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- छत्तीसगढ़ी लोक भाखा अऊ क्रांति भाखा म लिखे गे ये कहानी : आत्मसम्मान, संघर्ष अऊ स्त्री चेतना ला समर्पित आय ‘शर्मिंदगी’- -कैलाश जैन बरमेचा
छत्तीसगढ़ी लोक भाखा अऊ क्रांति भाखा म लिखे गे ये कहानी : आत्मसम्मान, संघर्ष अऊ स्त्री चेतना ला समर्पित आय ‘शर्मिंदगी’- -कैलाश जैन बरमेचा

👉 •- वो चाय वाली कहाँ गे? यही जादू धीरे-धीरे कपड़ा दुकान म चलो चल परिस. ग्राहक कपड़ा खरीदे आथें अऊ जात बखत कहिथें- ‘चाय पिला देना’
हसीना अइसन सुभाव के युवती रहिस जऊन जिनगी ला बोझ समझ के नई उठावत रहिस, बल्कि हर दिन ला अपन दिल ले महसूस करत जीयत रहिस। ओकर बर जिनगी सिरिफ साँस चलाय के नांव नई रहिस, बल्कि हर सुख-दुख, हर अनुभव ला समझ के, अपनाके जीय के नांव रहिस। जिनगी म तकलीफ त आथे—कभू आर्थिक, कभू मानसिक, अउ कभू अइसन हालत जिहां बिना कसूर के घलो आदमी ला लाज-शर्मिंदगी झेलना पड़थे। फेर हसीना अइसन तकलीफ मन ले ऊपर उठके जीय वाली माई रहिस, अउ सच म जऊन जिनगी जीय के कला जानथे, ओही अइसन होथे।
ये कहानी एक विकासशील नगर के आय। अइसन नगर जिहां रोजमर्रा के जिनगी अपन रफ्तार ले भागत रहिथे अउ लोगन मन कई दफे ये भूल जाथें के सामने वाला घलो ओतके संवेदनशील इंसान आय, जेतके वो खुद आय। ओही नगर म हसीना नांव के एक झिन माई रहिथे।
ओकर चमड़ी के रंग भले सांवला रहिस, फेर ओकर मन बहुते सुंदर रहिस। जऊन मनखे ओकर भीतर के जानथें, वो मन कहिथें के सुंदरता ओकर चेहरा म नई, ओकर सोच अउ ओकर बर्ताव म बसे रहिथे। एही सेती वो सबके बीच एक सुंदर युवती के रूप म जाने जाथे।
हसीना सुभाव ले चंचल रहिस, फेर ओकर चंचलता कभू शोर नई मचावत रहिस। ओकर बात-बिचार म ठंडक रहिस, सब्द म संयम अउ काम म जिम्मेदारी रहिस। ओकर कान म झूलत छोटकी बाली ओकर सुंदरता ला अउ निखार देथे। कई दफे अइसन लगथे के मानो वो बाली ला ओकर कान म आके अपन सही मंजिल मिल गे हो।
महँगाई के जमाना म हसीना खुद ये फैसला करिस के वो अपन पति संग कंधा ले कंधा मिलाके घर के जिम्मेदारी उठाही। एही सोच ले वो नगर के एक प्रतिष्ठित कपड़ा दुकान म काम करे लगिस। वो अपन काम ला सिरिफ नौकरी नई समझत रहिस। ओकर बर कपड़ा सिरिफ कपड़ा नई रहिस—वो लोगन के पसंद, संस्कृति अउ मौसम के भाषा रहिस।
काम के सिलसिला म वो देस के कई हिस्सा देखिस—दक्षिण के आंध्र प्रदेश ले लेके उत्तर के हिमाचल तक अउ दार्जिलिंग के चाय बगान तक। उहां वो सिरिफ व्यापार नई सिखिस, बल्कि धीरज, संतुलन अउ आनंद ला समझिस।
दार्जिलिंग म चाय बगान के बीच रहिके वो अलग-अलग स्वाद के चाय बनाय सीखिस। वो चाय बनाके सिरिफ लोगन के मन नई जीतत रहिस, बल्कि अपन मुस्कान घलो चाय म घोल देथे। चाय कभू-कभू पतली हो जाथे, फेर ओकर मुस्कान ओमा जान भर देथे। लोगन मन ओकर चाय के अइसन आदी हो जाथें के जिहां घलो जाथें, पूछथें – ‘वो चाय वाली कहाँ गे?’

