दुल्हा, तो किसी को ससुराल भेजती। माँ हँसते हुए कहती, “देखना, इस घर में “मरयम” सबसे पहले दुल्हन बनेगी।”
मगर वक़्त ने “मरयम” के लिए कोई और क़िरदार लिख रक्खा था।
अब्बा की लोहा, वैल्डिंग की छोटी सी दुकान थी, जिससे घर का गुज़ारा चलता था। एक दिन अब्बा,ओर छोटे चाचा किसी जरूरी काम से बाहर गए । शहर के रास्ते में अचानक किसी ट्रक की चपेट में आकर बेहद गम्भीर चोट लग गई।ज़ेरे इलाज, दोनों इस दुनिया ए फ़ानी को अलविदा कह गए। घर पे मानों दुखों का पहाड़ टूट गया हो। दुकान बंद हो गई। घर की आमदनी घट गई। घर का खर्च बामुश्किल चल रहा था, भाई, बहन, सब छोटे थे। एक दिन “मरयम” ने पहली बार माँ की आँखों में डर देखा–वही डर, जो धीरे-धीरे उसकी अपनी आँखों में उतर आया।
“मरयम” पढ़ने में होशियार थी, कॉलेज के दिनों में उसने ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया। शाम को बच्चों को पढ़ाती, रात को घर के काम निपटाती। माँ कहती,
“बेटी, अपने बारे में भी सोचा कर।”
“मरयम” मुस्कुरा देती,
“ अम्मी पहले घर संभल जाए फिर मैं।”
छोटी बहन की पढ़ाई, छोटे भाई की फीस, अम्मी की दवाइयाँ — सब “मरयम” की डायरी में दर्ज हो गए। “उस डायरी में सपनों के लिए कोई पन्ना नहीं था।
वक़्त बीतता गया। रिश्ते आने लगे। कभी उम्र का बहाना, कभी हालात का। माँ हर रिश्ते के बाद चुप हो जाती। “मरयम” सब समझती थी, मगर कुछ कहती नहीं थी। वह जानती थी कि निकाह सिर्फ़ दो लोगों का नहीं होता–पूरा घर उसमें शामिल होता है।
और इस घर की ज़िम्मेदारी अभी उसके कंधों पर थी।
एक दिन पड़ोस की सहेली का निकाह हुआ। “मरयम” ने खुद अपने हाथों से उसको मेंहदी लगाई। दुल्हन के हाथों की खुशबू “मरयम” की उँगलियों में बस गई, मगर आँखों में नमी उतर आई।
रात को उसने डायरी खोली और लिखा–
“ शायद मेरे नसीब में मेंहदी से ज़्यादा सब्र लिक्खा है।”
अम्मी की तबीयत और बिगड़ने लगी। एक रात “मरयम” ने उन्हें खाँसते हुए देखा, तो दिल काँप उठ्ठा। उसने अम्मी का हाथ थाम लिया।
अम्मी ने कमज़ोर आवाज़ में कहा,
“मरयम, मैंने तुम्हारे लिए कुछ नहीं किया।”
“मरयम” रो पड़ी,
“अम्मी, आपने मुझे अब्बा के जाने के बाद मजबूत बनाया है,, यही बहुत है।”
उसी रात “मरयम” ने फैसला किया–अब वह और भी ज़्यादा मेहनत करेगी। उसने छोटा सा कोचिंग सेंटर खोला ऑनलाइन,ऑफलाइन, दोनों तरह से पढ़ाना शुरू किया, हर वो रास्ता अपनाया जिससे घर चल सके।
लोग कहते, “लड़की होकर इतना क्यों करती हो?”
