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संस्मरण : कैलाश जैन बरमेचा

👉 • “यदि जीवन में सकारात्मक ऊर्जा, परोपकार और संवेदना का संचार हो तो छोटा जीवन भी पूर्ण बन जाता है”
• संवेदना
– कैलाश जैन बरमेचा
[ छत्तीसगढ़-दुर्ग ]
कौशल अक्सर यह सोचकर ठहर जाता था कि जीवन वास्तव में कितना छोटा है। कभी बुज़ुर्गों की बातों में उसने सुना था कि पहले मनुष्य हजारों वर्षों तक जीते थे, फिर सैकड़ों में सिमट गए और आज जीवन दशकों में ही सिमट कर रह गया है। साठ–सत्तर वर्ष की उम्र भी अब पूर्ण जीवन मानी जाती है।
वह जब अपने जीवन की गणना करता, तो पाता कि उसका बड़ा हिस्सा तो अनजाने ही निकल गया—बाल्यावस्था खेलते–कूदते बीत गई, किशोरावस्था और युवावस्था जिम्मेदारियों, संघर्ष और भविष्य की चिंता में निकल गई। और जो समय वास्तव में पूर्ण परिपक्वता का होता है, जहाँ मनुष्य सोच-समझकर, अनुभव के साथ जी सकता है—वह समय कितना अल्प होता है।
कौशल ने अपने गाँव में कई वृद्धों को देखा था। उनकी आँखों में स्मृतियों का सागर भरा होता, पर शरीर धीरे-धीरे साथ छोड़ देता। किसी की सुनने की शक्ति कम हो जाती, किसी की ज़ुबान लड़खड़ाने लगती, किसी की आँखें धुंधला देखने लगतीं। पाँचों इंद्रियाँ जैसे एक-एक कर विदा लेने लगतीं। उस अवस्था में जीवन भर की संचित यादों के सहारे ही वृद्धावस्था चलती है।
यहीं से कौशल के भीतर एक प्रश्न जन्म लेने लगा—
“क्या मैं भी एक दिन इसी अवस्था में बैठकर यह सोचूँगा कि काश ऐसा कर लिया होता, काश वैसा कर लिया होता?”
वह जान गया कि सबसे बड़ा दुख यह नहीं कि जीवन समाप्त हो गया, बल्कि यह है कि जीवन जीते समय हम वह नहीं कर पाए जो कर सकते थे। केवल अपने लिए जीना आसान है, लेकिन वह जीवन अंत में प्रश्नों से भर जाता है। कौशल को यह भी समझ आया कि ‘आम जनता’ के लिए जीना कोई नारा नहीं, बल्कि संवेदनशील मनुष्यों का स्वभाव होता है। सच्चे अर्थों में वही लोग अपने परिवेश के लिए जीते हैं, जो सत्ता या पद से नहीं, बल्कि संवेदना से प्रेरित होते हैं।
कौशल ने देखा कि जो लोग अपने आसपास के माहौल को बेहतर बनाने में लगे रहते हैं, उनका वर्तमान भी सुखद होता है और भविष्य की स्मृतियाँ भी उन्हें शांति देती हैं। परोपकार उनके लिए बोझ नहीं, बल्कि जीवन का स्वाभाविक प्रवाह होता है।
उसने यह भी स्वीकार किया कि केवल परोपकार से जीवन नहीं चलता। स्वयं की अर्थव्यवस्था, परिवार की जिम्मेदारियाँ, आत्मनिर्भरता—ये सब आवश्यक हैं। लेकिन इन सबके बीच यदि मनुष्य दूसरों के लिए थोड़ा-सा समय निकाल ले, तो वही जीवन सार्थक बन जाता है।
कौशल के व्यवहार में एक विशेष बात थी। वह जहाँ भी जाता—किसी की दुकान, किसी का ऑफिस, किसी का घर—वहाँ नकारात्मकता लेकर नहीं जाता था। उसके शब्दों में नम्रता होती, आँखों में अपनापन और मन में सकारात्मकता। वह मानता था कि मनुष्य शब्दों से पहले अपनी ऊर्जा से परिचय देता है।
कई बार लोग उससे कहते,
“कौशल जी, थोड़ी देर और बैठ जाइए… अच्छा लग रहा है।”
वह जानता था कि यह केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि उसकी सकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव है।
कौशल का विश्वास था कि जब तक हमारे मन और मस्तिष्क में दूसरे व्यक्ति के प्रति धनात्मक विचार नहीं होंगे, तब तक हमारी ऊर्जा उसके आभामंडल तक नहीं पहुँच सकती। और धनात्मक विचार तभी जन्म लेते हैं, जब हमारे भीतर हर मानव के प्रति सद्भावना होती है—बिना स्वार्थ, बिना तुलना।
धीरे-धीरे कौशल का जीवन एक संदेश बनता चला गया। वह उपदेश नहीं देता था, बस जीकर दिखाता था। उसने यह समझ लिया था कि जीवन की सार्थकता लंबाई में नहीं, बल्कि गहराई में है। ऐसा जीवन, जिसे याद करते समय वृद्धावस्था में आँखें नम नहीं, बल्कि शांत हों।
और शायद यही कारण था कि कौशल को यह भय नहीं सताता था कि जीवन छोटा है।
क्योंकि वह जानता था—
“यदि जीवन में सकारात्मक ऊर्जा, परोपकार और संवेदना का संचार हो, तो छोटा जीवन भी पूर्ण बन जाता है।”

[ • लेखक- कैलाश जैन बरमेचा ]
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