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व्यंग्य : लल्ली का वेलेंटाइन – दीप्ति श्रीवास्तव

अभी वेलेंटाइन वीक यानि वेलेंटाइन सप्ताह चल रहा है सो लल्ली ने भी आधुनिक दुनिया का नया चाल चलन अपनाने की सोची क्या हुआ सीनियर सिटीजन होने से ! सीनियर सिटीजन सुन सुनकर ऊब चुकी थी लल्ली। अरे क्या सीनियर सिटीजन होने से भावना मर जाती है ? भावनाओं से लबरेज दिल तो जवान रहता है धक धक करता है । लल्ली ने पक्का इरादा के लिया वेलेंटाइन दे मनाने का
शादी थी पुरानी ।
रोमांस था नया ।
उमंग थी उफनती ।
शराब थी पुरानी,बोतल थी नई।
घोड़ी थी पुरानी,लगाम थी नई।
लल्ली खूब खुश होने लगी अपना तो वेलेंटाइन पति ही होगा… इस बाहसठ की उम्र में भला कोई नया साथी मिलेगा क्या ? यह सोचकर सोचकर लल्ली जी बाहसठ साल की ऊर्जा से भरपूर लड़की बन गई l दूसरे शब्दों में वेलेंटाइन के स्थान पर गर्लइनटाईन कहना ज्यादा बढ़िया रहेगा l
बाल रंगने, तन ढ़लने ,डगमगाते चलने तिस पर दांतों का डेंचर अपनी अदा दिखाता
फिर भी चली है लल्ली जी वेलेंटाइन डे मनाने।
खूब सज धज कर गहरे रंग की लिपस्टिक लगा मेकअप पोत कर उत्साह से लबरेज हो लल्ली अपने पतिदेव के पास पहुंची ।
लल्ली को देखते ही पतिदेव घुड़क दिए “यह क्या लीपा पोती कर बंदरिया बन कर आई हो लल्ली । ”
तो यह था पहला वार लल्ली के वेलेंटाइन की हवा निकालने का l बेचारी के उत्साह की आंच थोड़ी धीमी पड़ गई l
लल्ली ने शर्माते हुए बताया “अजी आज वेलेंटाइन डे है न प्यार मुहब्बत का दिन उसी के लिए आज सजी-धजी हूं वह भी आपके लिए ।
“आप हमारे वेलेंटाइन हम आपकी वेलेंटीना ”
पति ने आंख तरेरी “ये सब चोंचले जवान लोगों के है । बाजार से लौटे पति थके मांदे पति ने झोले में से फूल के स्थान पर फूलगोभी का फूल पकड़ाते हुए कहा –
“जाओ हमारे लिए जरा कड़क चाय बना लाओ और हां साथ में फूलगोभी गरमागरम पकौड़े भी ” इस वार ने लल्ली की वेलेंटाइन डे मनाने का गुब्बारा फूस कर दिया ।
बेचारी लल्ली …. के उत्साह पर घड़ों पानी पड़ गया l चली हालात की मारी रसोई की तरफ बेमन से एक बार मुएं आदमी ने नजर उठा कर देखा भी नहीं l गरमागरम पकौड़े खाना है इनको अपने आप में बड़बड़ाते हुए रसोई की ओर जा रही थी l
तब उसे समझ आया क्यों इस नीरस आदमी को वेलेंटाइन डे नहीं मनाना आता जो वैल तरीके से टाई नहीं बांध सकता वो क्या खाक वेलेंटाइन डे का लुफ्त उठाएगा l यह तो लल्ली जैसे जिगर वालों का पर्व है l अबसे यह लल्ली अकेले आईने के साथ वेलेंटाइन दे मनाएगी बस आईने की अपनी कोई मजबूरी ना हो l

[ • प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ की संस्थापक सदस्य दीप्ति श्रीवास्तव कहानी एवं व्यंग्य लिखती हैं. लेखन में निरंतर सक्रिय हैं. • संपर्क- 94062 41497 ]
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