वह जवाब देती, “घर अपना हो, तो बोझ नहीं लगता।”
धीरे-धीरे भाई बड़ा हुआ, बहन की पढ़ाई पूरी हुई। घर के हालात संभलने लगे। माँ ने एक दिन हिम्मत करके कहा,
“मरयम,, बेटा अब तुम्हारे निकाह के बारे में सोचते हैं।”
“मरयम” ने शायद पहली बार आईने में खुद को देखा–आँखों के नीचे थकान, ओर चेहरे पर वक़्त की लकीरें एक कहानी बयां कर रही थी।
वह मुस्कुराई, मगर उस मुस्कान में अधूरापन था।
“ अम्मी, जो अल्लाह को मंज़ूर होगा।”
रिश्ते फिर से आने लगे। “मगर यह जहेज़ लोभी समाज, कभी उम्र का सवाल करता,तो कभी जहेज़ की मांग। कुछ लोग उनकी गरीबी पर तंज कसते। “मरयम” हर बार खामोश रह जाती। उसे शिकायत नहीं थी–बस एक सुकून की तलाश थी।
एक शाम माँ ने पुराने लकड़ी के संदूक से “मरयम” का बचपन का जोड़ा, निकाला–वही जोड़ा, जो किसी शादी के लिए सिलवाया गया था, मगर कभी पहना नहीं गया। उसे देखकर माँ की आँखों से आँसू बह निकले,
“ मैंने तुम्हारी खुशियाँ रोक ली “मरयम”
“मरयम” ने माँ को गले लगा लिया,
“अम्मी, आपने मुझे खुद्दारी दी है अल्लाह ने सब्र अता किया है। मुझे खुशी उससे ही मिलती है।”
निकाह अब “मरयम” के लिए एक सपना नहीं, एक दुआं बन चुका था–अगर मिला तो शुक्र, न मिला तो सब्र।
कई साल बाद, एक सादा-सा रिश्ता आया। लड़का पेशे से इंजीनियर, बल्कि बहुत नेकदिल,,न दहेज की माँग, न उम्र की शिकायत,न उसकी तंगदस्ती से गिला।
“अम्मी ने सवाल किया,,
“क्या आप “मरयम” की “जद्दोजहद,, को समझ पाएँगे?”
जवाब आया,
“ मैं उसका हाथ नहीं, उसकी ज़िंदगी थामना चाहता हूँ।”
निकाह की तारीख़ मुकर्रर की गई,निकाह बहुत सादगी से हुआ। न ढोल, न दिखावा,न किसी तरह का जहेज़। “मरयम” ने निकाह का जोड़ा पहना,मानो आसमान से कोई परी उतर आई हो। उसने आईने में खुद को देखा–थकी हुई नहीं, बल्कि अपने आप से “मुतमइन।
उसने दिल ही दिल में कहा,,
“यह निकाह मेरे सब्र की गवाही है।”
और उस दिन “मरयम” समझ गई–कुछ लड़कियाँ देर से दुल्हन बनती हैं, क्योंकि वे पहले पूरी उम्र जिम्मेदारी बनकर जीती हैं।
निकाह उनके लिए सिर्फ़ एक रिश्ता नहीं, बल्कि एक मुकम्मल इबादत होता है।,,
निकाह के बाद “मरयम” जब ससुराल पहुँची, तो वहाँ हर ओर खुशियों का माहौल था,घर को “मरयम,, की तरह दुल्हन बनाया गया था, घर वाले किसी ख़ास मेहमान के दीदार के लिए अपनी पलकें बिछाए खड़े थे,कम लोग, मगर आँखों में अपनापन। सास ने माथे पर हाथ रखा और बस इतना कहा,
“बेटी, बहुत देर हो गई तुम्हें यहाँ आने में।”
“मरयम” की आँखों में ख़ुशी के ऑंसू भर आए। किसी ने पहली बार उसकी देर को ताना नहीं, बल्कि “समझ बनाया था।,,
पहली रात वह देर तक जागती रही। मानों कमरे की हर दीवार जैसे कोई कहानी बयां कर रही हो।यह खुशनुमा मंज़र देख कर, भाइयों की किताबें, बहन की फीस, अम्मी की दवाई,,आज पहली बार उन सबके बीच वह खुद भी मौजूद थी।
पहली सुबह जब कमरें का दरवाजा खुला उसने घर के आंगन में कदम रक्खा,, तो देखा चाय नाश्ता सब तैयार है।
वह थोड़ा ठिठकी ओर मुस्कुराकर कहा,,
“इतनी जल्दी?,,
शौहर ने मुस्कुराकर कहा,,
अब तुम्हें किसी की जिम्मेदारी उठाने की ज़रूरत नहीं।”
उसे समझ ही नहीं आया कि जवाब क्या दे।
ज़िम्मेदारी उसके लिए आदत बन चुकी थी।जैस-जैसे दिन बीतने लगे। वह हर काम पूरे मन से करती, मगर दिल के किसी कोने में एक खालीपन था–जैसे वह खुद को खोज रही हो।
“एक दिन शौहर ने कहा,,
“मरयम,, तुमने कभी अपने लिए कुछ सोचा है?”
