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प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ ने ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ से सम्मानित कवि-कथाकार विनोद कुमार शुक्ल को दी श्रद्धांजलि
बीते दिनों 23 दिसम्बर, 2025 को हिंदी साहित्य का एक सूरज अस्त हो गया. 01जनवरी, 1937 को छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव में जन्में विनोद कुमार शुक्ल लंबे समय से ‘एम्स’ में भर्ती थे. उनके निधन के एक माह पूर्व ही, 21 नवम्बर, 2025 को उन्हें हिंदी साहित्य के सर्वोच्च सम्मान ‘ज्ञानपीठ पुरुस्कार’ से नवाजा गया था. ‘आरंभ’ के तत्वावधान में शोक सभा आयोजित कर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित किया गया. इस अवसर पर ‘आरंभ’ से जुड़े सदस्य शामिल हुए और अपने व्यक्तव्य से शब्दों की श्रद्धांजलि दी.

👉 • ज्ञानपीठ पुरुस्कार से सम्मानित होने के पहले की यह तस्वीर विनोद कुमार शुक्ल की है, तब शुक्ल जी ‘एम्स’ में भर्ती थे. उन्होंने कहा था- “लिखना-पढ़ना मेरी सांसों की तरह है”
‘आरंभ’ के मुख्य संरक्षक कैलाश जैन बरमेचा ने विनोद कुमार शुक्ल को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए बोले कि-

शुक्ल जी लिखते हुए जिए और लिखते हुए उनका निधन हुआ. उनके पास एक जादुई भाषा थी. उनकी एक कविता का स्मरण किया-
“जो मेरे घर कभी नहीं आएँगे/मैं उनसे मिलने/उनके पास चला जाऊंगा/एक उफनती नदी कभी नहीं आएगी मेरे घर/नदी जैसे लोगों से मिलने नदी किनारे जाऊंगा/कुछ तैरुँगा और डूब जाऊंगा/पहाड़, टीले,चट्टआनें, तालाब/असंख्य पेड़ खेत/कभी नहीं आयेंगे मेरे घर/खेत-खलिहानों जैसे लोगों से मिलने/गाँव-गाँव, जंगल-गलियां जाऊंगा/जो लगातार काम में लगे हैं/मैं फुरसत से नहीं/उनसे एक जरूरी काम की तरह/मिलता रहूँगा/इसे मैं अकेली आखिरी इच्छा की तरह/सबसे पहली इच्छा रखना चाहूंगा.
‘आरंभ’ के अध्यक्ष प्रदीप भट्टाचार्य ने विनोद कुमार शुक्ल को याद करते हुए कहा कि-

हम सबके प्रिय हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध कवि, ‘नौकर की कमीज’ का जादूगर ‘दीवार में एक खिड़की’ खोलकर इस दुनिया को अलविदा कर चला गया. आज शुक्ल जी नहीं हैं, पर उनके शब्द हमें याद दिलाते रहेंगे. शुक्ल जी पिछले 50 वर्षों से लेखन कर रहे हैं. उनकी पहली कविता संग्रह ‘लगभग जय हिंद’ 1971 में प्रकाशित हुई थी. उपन्यास ‘नौकर की कमीज’ पर फिल्मकार मणिकौल ने एक फिल्म भी बनाई थी. शुक्ल जी का जाना केवल साहित्य जगत का ही नहीं, देश के लिए एक बड़ी क्षति है. ‘आरंभ’ उन्हें शत् शत् नमन करता है.

‘आरंभ’ के मुख्य सलाहकार आचार्य डॉ. महेशचंद्र शर्मा ने विनोद कुमार शुक्ल को याद करते हुए अपनी बात कही-

👉 ‘आरंभ’ की बैठक
विनोद कुमार शुक्ल केवल शब्दों के शिल्पी नहीं थे, वे उस मौन शब्दों के अनुवादक थे जिसे आम पाठक अक्सर अनसुना कर देते हैं. हिंदी साहित्य जगत में विनोद जी को उनके अमूल्य योगदान के लिए हमेशा स्मरण किया जाएगा. विनोद जी का पहला उपन्यास ‘नौकर की कमीज’ बहुत मशहूर हुआ. हिंदी उपन्यास को एक आयाम देने वाले हमेशा याद किए जाएंगें. शत् शत् नमन.
‘आरंभ’ की कार्यकारी अध्यक्षा एवं ‘निर्झरा’ की लेखिका डॉ. रजनी नेलसन ने विनोद कुमार शुक्ल को नमन करते हुए अपनी बात उनकी अंतिम कविता- “बत्ती मैंने पहले बुझाई/फिर तुमने बुझाई/फिर दोनों ने मिलकर बुझाई…” का स्मरण कर कही-

