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श्रद्धांजलि सभा : ‘छत्तीसगढ़ प्रगतिशील लेखक संघ’ के तत्वावधान में प्रख्यात साहित्यकार, संपादक ज्ञानरंजन के निधन पर शोक सभा का आयोजन परमेश्वर वैष्णव के निवास ‘साहित्य परिसर’ में किया गया

▪️ • ‘छत्तीसगढ़ प्रगतिशील लेखक संघ’ के राज्य महासचिव व भिलाई-दुर्ग के अध्यक्ष परमेश्वर वैष्णव के निवास ‘साहित्य परिसर’ {सेक्टर-5, भिलाई} में रवि श्रीवास्तव की अध्यक्षता में आयोजित इस श्रद्धांजलि कार्यक्रम में ‘छत्तीसगढ़ प्रगतिशील लेखक संघ’, ‘छत्तीसगढ़ हिंदी साहित्य सम्मेलन’, ‘जनवादी लेखक संघ’, ‘जन संस्कृति मंच’, ‘इप्टा’ और प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ के साहित्यकार, ‘छत्तीसगढ़ आसपास’, ‘छत्तीसगढ़ आजतक’ के संपादक, पत्रकार, लेखक व प्रबुद्धजन उपस्थित हुए. सभी साहित्यकारों ने ज्ञानरंजन को साठोत्तरी पीढ़ी का प्रमुख कथाकार बताते हुए उनके निधन को अपूर्णीय क्षति निरूपित किया.
कथाकार लोकबाबू ने कहा-

▪️ [बाएँ से] • कामरेड बसंत कुमार उइके, लोकबाबू, रवि श्रीवास्तव, विनोद साव, गुलबीर सिंह भाटिया, परमेश्वर वैष्णव
ज्ञानरंजन ने कहानी को नई दिशा दी. साहित्यिक पत्रिका ‘पहल’ के संपादक के रूप में भी वैचारिक स्तर को बनाए रखने के साथ युवा रचनाकारों को प्रोत्साहित किया. मेरी कहानी ‘मेमना’ ‘पहल’ में छपी. उपन्यास ‘बस्तर बस्तर’ के लिए लिखी उनकी भूमिका के कारण मैं आगे बढ़ सका.
‘छत्तीसगढ़ हिंदी साहित्य सम्मेलन’ के राज्य अध्यक्ष,वरिष्ठ साहित्यकार रवि श्रीवास्तव ने कहा कि-

ज्ञानरंजन एक बड़े कथाकार ही नहीं बल्कि प्रगतिशील आंदोलन के अगुवा भी थे. ज्ञानरंजन संपादकों में संपादक थे. 1965 में लिखी उनकी कहानी पिता और मृत्यु अद्भुत है. लोग 125 कहानी लिखकर बड़े साहित्यकार नहीं बन पाते पर ज्ञानरंजन मात्र 26 कहानी लिखकर बड़े साहित्यकार बन गए. ‘पहल’ पत्रिका ने उन्हें अमर कर दिया.
सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार विनोद साव ने कहा कि-

