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काव्य गोष्ठी : ‘संकेत साहित्य समिति’ के तत्वावधान में नववर्ष के उपलक्ष्य में सरस काव्य गोष्ठी सम्पन्न : काव्य गोष्ठियों से नये सृजन को बल मिलता है- गिरीश पंकज

• छत्तीसगढ़ आसपास
• रायपुर
रायपुर के वृंदावन सभागार में 20 जनवरी, 2026 को भाषाविद् व वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. चितरंजन कर की अध्यक्षता, लब्धप्रतिष्ठत व्यंग्यकार व ‘सद्भावना दर्पण’ के संपादक गिरीश पंकज, मीर अली मीर एवं सुरेंद्र रावल के विशिष्ट अतिथि में ‘संकेत साहित्य समिति’ के तत्वावधान में नववर्ष के उपलक्ष्य पर सरस काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया.

कार्यक्रम के प्रारंभ में अतिथियों ने माँ सरस्वती की पूजा अर्जना की. अतिथियों का पुष्पगुच्छ से स्वागत, अंगवस्त्र, मोतियों की माला, श्रीफल से कवि छबिलाल सोनी, विजय मिश्रा ‘अमित’ एवं लक्ष्मीनारायण लहोटी ने सम्मान किया.
‘संकेत साहित्य समिति’ के संस्थापक एवं प्रांतीय अध्यक्ष डॉ. माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’ ने स्वागत उद्बोधन में कहा कि-
दीर्घकालीन साहित्यिक यात्रा पर प्रकाश डाले और बोले कि रचनाकारों के लिए बौद्धिक विकास की कार्यशाला होती है साहित्य समिति. इस दिशा में ‘संकेत साहित्य समिति’ निरंतर ऐसे आयोजन करते आ रही है.
डॉ. चितरंजन कर ने कहा कि- सीखने की कोई उम्र नहीं होती. जो सीखना बंद कर देता है वो फिर ऐसे आयोजन में आकर अपनी बात को काव्यात्मक शैली में कहने लगता है.


गिरीश पंकज ने कहा कि- काव्य गोष्ठियों से नये सृजन को बल मिलता है. सहित्यिक वातावरण चिंतन के लिए मस्तिष्क की उर्वरता को बढ़ाता है.
सुरेंद्र रावल ने रचनाकारों द्वारा पढ़ी कविताओं को रेखांकित किया.
कवियित्री पल्लवी झा ने संचालन किया.
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काव्य पाठ में शामिल हुए-

