- Home
- Chhattisgarh
- यात्रा संस्मरण : दीप्ति श्रीवास्तव
यात्रा संस्मरण : दीप्ति श्रीवास्तव
▪️
कौन शिक्षित
– दीप्ति श्रीवास्तव
{ छत्तीसगढ़-भिलाई }

प्रकृति हवा और पत्तों के माध्यम से बोलती सुनती कहती है क्या हम उसे समझ पाते है ? वह हमसे कुछ मांगती नहीं अपितु निःशुल्क निस्वार्थ देती ही जाती है । ऐसे ही जिन्दगी में कुछ घटनाएं दिल में हलचल मचा हमेशा के लिए मस्तिष्क पटल पर अंकित हो जाती।
हाल की बात है हम लोग दो दिन के टूर पर सतरेंगा कोरबा छत्तीसगढ़ घूमने गए । हमारी टीम घूमते हुए प्रकृति का हुस्न देख अभीभूत हो रही थी । जंगली वृक्षों की खुशबू नथुनों से सीधे दिमाग में पहुंच शांति दे रही थी। ऐसा वातावरण और शुद्ध हवा सुकुन शांति हमें शहरों में नहीं मिलती ।
चाय की गुमटी वाले ने जंगल के प्रति हमारी ललक देख पास के झरने देवपहरी जाने को कहा आपको रास्ते में साल, महुआ ,तेंदू ,चिरौंजी और हरा बेहरा आदि जैसे अति पुराने पेड़ों के दर्शन होगें तथा जंगल से गुजरते हुए सीना ताने आसमान को पुकारते ,धूप को धता बताते अपने वैभव की कहानी कहते इन जंगलों की विशेष महक आपको सम्मोहन में डाल देगी । उससे कानन का इतना सुन्दर वर्णन सुन हम अपने आपको उस जगह जाने से रोक नहीं सके ।
पुराने घने जंगल की भव्यता देखते हुए दूर से ही कल कल की नाद सुनते हुए उस झरना तक पहुंचे । आंखे उस प्रकृति नजारे को कैद कर लेने उतावली थी ।
वहां की साफ सफाई देख दिल खुश हो गया चट्टानों तक में कचरा नहीं । छोटी छोटी गुमटियां जिसमें देसी फल चाय बिस्कीट वगैरह मिल रहे थे । तेंदू, चार आदि जंगली फल हमारे लिए नये थे।
जैसे ही झरने की ओर बढ़ने लगे वहां तीन चार छोटे बच्चे और स्थानीय जन प्लास्टिक बोतल और पॉलीथिन का कचरा बीनते मिले। कहने लगे छुट्टियों के बाद यहां यही हाल रहता है
छुट्टी के दिन लोग पिकनीक मनाने आते संग अपनी आदतों का परिचय छोड़ जाते साथ लाई गई खाने पीने की सामग्री पानी बोतल ,प्लेट , पानमसाला के पैकेट जैसी गंदगी यहां बिखेर जाते । इलाके की देखरेख की कमान गांव वालो ने अपने हाथों में ले रखी थी । बेशक छुट्टी का मजा ले पर्यावरण को ध्यान में रखकर परंतु ये लोग जंगल और पानी को नुकसान पहुंचाते है। झरने में गुटखे के पैकेट बोतल आदि फेक विमल नीर दूषित करते है
हमने उन लोगों का अपनी धरती के प्रति लगाव देख कुछ पैसे से मदद करना चाही तो बोले यह जल जंगल हमारा देवता सर्वेसर्वा है इसके प्रति हमारा कर्तव्य हमें सजग रखता है उसके लिए हमें पैसे की जरूरत नहीं । आदिवासी इलाका उनका अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक रहना हमें शर्मसार कर गया क्योंकि पानी पीकर हमने भी पानी की बोतल डस्टबीन में न डाल यूं ही जंगल में फेंक दी थी ।
उनकी गोदने की कला को हम टैटू कह शरीर पर बनवा रहे है फिर सफाई की धरोहर में पीछे क्यों है ? सोचने मजबूर हो गए पढ़े लिखे होने से ही आदमी सभ्य नहीं मगरुर बन आत्मकेंद्रित हो जाता है l सभ्यता में हमसे ज्यादा शिक्षित तो वे लोग हैं जो पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझते है।जिनमें मैं की भावना के स्थान पर सर्व की भावना सर्वोपरि है।
• लेखिका संपर्क-
• 94062 41497
• email-
• vksdeepti2014@gmail.com
🟥🟥🟥
chhattisgarhaaspaas
विज्ञापन (Advertisement)