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संस्मरण : रजाई के सपने और जिम्मेदारी की सुबह – कैलाश जैन बरमेचा

👉 • ‘रजाई के सपने और जिम्मेदारी की सुबह…’ यह कहानी है अनिकेत की-एक मासूम मन, जो मौसमों के आकर्षण और समय की सच्चाई के बीच संतुलन सीख रहा है…
बचपन सपनों की उम्र होती है। मौसम बदलते हैं तो मन भी बदल जाता है। कभी ठंड की मोटी रजाई अपनी ओर खींचती है, तो कभी नानी का स्नेहभरा आँगन। इन्हीं सपनों के बीच जीवन धीरे-धीरे बिना शोर किए जिम्मेदारी का पाठ भी पढ़ाने लगता है। यह कहानी है अनिकेत की—एक मासूम मन, जो मौसमों के आकर्षण और समय की सच्चाई के बीच संतुलन सीख रहा है।
हेमंत ऋतु के आते ही अनिकेत के भीतर एक मीठी-सी हलचल शुरू हो जाती। सुबह की हल्की ठंडक उसके चेहरे को छूती और मन के किसी कोने से आवाज़ आती—कब शीत ऋतु आएगी, कब नानी के घर जाने का बहाना बनेगा।
छत्तीसगढ़ की ठंड उसे अच्छी लगती थी, पर हरियाणा के नानी के घर की ठंड कुछ और ही होती थी—ज्यादा सिहरन लिए, पर उतनी ही ज्यादा अपनत्व से भरी। वहाँ की हवा में जैसे दुलार घुला रहता था।
अनिकेत को पहले से अनुभव था कि कड़कड़ाती ठंड में मोटी रजाई के भीतर दुबक जाना कितना सुखद होता है। बाहर की ठंड भीतर गर्माहट बन जाती और आँखें बंद होते ही सपनों की दुनिया सजने लगती। रजाई के भीतर उसे नानी का आँगन दिखता, देसी गायों की घंटियाँ सुनाई देतीं, बिलोना से निकलते मक्खन की खुशबू आती और गरम रोटी का स्वाद जीभ पर उतर आता।
दूसरों से सुने ठंड के किस्से भी उसे उतना ही आनंद देते। वह मन-ही-मन सोचता—अगर सुनकर इतना अच्छा लगता है, तो वहाँ जाकर कैसा लगेगा।
ऐसे ही एक सपने में डूबा हुआ अनिकेत रजाई में सिमटा हुआ था कि अचानक रात के सन्नाटे को चीरती हुई पुलिस की गाड़ी की आवाज़ गूँज उठी। सायरन की तीखी ध्वनि के साथ मोहल्ले के चौकीदार की सीटी भी सुनाई दी।
अनिकेत चौंककर उठ बैठा। नींद टूट गई थी। कमरे में वही किताबें थीं, वही अधखुली कॉपियाँ और वही परीक्षा का दबाव। कुछ पल वह स्थिर बैठा रहा, फिर चुपचाप किताब खोल ली। सपने पीछे छूट गए और यथार्थ सामने खड़ा था।
दिन चढ़ते ही वह फिर अपने मन की बात लेकर मम्मी-पापा के पास पहुँचा—“मुझे नानी के घर जाना है।”
यह बात एक बार नहीं, कई बार दोहराई गई। जब जिद हद से बढ़ गई और परीक्षा बिल्कुल सिर पर थी, तो पापा का धैर्य टूट गया। गुस्से में पड़े दो थप्पड़ों ने उसके मन को भीतर तक हिला दिया। सख्त शब्द कानों में गूंजे—“अभी पढ़ाई का समय है, नानी का नहीं।”
अनिकेत का मन भर आया। आँखें नम हो गईं, पर वह कुछ बोला नहीं। चुप्पी में ही उसका टूटना भी था और समझना भी।
जब यह बात नानी तक पहुँची, तो उनके शब्दों में डाँट नहीं, केवल स्नेह था।
उन्होंने कहा—“बेटा, अभी मन लगाकर परीक्षा दे। समय अपनी जगह लौट आता है। ग्रीष्म ऋतु में मेरे पास आना, मैं तुझे साइकिल दिलाऊँगी।”
उन शब्दों में ऐसा भरोसा था कि अनिकेत का मन हल्का हो गया। साइकिल की कल्पना उसके भीतर नई चमक ले आई। उसने उसी क्षण मन ही मन निर्णय कर लिया—अब शीत ऋतु नहीं, ग्रीष्म ऋतु में नानी के घर जाएगा।
उस दिन के बाद अनिकेत का मन बदल गया। उसने अपने सपनों को टालना नहीं, बल्कि सहेजना सीख लिया। वह समझ गया था कि हर इच्छा का एक समय होता है। नानी का प्यार कहीं जाने वाला नहीं, पर परीक्षा का समय लौटकर नहीं आता।
अब वह मन लगाकर पढ़ाई करने लगा। रजाई के सपने उसके साथ थे, पर किताबों के बीच—एक संकल्प बनकर।

[ • प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ के मुख्य संरक्षक कैलाश जैन बरमेचा लेखन में निरंतर सक्रिय हैं. • आप स्वदेश 24×7 [नई दिल्ली] के राष्ट्रीय प्रधान संपादक और लोक शिक्षण लोक जागरण व विचार की मासिक पत्रिका ‘छत्तीसगढ़ आसपास’ एवं वेब पोर्टल न्यूज़ चैनल [छत्तीसगढ़] के भी मुख्य संरक्षक-सलाहकार हैं. ]
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