डॉ. चितरंजन कर, गिरीश पंकज, डॉ. माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’, डॉ. सुधीर शर्मा, मीर अली मीर, सुरेंद्र रावल, महेश कुमार शर्मा, डॉ. सिद्धार्थ कुमार श्रीवास्तव, डॉ. दीनदयाल साहू, पल्लवी झा ‘रूमा’, सुषमा पटेल, पूर्वा श्रीवास्तव, शकुंतला तरार, गोपाल सोलंकी, छबिलाल सोनी, राजेश अग्रवाल, डॉ. रविंद्र सरकार, हरीश कोटक, माधुरी कर, रीना अधिकारी, दिलीप वरडकर, शिवशंकर गुप्ता, मन्नूलाल यदु, लवकुश तिवारी, यशवंत यदु, देवाशीष अधिकारी, चेतन भारती, बानीब्रत अधिकारी, राजकुमार सोनी, अर्चना श्रीवास्तव, रामचंद्र श्रीवास्तव, राजेंद्र रायपुरी, रूणाली चक्रवर्ती, विवेक रहाटगांवकर, समायरा पटेल, ज्योति रहटगांव कर, नितेश ठाकुर ‘नीर’, लाल जी साहू, कुमार जगदली,अंबर शुक्ला ‘अंबरीश’, राजेंद्र ओझा, एकता शर्मा, अनीता झा, राकेश अग्रवाल, विपुल तिवारी, आशा पाठक, नीलिमा मिश्रा, माधुरी कर, कल्याण तिवारी और गणेश दत्त झा.
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नववर्ष के उपलक्ष्य में नयी चेतना, नयी परिकल्पना एवं नयी विचारधाराओं से संबंधित पढ़ी गई रचनाओं के कुछ कवियों/कवयित्रियों प्रमुख अंश-
* महाकाव्य लिखकर दिखलाऊँ, अपने प्रभु में मैं रम जाऊँ/तुलसी बनकर ग्रंथ सुनाऊँ, रघु वर को उर में बैठाउँ.
– पल्लवी झा ‘रूमा’
* खुद को चेतना चाहा/तो किसी ने खरीदा नहीं/जमीर बेचकर आया/तो खुद-ब-खुद बिक गया मैं…
– नितेश ठाकुर ‘नीर’
* नि:स्तब्ध पथ, नीरव जगत/जागे एक प्राणी/नाम उसका हरि, हमारे प्रहरी/तस्कर-त्राणी.
– डॉ. रविंद्रनाथ सरकार
* आसमान नील रंग, देख राधिका उमंग/साँवरे सुजान कृष्ण, बाँसुरी बजाइए/चाल है मलंग मस्त, मोहते कमान शस्त्र/देख काम कोटि रूप, राधिका बुलाइए…
– सुषमा प्रेम पटेल
जीते जी कोई पूछ परख नहीं/मरने पर सब याद करें/संकट में कोई मिला न मुझसे/मरने पर सभी विलाप करें.
– शिवशंकर गुप्ता
सच्चा यदि एक है तो झूठे हैं पूरे सात/झूठे ही मिलकर करते हैं एकता की बात.
– रीना अधिकारी
मान होवय तिरंगा के/जन-जन एकर गीत गालव जी/देश के मा न बढ़ाए खातिर/घर-घर एला लहरालव जी.
– डॉ. दीनदयाल साहू
कल-खल निनादिनी, रजतवर नी, नवयोवना, स्वगर्या, महा नदी, महानदी, कहाँ चली, कहाँ चली, कहाँ चली…
– डॉ. सिद्धार्थ कुमार श्रीवास्तव
* पहाड़ों पर्वतों से टकराती नदियाँ सी होती है बेटियां/धनिया पदीना मीठी नीम की पतियां सी होती हैं बेटियां.
– विजय मिश्रा ‘अमित’
* उत्तर में हिमाला है/सिर मुकुट निराला है/दक्षिण में चरण धोता/सागर विकराला है.
– रामचंद्र श्रीवास्तव
* एक ही नारा, एक ही नाम,जय श्रीराम जय श्रीराम/पुण्य प्रतापी एक ही धाम, जय श्रीराम, जय श्रीराम.
– अर्चना श्रीवास्तव
* केवट, निषाद, शबरी, वनप्राणी, सबका मान बढ़ाया था/अयोध्या से चले राम ने, समर सता का पाठ पढ़ाया था.
– लवकुश तिवारी
* झुक जाने से कोई इंसान छोटा नहीं हो जाता है/जितना जो शांत है, उतना ही विनम्र ही जाता है.
– राजकुमार सोनी
* सिरमन सज्जन कर जोड़-जोड़ मैं करूँ अभिनंदन कुत्ते का/साहब अंदर बंगले में गेट पर नाम लिखा है कुत्ता के.
– कुमार जगदली
* पहलगाम की सुरम्य वादियां/पीड़ा से चीत्कार उठीं/आतंकियों के हमले से/मानवता धिक्कार उठी.
– पूर्वा श्रीवास्तव
* अगोर ले पुरवाई नवा गाँव बनन दे/छरियाय किसनहा के ए के छांव परन दे/समे हा मलो ले थें.
– चेतन भारती
* नारी से नर शोभित हैं/सुन ले ये सकल जहान/नारी बिना अपूर्ण सभी/सब जीव जगत भगवान.
– छबिलाल सोनी
* वह हमेशा सफेद कपड़े पहनती थीं/एक बार इसके बारे में मैंने पूछा, तो उन्होंने जवाब दिया- ‘कंट्रास्ट’/और एक तरफ इशारा किया/इशारे वाली जगह पर उनका काले बाल वाला कुत्ता खड़ा था.
– राजेंद्र ओझा
* जाने कितनी नदियों से मिल/एक समुंदर बनता है/बिखरे सपनों से जुड़ कर ही कोई/मुकद्दर बनता है.
– डॉ. सुधीर शर्मा
* झन पुंछ काबर लिखना जरूरी हे/जिंदा हन आज ए खातिर लिखना जरूरी हे/सब्बो झन चाहे दुनिया के दरद हम लिखन/हम त हवन संदेसिया फेर लिखना जरूरी हे.
– विवेक कुमार रहाटगांवकर
* स्वार्थ की खातिर संबंधों का नित-नित रूप बदलते देखा/मनुहारों की भाषा कहाँ-यहाँ अपनों को ही छलते देखा.
– शंकुतला तरार
* ये चमन देख लो/ये गगन देख लो/देखना है तो मेरा वतन देख लो/अमन के लिए देश धर्म निभाते हैं/गाते हैं वंदेमातरम् गाते हैं.
– मीर अली मीर
* किसी बात की अब तमन्ना नहीं है/मुझे जो खरीदे वो धन्ना नहीं है/उसे हर घड़ी मैं पलटता नहीं हूँ/जो मेरी कहानी का पन्ना नहीं है.
– डॉ. माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’
* आ जाओ कन्हैया मेरे/आ जाओ कन्हैया/संकट में गोपिकाएं/खतरे में है गैया.
– गिरीश पंकज
* सत्यकर्मों ने केवल मुझको मालाएं पहनाई/धूलों ने चलना सिखलाया सच्ची राहों में.
– डॉ. चितरंजन कर
• आभार व्यक्त पत्रकार, कवि, संपादक डॉ. दीनदयाल साहू ने किया.
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