वह मुस्कुरा दी,
“मैंने हमेशा दूसरों के लिए सोचा है।”
उन्होंने बड़े इत्मीनान से कहा,
“तो अब मेरी बारी है–मैं तुम्हारे लिए सोचूँगा।”
उस रात “मरयम” बहुत रोई।
यह आँसू दुख के नहीं थे, बल्कि उस राहत के थे, जो बरसों बाद किसी ने उसके कंधों से बोझ उतार कर दी थी।
कुछ महीनों बाद वह मायके गई।
भाई अब नौकरी करने लगा था, बहन अपने पैरों पर खड़ी हो गई थी।
माँ पहले से ज़्यादा सुकून में थीं।
अब्बा की एक तस्वीर दीवार पर टँगी थी–मुस्कुराती हुई।
“मरयम” ने तस्वीर के सामने खड़े होकर कहा,
“अब्बा, आपकी बेटी ने घर भी संभाला, और खुद को भी खोने नहीं दिया।”
माँ ने उसका हाथ थाम लिया,
“तूने हमारी ज़िंदगी जी बेटा,
“मरयम।”वह पहली बार बोली,
“अम्मी, अब मैं अपनी ज़िंदगी जीना चाहती हूँ।”
“मरयम” ने फिर से पढ़ाई शुरू की।
उसने वही काम चुना, जिसमें वह दूसरी लड़कियों को मुकम्मल बना सके–उनके सपनों को पूरा करना सीखा सके,उन्हें यह समझा सके कि निकाह देर से होना हार नहीं होती।
कई लड़कियाँ उसके पास आतीं, रोतीं, कहतीं,
“आप जैसी हालत है हमारी।”
“मरयम” मुस्कुराकर कहती,
“मैं तुम्हारा आने वाला कल हूँ–डरो मत।”
समाज अब भी सवाल करता था–
“इतनी देर से निकाह क्यों हुआ?”
वह सुकून से जवाब देती,
“क्योंकि मैंने पहले फ़र्ज़ निभाया।”
रात को जब वह सजदे में जाती, तो उसकी दुआं बदल चुकी थी।
अब वह सिर्फ़ सब्र नहीं माँगती थी, बल्कि शुक्र भी करती थी।
उसे एहसास हुआ–
कुछ लड़कियों का निकाह देर से इसलिए होता है,
क्योंकि वे पहले टूटे घरों की मरम्मत करती हैं,
माँ-बाप की ढाल बनती हैं,
भाइयों-बहनों की छाँव बनती हैं,
और फिर कहीं जाकर
खुद के लिए एक छोटा-सा आसमान माँगती हैं। वो आसमान जिसकी छांव तले हजारों परिंदे, अठखेलियां करते हैं।
“मरयम” की कहानी किसी एक लड़की की नहीं थी–
वह हर उस बेटी की दास्तां थी,
जो चुपचाप कुर्बानी देती है,
और जब दुल्हन बनती है,
तो उसके माथे की चमक
सिर्फ़ “निकाह” की नहीं, बल्कि
सब्र, इज्ज़त और खुद्दारी की होती है।
यही था “मरयम” का निकाह–
भले ही देर से हुआ,
मगर पूरे वजूद के साथ।
• लेखक संपर्क-
• 94575 30339
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