यही जादू धीरे-धीरे कपड़ा दुकान म घलो चल परिस। ग्राहक कपड़ा खरीदे आथें अउ जात बखत कहिथें—“चाय पिला देना।” हसीना ग्राहक के दिल घलो जीत लेथे अउ दिल संग-संग ओकर पसंद घलो समझ लेथे। दुकान म आवे वाला हर ग्राहक ओकर बर जिम्मेदारी रहिथे अउ वो पूरा मन ले ओला निभाथे।
हसीना शौकीन मिजाज घलो रहिस। जऊन बखत वो ज्वेलरी दुकान या सिंगार दुकान जाथे, त उहां रखे गहना मन मानो ओला निहारत रहिथें। कान के बाली होवय, नाक के पीन होवय, पाँव के पायल होवय या गला के हार—सब गहना मन अइसन महसूस करवाथें के कब वो हसीना के सिंगार बनहीं। अइसन लगथे के सोनार के हाथ म पीट-पीटके बने गहना मन घलो सही गला, सही कान अउ सही पाँव के इंतजार करत रहिथें।
समय के संग ओकर समझ बढ़िस, जिम्मेदारी बढ़िस अउ तनखा घलो बढ़िस। ओकर मेहनत अउ बिक्री देखके दुकानदार ला मजबूरन ओकर तनखा दुगना करना परिस। ओकर उन्नति ला कोई रोक नई सकिस।
जिनगी आगे बढ़त रहिस। हसीना अधेड़ उमर के ओर बढ़त रहिस, फेर ओकर भीतर के ताजगी अउ सकारात्मक सोच ओतके बने रहिस। रोज के जइसे वो सांझ बखत दूध लेवे पास के एक होटल जाथे।
यहीं ले ओकर जिनगी म अइसन अनुभव जुड़िस जेला वो चाहिके घलो अनदेखा नई कर सकिस। हर दफे जऊन बखत वो होटल जाथे, होटल के मालिक ओकर संग सब्द ले नई, नजर ले शर्मिंदगी करवाथे। कुछ कहे नई जाथे, फेर बहुते कुछ जता दे जाथे।
वो लौटके आथे त ओकर मन भारी हो जाथे। कभू आँख झुक जाथे, कभू पाँव जल्दी-जल्दी चल परथे। वो कई दिन तक खुद ला समझाइस—शायद वो जादा सोचत हवय, शायद ये ओकर गलतफहमी हवय। फेर बार-बार ओही एहसास ओकर भीतर ला तोड़ डारिस।
एक दिन वो चुप नई रहिस। वो अपन दुकान के मालिक ला पूरा बात बता दिस—बिना बढ़ाय, बिना आरोप लगाय। सिरिफ एतके बताइस के हर बार ओला बिना सब्द के शर्मिंदा महसूस कराय जाथे।
दुकान मालिक ध्यान ले सुनेस अउ कहिस—“कोई घलो काम, कोई घलो सुविधा तोर आत्मसम्मान ले बड़ा नई हो सकय। तू उहां जाना बंद कर दे।”
शर्मिंदगी कोई मनखे नई होथे, वो एक सोच होथे। अउ सोच ला सोच लेच हराय जाथे। हसीना जानत रहिस के ओकर बूढ़े माता-पिता के इलाज बर कर्ज लेय गे रहिस, जेला वो अब अंतिम दौर म चुकावत रहिस। वो जानत रहिस के जिनगी के उद्देश्य बहुते बड़ा हवय।
जइसे कोई मुसाफिर ट्रेन पकड़े निकले अउ रास्ता म कुकुर भोंकें, त का वो कुकुर संग लड़ई करे खड़ा हो जाही? नई। वो अपन मंजिल बर आगे बढ़ जाथे। जिनगी घलो तभे सफल होथे जब हम रास्ता के आवाज मन ले ऊपर उठके अपन लक्ष्य के ओर बढ़थन।
ओही दिन हसीना फैसला करिस। वो होटल जाना बंद कर दिस। दूध अब कहीं अउ ले आवे लगिस अउ ओकर मन के बोझ धीरे-धीरे हल्का हो गे।
समय आय जब ओकर ऊपर के पूरा कर्ज उतर गे। वो दिन ओकर बर सिरिफ आर्थिक आजादी के नई, बल्कि आत्मसम्मान के पूर्णता के दिन रहिस। अब वो शौक ले गहना खरीदत रहिस, अपन आप ला सिंगारत रहिस, अउ सुशोभित करत रहिस। मानो गहना मन ला घलो अपन सही जगह मिल गे हो अउ हसीना ला घलो अपन संघर्ष के पूरा फल।
दुकान मालिक के सीख ओकर ला फिर ले जीवंत बना दिस। वो पहिले ले घलो जादा ताजगी संग काम करे लगिस। वो चाय घलो बनाथे, ग्राहक के दिल घलो जीत लेथे अउ ओकर पसंद घलो समझ लेथे।
जऊन दुकान के रफ्तार थोड़ी मंद पड़ गे रहिस, ओला हसीना फिर ले जीवंत कर दिस। कारोबार अइसन तेजी ले बढ़िस के दुकानदार ला मजबूरन ओकर तनखा फिर ले बढ़ाना परिस।
हसीना आज घलो ओतके आय—सांवली चमड़ी वाली, फेर बहुते सुंदर मन वाली। वो जानथे के सम्मान मांगे नई जाथे, सम्मान चुने जाथे।

👉 • लेखक- कैलाश जैन बरमेचा
[ • मुख्य संरक्षक- प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’
• राष्ट्रीय प्रधान संपादक- स्वदेश 24×7 न्यूज़ चैनल
• मुख्य संरक्षक,सलाहकार- ‘छत्तीसगढ़ आसपास’ मीडिया ग्रुप ]
• लेखक संपर्क-
• 90398 79080
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