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- लेख : क्यों हिंसक हो रहे हैं मासूम? आखिर हमारे मासूम बच्चे और किशोर इतने आक्रामक क्यों होते जा रहे हैं?- साजिद अली सतरंगी [उत्तरप्रदेश, मेरठ]
लेख : क्यों हिंसक हो रहे हैं मासूम? आखिर हमारे मासूम बच्चे और किशोर इतने आक्रामक क्यों होते जा रहे हैं?- साजिद अली सतरंगी [उत्तरप्रदेश, मेरठ]
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👉 • हम बच्चों को गणित, विज्ञान और अन्य भाषा तो पढ़ा ते हैं, लेकिन गुस्से को कैसे संभालें?
आज का समाज एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहाँ मासूम बच्चे, जिनसे केवल मुस्कान और खेल की उम्मीद की जाती थी, आज़ वो ही बच्चे, कई बार गुस्से, चिड़चिड़ेपन, और यहाँ तक कि हिंसा की निशानी बनते दिखाई देते हैं। स्कूल,काॅलिजो में झगड़े, छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा, वालिदैन, से बदसलूकी, जानवरों पर क्रूरता और कभी-कभी जुर्म की ओर बढ़ते कदम-ये सब हमें सोचने पर मजबूर करते हैं। “आखिर हमारे मासूम बच्चे और किशोर इतने आक्रामक क्यों होते जा रहे हैं?
यह केवल निजी मिज़ाज का सवाल नहीं है, बल्कि इसके पीछे हमारा पूरा सामाजिक, पारिवारिक, मानसिक, और तकनीकी परिवेश जिम्मेदार है।
किसी भी बच्चे का पहला मकतब उसका घर होता है। वहीं घर जहां प्यार, सब्र, बर्दाश्त, और गुफ्तगू सीखता है। मगर आज के परिवार खुद तनाव, भागदौड़ और असुरक्षा से घिरे हुए है। वालिद ओर वालिदा, दोनों कामकाजी हैं, वक़्त की कमी है, अपनी फ़िक्र में मुब्तिला है। बच्चों के साथ गुफ्तगू कम और हुकुम, ज़्यादा हो गए हैं।
जब बच्चा अपनी तमन्ना ज़ाहिर नहीं कर पाता, तो वे भीतर दबती जाती हैं , और एक दिन गुस्से या हिंसा के रूप में बाहर आती हैं। कई घरों में बच्चों के सामने ही झगड़े, चीख-पुकार और कभी-कभी शारीरिक हिंसा होती है। बच्चा वही सीखता है जो वह देखता है। उसके लिए यह सुलूक, मामूली बन जाता है।
आज़ हमारे घरों में एक बात बिल्कुल आम हो गई है बच्चें को खिलौनों से पहले मोबाइल पकड़ाते है। कार्टून, वीडियो गेम, रील्स और वेब-सीरीज़ में मार-धाड़, बदला, गाली-गलौज और क्रूरता को मनोरंजन के रूप में दिखाया जाता है।
वीडियो गेम्स में जीतने के लिए मारना, कुचलना, ख़त्म करना यह सब खेल की तरह सिखाया जाता है। धीरे-धीरे गम्भीरता कम होती जाती है। बच्चा असली और हकीकी दुनिया के फर्क को समझ नहीं पाता। जो स्क्रीन पर मामूली लगता है, वही असल ज़िंदगी में भी अपनाने लगता है।
आज का तालीमी तंत्र अंक, रैंक और प्रतियोगिता पर टिका है। हर बच्चा डॉक्टर, इंजीनियर या टॉपर बने-यह उम्मीदें उस पर मानसिक बोझ डालती है।
जब वह उन सब उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाता, तो उसके भीतर अहसास-ए-कमतरी,और नफ़रत जन्म लेती है। यही नफ़रत कभी साथियों पर, तो कभी उस्तादों पर और कभी खुद पर हिंसा के रूप में ज़ाहिर होती है। स्कूलों में बुलिंग, ग्रुपिज़्म और अपमान भी बच्चों को आक्रामक बना रहे हैं।
