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एक शाम रफी के नाम : ‘द वॉयस दुर्ग सिटी’ एवं ‘रफ़ी फाउंडेशन’ के संयुक्त तत्वावधान में सुरों, स्मृतियों और संवेदनाओं की अविस्मरणीय संध्या सम्पन्न हुई
• छत्तीसगढ़ आसपास
• दुर्ग : 24 दिसम्बर, 2025
संगीत जब आत्मा को छू ले और सुर जब स्मृतियों में उतर जाएँ—
कुछ ऐसी ही भावविभोर कर देने वाली संध्या “एक शाम रफ़ी के नाम” के रूप में दुर्ग शहर ने साक्षात अनुभव की।

‘द वॉयस दुर्ग सिटी’ एवं ‘रफ़ी फाउंडेशन’ के संयुक्त तत्वावधान में, सुरों के देवता मोहम्मद रफ़ी साहब के जन्मदिवस के पावन अवसर पर आयोजित यह संगीतमय कार्यक्रम न केवल एक आयोजन था, बल्कि रफ़ी साहब को समर्पित श्रद्धा, सम्मान और साधना का जीवंत उत्सव था।
दुर्ग के गोवर्धन चौक, गोपाल मंदिर–सीतला मंदिर परिसर के समीप आयोजित इस गरिमामय संध्या में जैसे ही गणेश वंदना के सुर गूँजे, वातावरण पवित्र हो उठा। इसके पश्चात रफ़ी साहब के अमर गीतों का जो सिलसिला आरंभ हुआ, वह देर रात तक श्रोताओं के हृदय में भावनाओं की अविरल धारा बहाता रहा।
पुराने गीतों की मिठास और नए प्रस्तुतिकरण की संवेदना : हर स्वर में श्रद्धा थी, हर ताल में स्मृति

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के रूप में प्रतिष्ठित व्यवसायी एवं कला–संस्कृति के सजग प्रेमी श्री कैलाश जैन ‘बरमेचा’ की गरिमामयी उपस्थिति ने आयोजन की गरिमा को और ऊँचाई प्रदान की।
विशिष्ट अतिथि के रूप में समाजसेविका श्रीमती रत्ना नामदेव एवं श्रीमती सत्यवती वर्मा ने अपनी उपस्थिति से मंच को सामाजिक संवेदनाओं से जोड़ा।
सुरों के सिपाही, कलाकारों की भावपूर्ण प्रस्तुतियां : इस संगीतमय यात्रा में प्रमुख कलाकारों के रूप में-
संजय लरौलकर, श्रीमती गीता सिंह, श्री प्रकाश सोनी, श्रीमती सत्या सोनी, हेमंत साहू, संजय घाटे, वात्सल्य साहू सहित अन्य कलाकारों ने अपने स्वर–साधना से रफ़ी साहब की आत्मा को साकार कर दिया।
गायक एवं मंच संचालक जाहिद भाई ने गायकी और संचालन—दोनों भूमिकाओं को अद्भुत संतुलन और भाव के साथ निभाया।
विशेष प्रस्तुतियों के लिए तुलसी सोनी, मोहन चौहान एवं विजय पटेल को मंच पर आमंत्रित किया गया, वहीं चेतना लरौलकर की प्रस्तुति ने भी श्रोताओं को भावुक कर दिया।
कार्यक्रम की मंचीय अनुशासन, व्यवस्था एवं सौम्यता में श्रीमती माधुरी लरौलकर का योगदान अत्यंत सराहनीय रहा।
स्थानीय जनप्रतिनिधि पार्षद श्री विजेंद्र पटेल की भूमिका भी इस आयोजन में विशेष और प्रेरक रही।
🌹 संगीत साधना का 20वाँ वर्ष — संजय लरौलकर को नमन
यह संध्या विशेष रूप से इसलिए भी ऐतिहासिक रही क्योंकि श्री संजय लरौलकर द्वारा आयोजित रफ़ी नाइट्स का यह 20वाँ वर्ष था।
विगत 19 वर्षों से निरंतर रफ़ी साहब के गीतों के माध्यम से समाज को जोड़ने वाले,
तनावग्रस्त जीवन में संगीत की शीतल छाया देने वाले,
और स्वयं को पूरी तरह संगीत की साधना को समर्पित कर देने वाले संजय लरौलकर जैसे संगीत के जादूगर का शहर में होना सचमुच “सोने में सुहागा” है।
आज जब जीवन की आपाधापी और तनाव लोगों को भीतर से तोड़ रहा है, तब ऐसे संगीत–सेवक समाज के लिए आशा की मशाल हैं।
उनकी भूमिका केवल एक आयोजक की नहीं, बल्कि सांस्कृतिक प्रहरी की है—जो सुरों से संवेदना, और गीतों से मानवीयता को जीवित रखते हैं
“एक शाम रफ़ी के नाम” केवल एक कार्यक्रम नहीं था—
यह वीर रस की तरह आत्मसम्मान जगाने वाला,
और करुण रस की तरह आँखों को नम कर देने वाला
एक भावनात्मक अनुभव था।
रफ़ी साहब के गीतों ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया कि
महान कलाकार कभी जाते नहीं—वे सुरों में अमर हो जाते हैं।
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chhattisgarhaaspaas
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