हिंदी साहित्य के एक बड़े बौद्धिक वैचारिक व्यक्ति थे. वे निर्भीक लेखक तो थे ही उनमें रचना और लेखक के विश्लेषण की गहरी समझ थी.
• वरिष्ठ कथाकार गुलबीर सिंह भाटिया ने कहा कि- “आज जब विचारधारा पर हमले हो रहे हैं, ऐसे निर्मम दौर में ज्ञानरंजन जैसे वैचारिक और चिंतनशील साहित्यकार का निधन दुःखदायी है.”
• प्रगतिशील कवि शरद कोकास ने कहा कि- “युवा लेखकों से मिलकर हरिशंकर परसाई की तरह ज्ञानरंजन खुश होते थे. वे कहते साहित्य में शॉर्टकट नहीं, मेहनत की जरूरत होती है. ‘पहल’ की गुणवता को उन्होंने आखिर तक बनाए रखा.”
• प्रगतिशील कवि परमेश्वर वैष्णव ने कहा कि- “वे अंवेषक साहित्यकार, संपादक थे. ‘पहल’ पत्रिका के माध्यम से उन्होंने हिंदी साहित्य की प्रयोगशाला का 125 अंक तक सफल संचालन किया. उन्होंने रचना प्रकाशन को लेकर कभी कोई समझोता नहीं किया. वे प्रतिबद्ध संपादक थे.
• ‘जनवादी लेखक संघ’ के सदस्य शायर मुमताज ने कहा कि- “ज्ञानरंजन सिद्धांतवादी व्यक्ति थे. बड़े लेखक, बड़े इंसान थे. ‘पहल’ पत्रिका के माध्यम से उन्होंने निष्पक्ष संपादकीय समझ दी.”
• कथाकार विजय वर्तमान ने कहा- “हिंदी साहित्य में जो स्थान महावीर प्रसाद द्विवेदी का था, वही हैसियत ज्ञानरंजन का था. वे हिंदी के महत्वपूर्ण स्तम्भ थे.”
• कथाकारा डॉ. नलिनी श्रीवास्तव ने कहा- “ज्ञानरंजन अपने कालखंड के ऐसे बड़े लेखक, संपादक थे. जिन्होंने ‘पहल’ में देश के अनेकों रचना कारों की रचना प्रकाशित कर लेखकों-कवियों को समृद्ध किया.”
• ‘जसम’ के युवा कवि डॉ. अंजन कुमार ने कहा कि- “ज्ञानरंजन ने साहित्य को स्मृद्ध करने के साथ युवा कहानीकारों की एक फौज तैयार की. हमने एक बड़े वैचारिक सांगठनिक व्यक्ति को खो दिया है.”
• श्रमिक नेता कामरेड विनोद सोनी ने कहा कि- “हमें ज्ञानरंजन के सिद्धांतो पर चलकर अन्याय के खिलाफ वैज्ञानिक समाजवाद को बढ़ावा देना होगा.”
वरिष्ठ कवयित्री संतोष झांझी, ‘आरंभ’ के अध्यक्ष एवं ‘छत्तीसगढ़ आसपास’ के संपादक प्रदीप भट्टाचार्य, पत्रकार सहदेव देशमुख, ‘छत्तीसगढ़ जननाट्य मंच’ [इप्टा] के अध्यक्ष मणिमय मुखर्जी ने भी विचार व्यक्त करते हुए कथाकार ज्ञानरंजन को प्रखर निर्भीक संपादक व कालजयी लेखक बताया.
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श्रद्धांजलि की कुछ सचित्र झलकियाँ-

▪️[बाएँ से] प्रथम पंक्ति में- ‘इप्टा’ के राष्ट्रीय सचिव राजेश श्रीवास्तव, विमल शंकर झा, शरद कोकास, सहदेव देशमुख. [बाएँ से] दूसरी पंक्ति में- लखनलाल वर्मा, प्रदीप भट्टाचार्य और विजय वर्तमान.

▪️ संचालन करते हुए परमेश्वर वैष्णव

▪️ स्व. प्रो. ज्ञानरंजन को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए लोक बाबू ने कहा कि “मेरी कहानी को देशव्यापी पहचान ‘पहल’ ने दी. ‘पहल’ में ‘मेमना’ छपी, बाद में यह कहानी रूसी व जापानी एवं अन्य भारतीय भाषाओं में भी अनुवादित हुई”

▪️ श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए शायर मुमताज

▪️ प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ के अध्यक्ष प्रदीप भट्टाचार्य ने कहा कि “मेरी लाईब्रेरी में ‘पहल’ के लगभग 35-40 अंक आज भी सुरक्षित है और यह अंक दुर्लभ हैं”

▪️ ‘छत्तीसगढ़ प्रगतिशील लेखक संघ’ [प्रलेसं] भिलाई-दुर्ग के सचिव विमल शंकर झा ने आभार व्यक्त किया.
इस अवसर पर उपस्थित बसंत कुमार उईके, कमला वैष्णव, शिव नारायण, सुंदरलाल आदि साहित्यकार सुधीजन उपस्थित थे.
[ • प्रस्तुति व रिपोर्ट : प्रदीप भट्टाचार्य ]
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