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रंग पर्व होली पर विशेष- कैलाश जैन बरमेचा

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सपनों की होली-यारों के यार संग
– कैलाश जैन बरमेचा
[ छत्तीसगढ़-दुर्ग ]

कल रात कुछ अजब हुआ…
मैं जैसे गहरी नींद में था,
पर मन रंगों से जाग रहा था।
लग रहा था जैसे होली आई हो —
और “यारों के यार” का आँगन
इंद्रधनुष से भर गया हो।
ढोल की थाप थी…
हँसी की खनक थी…
और हर चेहरे पर अपनापन था।
सबसे पहले दिखे
विनोद परमार और शीला परमार —
गुजराती अंदाज़ में मुस्कुराते हुए।
शीला भाभी के हाथों का ढोकला
मानो बादलों सा हल्का,
और थेपला जैसे
सूरज की गर्माहट समेटे।
“केम छो?” की मिठास में
रंग भी घुल गया था।
हर कौर में स्नेह,
हर थाली में प्रेम।
फिर आए
अमित अग्रवाल और रश्मि अग्रवाल,
संग में मिठाइयों की थाली —
गुझिया, मठरी, काजू कतली।
रश्मि दीदी हँसकर बोलीं —
“होली में मीठा कम पड़े तो
रंग फीका हो जाता है!”
साथ ही
संतोष गोयल और ममता गोयल
रंगों से ज्यादा रिश्तों को रंगते हुए।
उनकी हँसी में
सालों की दोस्ती का गुलाल था।
और तभी…
रंगों की भीड़ में
एक आवाज गूंजती है —
“अरे लाइन बनाओ… रेल बनाओ…!”
हाँ, वो ममता गोयल ही तो थीं!
ममता तो बस एक ही काम करती —
रील बनवाती…
डिस्को करवाती…
रील बनवाती…
डिस्को करवाती…
और देखते ही देखते
सातों परिवार
बन जाते एक रंगीन रेलगाड़ी —
कोई इंजन, कोई डिब्बा,
कोई सीटी बजाता,
कोई ताली बजाता।
फिर शुरू होता डिस्को —
गुलाल उड़ता,
ढोलक थिरकती,
और ममता दीदी की हँसी
पूरे माहौल को और रंगीन बना देती।
संतोष जी मुस्कुराते हुए कहते —
“होली का असली आनंद
अगर किसी ने दिलाया है,
तो वो ममता ने दिलाया है!”
और सचमुच…
उस पल लगता था
कि रंगों से ज्यादा
ऊर्जा ममता के कदमों में है।
तभी दिखे
प्रदीप पांडे और सुमन पांडे,
संस्कारों की खुशबू लिए।
अभिराम चंदन का तिलक,
और श्लोकों के संग रंगों का संगम।
होली केवल उत्सव नहीं,
एक संस्कृति है —
यह बात उनकी आंखों में चमक रही थी।
जगदीश केसरवानी और श्रद्धा केसरवानी
थाल सजाए खड़े थे,
जैसे रंगों की दुकान सजी हो।
हर रंग मानो कह रहा था —
“मिलन ही जीवन है।”
और तभी…
मेरे सपने का सबसे सुंदर दृश्य आया।
लोगों की सोच थी —
“रौनक जमाल और जरीना जमाल
शायद होली नहीं खेलेंगे…”
पर क्या अद्भुत दृश्य था!
पूरा एक हॉल सजाया हुआ,
रंग-बिरंगे गुलाल के ढेर,
मिठाइयों का भव्य बफे,
स्वागत में खुली बाँहें।
रौनक भाई मुस्कुराकर बोले —
“त्योहार दिल से होता है,
धर्म से नहीं।”
जरीना भाभी ने
सबसे पहले मेरे माथे पर गुलाल लगाया।
वह क्षण…
मानो भारत की गंगा-जमुनी तहज़ीब
रंग बनकर बह उठी हो।
और फिर मैं स्वयं —
कैलाश जैन बरमेचा और मंजू जैन
राजस्थानी रंग में रँगे हुए।
घेवर, फेणी, दाल-बाटी की सुगंध,
मंजू की हँसी में
मरुस्थल की मिठास।
हम सब साथ थे —
जाति अलग, पर आत्मा एक।
रंग अलग, पर हँसी एक।
परंपरा अलग, पर प्रेम एक।
ढोल बजा…
गुलाल उड़ा…
बच्चों की किलकारियाँ गूंजी…
और मैं इस रंगोत्सव में
पूरी तरह डूब गया।
खाते-खाते,
हँसते-हँसते,
मिठाइयों का स्वाद
दिल तक उतर गया।
अचानक…
मेरी आँख खुली।
मैं अपने कमरे में था।
न ढोल, न रंग, न हॉल।
पर पेट भरा हुआ था —
जैसे सचमुच
गुझिया, ढोकला, घेवर सब खा आया हूँ!
मैं मुस्कुराया…
शायद यह सपना नहीं,
हमारी दोस्ती का सच था —
जहाँ होली केवल रंग नहीं,
दिलों का मिलन है।
“यारों के यार”
सिर्फ एक किटी ग्रुप नहीं,
रंगों का परिवार है।
जहाँ हर होली
इंसानियत की जीत है।
[ • प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ के मुख्य संरक्षक कैलाश जैन बरमेचा जी सतत् लेखन में सक्रिय हैं. • संपर्क- 90398 79080 ]
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