पहले संयुक्त परिवारों में दादी-नानी की कहानियाँ, पड़ोसियों से अपनापन और रिश्तों की गरमाहट बच्चों को जज़्बाती, हिफाज़त देती थी। मगर आज एकल परिवारों और बंद कमरों में पलते बच्चे अक्सर अकेलेपन का शिकार होते हैं।
उनके पास महंगे गैजेट्स तो हैं, लेकिन दिल की बात सुनने वाला कोई नहीं। जब हमदर्दी नहीं मिलती, तो अहसासात धीरे-धीरे मरने लगते हैं। फिर दूसरों के दर्द का अहसास भी नहीं होता।
गरीबी, बेरोज़गारी, भेदभाव और अपराध से भरे माहौल में पलने वाले बच्चों के मन में डर और गुस्सा जल्दी जन्म लेता है। उन्हें लगता है कि दुनिया उनसे कुछ छीन रही है। यह अहसास उन्हें आक्रामक बना देते है।
झुग्गियों में, संघर्षशील इलाकों में, या हिंसक माहौल में रहने वाले बच्चे अक्सर वही बोली और सुलूक सीखते हैं जो उनके आसपास चलता है।
अक्सर माता-पिता बच्चों की गलती पर बात करने की बजाय सीधे डाँट या मार का सहारा लेते हैं। इससे बच्चा यह सीखता है कि समस्या का हल ताक़त है, बातचीत नहीं।
जब वही बच्चा बाहर किसी से असहमत होता है, तो वह भी बातचीत की जगह आक्रामकता चुनता है।
हम बच्चों को गणित, विज्ञान,आदि और भाषा तो पढ़ाते हैं, लेकिन गुस्से को कैसे संभालें, दुख को कैसे ज़ाहिर करें, नाकामयाबी को कैसे स्वीकार करें-यह नहीं सिखाते।
जज़्बात ओर ज़हानत की कमी के कारण बच्चे अपने अहसासात को समझ नहीं पाते और हिंसा के रूप में ज़ाहिर करते हैं।
समाधान का रास्ता
मासूमों को फिर से मासूम बनाने के लिए समाज को कई स्तरों पर कोशिश करनी होगी,,
परिवार में गुफ्तगू और वक़्त ,रोज़ कुछ वक़्त बच्चों से बिना मोबाइल, बिना डाँट, सिर्फ सुनने के लिए निकालना।
स्क्रीन पर लगाम–उम्र के अनुसार कंटेंट, वक़्त, दायरा और वालिदैन की निगरानी।
स्कूल में अहसासात की तालीम- नमाज़, योग, ध्यान, काउंसलिंग और ज़िन्दगी जीने का सलीका, सिखाने की क्लास चलानी होगी।
सकारात्मक उदाहरण– बच्चे वही बनते हैं जो वे बड़ों में देखते हैं। हमें अपने सुलूक से अहिंसा और हमदर्दी सिखानी होगी।
खेल और कला–ऊर्जा को रचनात्मक दिशा देना, ताकि उनका आक्रोश सृजन में बदले, विनाश में नहीं।
आख़िर में यही कहूंगा,,,
कोई भी मासूम पैदाइश से ज़ालिम नहीं होता। माहौल उसे ऐसा बनाता हैं। अगर आज के बच्चे गुस्सैल और आक्रामक हो रहे हैं, तो यह हमारे समाज के लिए एक चेतावनी है। हमें यह समझना होगा कि उनके जुर्म उनके भीतर छिपे दर्द की ज़बान है।
जब हम उस दर्द को सुनना और समझना सीखेंगे, तब शायद उनके हाथों में पत्थर नहीं, खिलौने होंगे; उनकी आँखों में नफरत नहीं, सपने होंगे; और उनके दिलों में डर नहीं, भरोसा होगा, जीने की एक उम्मीद होगी,वो ही उम्मीद जिसे हम पुरसुकून होकर जीना चाहते हैं।

👉 • साजिद अली सतरंगी
[लेखक संपर्क- 94575 30339]
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