- Home
- Chhattisgarh
- संस्मरण : साक्षी आने वाली है… साक्षी, खुशहाली आने वाली है- कैलाश जैन बरमेचा
संस्मरण : साक्षी आने वाली है… साक्षी, खुशहाली आने वाली है- कैलाश जैन बरमेचा

👉 • साक्षी… मेरे मंझले साले साहब विमल डागा की पुत्रवधू और हमारे लिए-चार दिनों की अतिथि
“साक्षी आने वाली है… साक्षी”
यह वाक्य जैसे-जैसे मन में गूंज रहा था, वैसे-वैसे भीतर एक अनकही-सी प्रसन्नता भरती जा रही थी। मन बार-बार इसी विचार में ठहर जाता कि यदि उसके आने की केवल कल्पना से ही इतना सुकून और खुशहाली महसूस हो रही है, तो उसके वास्तव में आ जाने पर यह घर कितनी रोशनी, कितनी सकारात्मक ऊर्जा और कितनी आत्मीयता से भर जाएगा।
साक्षी…
मेरे मंझले साले साहब विमल डागा जी की पुत्रवधू।
और हमारे लिए—
चार दिनों के लिए हमारे दुर्ग स्थित घर की अतिथि।
उसके आने से ठीक पहले एक अनोखा अनुभव हुआ। अचानक घर के भीतर खुशबू से भरी हवा का एक कोमल-सा झोंका आया। यह खुशबू किसी इत्र की नहीं थी, बल्कि शुद्धता, अपनत्व और सकारात्मक भावनाओं से भरी हुई थी। मन में सहज ही यह भाव उभरा कि जब कोई पवित्र आत्मा किसी दहलीज पर आती है, तभी ऐसी सुगंधित हवा चलती है। अन्यथा कई बार हवाएँ अपने साथ नकारात्मकता, भय और अस्थिरता भी ले आती हैं, जो अपने मन को व्याकुल कर देती हैं।
पर यह हवा कुछ और ही कह रही थी—
मानो वह यह संदेश दे रही हो कि “डरो मत, कोई शुभ आगमन होने वाला है।”
हम बाहर निकले और देखे कि हमारी दहलीज पर सादगी से भरी, हल्के-से मेकअप में, आत्मविश्वास और सौम्यता से सजी एक खूबसूरत नवयुवती खड़ी है। उसे देखते ही मन में सकारात्मक तरंगें दौड़ने लगीं। बिना किसी औपचारिकता के, बिना किसी शब्द के, जैसे पूरे घर ने उसी क्षण उसे स्वीकार कर लिया।
चार दिन…
सिर्फ चार दिन…
लेकिन उन चार दिनों में घर की रफ्तार ही बदल गई।
“मैं आपके लिए पुरस के ला देती हूँ।”
“आप बैठिए, मैं खाना लगा देती हूँ।”
“आप थके होंगे, मैं हूँ ना।”
उसकी बातों में न कोई दिखावा था, न कोई औपचारिकता। बस एक सहज अपनापन था, जो सीधे मन को छू जाता था। दिनभर की व्यापारिक और प्रोफेशनल दुनिया की थकान उसकी मीठी-मीठी बातों में कब घुल गई, इसका एहसास ही नहीं हुआ। ऐसा लगने लगा कि घर केवल दीवारों और कमरों का समूह नहीं रहा, बल्कि भावनाओं से भरा एक जीवंत संसार बन गया हो।
हम उसके साथ घूमने भी गए—
कभी नगपुरा,
कभी केवलधाम,
और कभी किसी प्राकृतिक स्थल, विशेषकर मैत्री बाग की शांत, हरियाली से भरी गोद में।
हर जगह उसकी सादगी और उसका सहज आनंद यात्रा को और भी सुंदर बना देता। जब वह बोलती, तो लगता जैसे उसकी कोकिल-कंठ से निकले शब्द पूरे घर को संगीत के सुरों में बाँध रहे हों। कई बार ऐसा एहसास होता कि मानो पूर्णिमा स्वयं हमारे घर पधार गई हो।
चाहे किचन हो,
चाहे पूजा घर,
डाइनिंग रूम हो या शयन कक्ष,
या फिर बैठक—
घर का हर कोना रौनक से भर गया था। हर जगह एक सुखद अनुभूति थी, एक शांत ऊर्जा थी, और सकारात्मक तरंगें निरंतर बह रही थीं। जब कोई अपना घर आता है, तो जो सुकून मिलता है, वही सुकून हमें इन तीन-चार दिनों तक लगातार महसूस होता रहा।
लेकिन जैसे-जैसे उसके जाने का समय नज़दीक आता गया, मन में एक अनकहा-सा खालीपन भी उभरने लगा। सुकून भरे पल बहुत कुछ दे गए थे, पर अब उसके चले जाने के बाद घर कैसा लगेगा— यह विचार भीतर ही भीतर सताने लगा। उन्हीं ख्यालों में मन डूबा रहता, रात को नींद भी बड़ी मुश्किल से आती।
जाते-जाते हमने उससे सहज भाव से कहा—
“ऐसे ही साल में एक-दो बार, तीन-चार दिनों के लिए आ जाया करो। हम भी ताज़ा हो जाते हैं, रिचार्ज हो जाते हैं।”
और सच कहें तो उस समय यह बिल्कुल भी नहीं लगा कि कोई पराया आया था। ऐसा प्रतीत हुआ जैसे कोई अपना ही कुछ दिनों के लिए घर लौटा हो और अब फिर विदा लेने की तैयारी कर रहा हो।
इन्हीं भावनाओं और विचारों में मन डूबा हुआ था कि अचानक बिजली गुल हो गई। उसी क्षण मेरी नींद खुल गई। आँख खुलते ही समझ आया कि यह सब एक सपना था— साक्षी के आने की खुशहाली, घर की रौनक, वह अपनापन, वह सुकून।
कमरे में अंधेरा था, लेकिन मन में एक हल्की-सी मुस्कान बनी हुई थी। सपना टूट गया था, पर उसका एहसास दिल को देर तक रोशन करता रहा।
आज भी जब मन में यह विचार आता है—
“साक्षी आने वाली है…”
तो दिल अपने आप कह उठता है-
खुशहाली आने वाली है.

👉 • लेखक : कैलाश जैन बरमेचा
[ उद्योगपति समाजसेवी कैलाश जैन बरमेचा प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ और लोक शिक्षण-लोक जागरण व विचार की पत्रिका ‘छत्तीसगढ़ आसपास’ के मुख्य संरक्षक हैं.]
🟥🟥🟥
chhattisgarhaaspaas
विज्ञापन (Advertisement)