मैं दुनिया के सारे सन्नाटे को सुनता हूँ. रात में जब नहीं आती है तो मैं मुक्तिबोध की तस्वीर के निकट जाकर बैठ जाता हूँ और उन्हें अपने निकट पाता हूँ… ऐसा कहने वाले विनोद कुमार शुक्ल का जाना हिंदी साहित्य जगत के लिए बड़ी क्षति है. उनकी साहित्यिक यात्रा कविता को नई दृष्टि व दिशा देती थी. विनोद जी की अनेकों कृतियाँ ताउम्र दिलों में कैद रहेगी. वे अस्पताल में भर्ती रहे, फिर भी लिखते रहे. वे बोले कि ‘लिखना-पढ़ना मेरी साँसों की तरह है’. उनकी कुछ कृतियाँ ‘कविता से लंबी कविता’, ‘सब कुछ होना बचा रहेगा’,’वह आदमी चला गया नया गरम कोट पहिनकर विचार की तरह’, ‘आकाश धरती को खटखटाता है’, ‘जो मेरे घर कभी नहीं आएंगे’. ‘हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था’, ‘बत्ती मैंने पहले बुझाई’ जैसे अनेकों कविता मील का पत्थर बनी. शुक्ल जी हमेशा याद किए जायेंगे. नमन
‘आरंभ’ की नव मनोनीत शायरा नूरुस्साबाह खान ‘सबा’ ने श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कही कि-

विनोद कुमार शुक्ल एक सादगी भरे जादुई यथार्थवाद के कवि- उपन्यासकार हिंदी साहित्य जगत के लिए 23 दिसम्बर, 2025 एक दुखत दिन रहा, जब प्रख्यात कवि, उपन्यासकार और ‘ज्ञानपीठ पुरुस्कार’ शुक्ल जी का रायपुर के ‘एम्स’ में निधन हो गया. वे 88 वर्ष के थे [01 जनवरी,1937 को जन्में, अगले जन्मदिन पर 89 के होते].लंबे समय से सांस की तकलीफ और उम्र संबंधी बीमारियों से जूझ रहे शुक्ल जी को 2 दिसम्बर को अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहाँ मल्टीपल ऑर्गन फेल्योर के कारण वे शाम 4.58 बजे अंतिम सांस ली. उनकी रचनाओं में ‘जादुई यथार्थवाद’ की झलक मिलती है, जहाँ साधारण जीवन की घटनाएं असाधारण गहराई और संवेदना से भर उठती हैं. वे वंचितों, हताश लोगों और मध्यवर्गीय संघर्षों के कवि थे, जो रोजमर्रा की जिंदगी में छिपी कविता को उजागर करते थे. उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं- उपन्यास ‘नौकर की कमीज’ [इस पर मणिकौल ने फिल्म बनाई]/’दीवार में एक खिड़की रहती थी’ [साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त]/’खिलेगा तो देखेंगे’/’एक चुप्पी जगह’/’लगभग जय हिंद’ [1971 में पहली प्रकाशित कविता संग्रह]/’वह आदमी चला गया नया गरम कोट पहनकर विचार की तरह’ और ‘कविता से लंबी कविता’ उल्लेखनीय है. उनकी रचनाएं फ्रेंच, जर्मन, इतावली सहित कई भाषाओं में अनुवादित हुई. 2023 में उन्हें अंतर्राष्ट्रीय PEN/NABOKOV पुरुस्कार और 2024 में 59वां ज्ञानपीठ पुरुस्कार मिला, जो छत्तीसगढ़ के किसी साहित्यकार को पहली बार मिला. शुक्ल जी की लेखनी में हताशा के बीच उम्मीद की किरण और बहुत ही आसान जुबान में बहुत गहरी बात कहने का हुनर था. आज के दौर में जहाँ कुछ छद्म साहित्यकार अपनी थोड़ी-बहुत उपलब्धि का महिमामंडन कर रहे हैं और खुद के नाम के साथ राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय साहित्यकार का लेबल लगा रहे हैं, वहाँ मेरा मन यह सोचने पर विवश हो जाता है कि सच्चा साहित्य साधक कभी अपने मुंह अपना महिमामंडन नहीं करता, वह ग्राउंड लेबल में रहकर अपने कार्य को अंजाम देता है, कितने सीधे-सादे सरल व्यक्ति थे आप [विनोद कुमार शुक्ल].मैं आपसे कभी मिली नहीं और खुद को इस लायक भी नहीं समझती कि इतने महान हस्ती से रूबरू होती.. फिर भी आप मेरे प्रेरणास्रोत रहेंगे हमेशा. शत् शत् नमन.
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विनोद कुमार शुक्ल को शत् शत् नमन, विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करने वालों में प्रमुख-

अनिता करडेकर {महिला विंग की अध्यक्षा}, विद्या गुप्ता {सुप्रसिद्ध लेखिका}, आलोक कुमार चंदा {सचिव}, प्रकाशचंद्र मण्डल {कोषाध्यक्ष}, पल्लव चटर्जी {इंटरनल ऑडिटर}, गौरी चक्रवर्ती गुहा {कानूनी एडवाइजर}, सुबीर रॉय {संयोजक}, त्रमबयक राव साटकर ‘अंबर’ {वरिष्ठ उपाध्यक्ष}, शानू मोहनन {वरिष्ठ उपाध्यक्षा} डॉ. संध्या श्रीवास्तव {उपाध्यक्षा}, दीप्ति श्रीवास्तव {उपाध्यक्षा}, डॉ. बीना सिंह ‘रागी’, शिवमंगल सिंह और तारकनाथ चौधुरी.
शत् शत् नमन
🕉 शांति
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chhattisgarhaaspaas
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