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‘साहित्य सृजन परिषद्’ के तत्वावधान में आयोजित सरस काव्य गोष्ठी में डॉ. महेशचंद्र शर्मा ने कहा कि- ‘कविता और त्यौहारों से भारत विश्व विख्यात है, कवि बनना आसान नहीं’ : पं. प्रभुनाथ मिश्र ने कहा कि- ‘लड़खड़ाती राजनीति को सहारा देता है साहित्य’

👉 {बाएँ से} • नीता कम्बोज ‘शीरी’, एनएल मौर्य ‘प्रीतम’, पं. प्रभुनाथ मिश्र, आचार्य डॉ. महेशचंद्र शर्मा, सुशील यादव और डॉ. नलिनी श्रीवास्तव
• छत्तीसगढ़ आसपास
• छत्तीसगढ़ [भिलाई]
भारत पर्वों-त्यौहारों का देश है. उत्सव सबको जोड़ते हैं. होली में कोई ऊंच-नीच अमीर-गरीब और छोटा-बड़ा नहीं होता. सब गले मिलते हैं. ये टाइमपास मूंगफल्ली नहीं. हर कोई कवि नहीं बन सकता, उसके लिए साधना करनी पड़ती है. पर्वों, त्यौहारों और श्रेष्ठ काव्यों से ही हमारा देश विश्व विख्यात है. ये विचार हैं आचार्य डॉ. महेशचंद्र शर्मा के. विगत दिवस शहर की प्रतिष्ठित पंजीकृत संस्था ‘साहित्य सृजन परिषद्’ द्वारा ‘राजराजेश्वरी मंदिर’ में आयोजित होली मिलन समारोह एवं सरस काव्य गोष्ठी को मुख्य अतिथि की आसंदी से संबोधित कर रहे थे. देश-विदेश के अनेक सफल साहित्यिक भ्रमण कर चुके एवं प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ के मुख्य सलाहकार डॉ. महेशचंद्र शर्मा ने आगे कहा कि केवल तुकबंदी करना कविता नहीं है. ये रचनात्मक साहित्य साधना है. ऐसे कवि अमर हो जाते हैं.

👉 • माँ सरस्वती की पूजा अर्चना करते हुए अतिथि
काव्य गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए समाजसेवी एवं श्रमिक नेता पं. प्रभुनाथ मिश्र ने कहा कि-
साहित्य सबको जोड़ता है. होली जैसे त्यौहारों, तीर्थों और पर्वों के कारण ही भारत आज एक है. हर क्रांति कलम से शुरू होती है. राष्ट्रकवि डॉ. रामधारी सिंह दिनकर को उद्धृत करते हुए उन्होंने आगे कहा कि राजनीति जब लड़खड़ाती है तो साहित्य ही उसे सहारा देता है.
विशिष्ट अतिथि एवं ग़ज़ल संग्रह ‘दिल की कलम’ और ‘शिष्टाचार के बहाने’ आदि अनेक पुस्तकों के कवि सुशील यादव ने अपनी शायरी से श्रोताओं का दिल जीत लिया.
विशेष अतिथि एवं देश की प्रसिद्ध कथाकार डॉ. नलिनी श्रीवास्तव ने कहा कि कविता करना कठिन है. तथापि उन्होंने शिमला पर एक रोचक कविता सुनाई.
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काव्य गोष्ठी में प्रमुख रचनाकारों की प्रस्तुति के अंश-

👉 • डॉ. नौशाद अहमद सिद्दीकी ‘सब्र’ कविता पाठ करते हुए…

आई रंगों का त्यौहार होली/आओ तन-मन रंगें हमजोली/क्यों बनती हो तुम इतनी भोली/आओ खेलें भाव रंग होली..
– डॉ. नीलकंठ देवांगन
बसे अंखियों में ‘भवि’ मोहन/समझ लेना कि होली है/करे जब ये दिल पागलपन/समझ लेना कि होली है…
– शुचि ‘भवि’
मस्ती में मदहोश/सिर्फ जवानी ही नहीं यारों/बुढ़ापे दिलों में भी/तूफान उठा देता है…
– इस्माइल आजाद
बटवारा हो ना रंगों की/जो त्यौहार होली में/नजारा हो तो उल्फत का/हो चारों ओर होली में…
– डॉ. बीना सिंह ‘रागी’
देखो-देखो होली आई/दूरियाँ दिल की मिटाने आई/ऐसा त्यौहार है होली रंगों का/हर रंजिशें को मिटाने आई…
– प्रकाशचंद्र मण्डल
आइल बसंत बहरिया/बुढ़वा जवान हो गईल/बहे फागुन बय रिया/गोरी का मन मचल-मचल जाए…
– रामायण मिश्र
पिय संग होली खेलती/नवविवाहिता नारी/देख-देख सकुचा रही/नव यौवन सुकुमारी…
– नीलम जायसवाल
रोज पव्वा पीया तो पीलिया हो जायेगा/हल्दी के व्यापारियों का सगा हो जायेगा…
– डॉ. संजय दानी
फागुन के है मास महिना/जुरमिल फगुवा गाबो जी/उतरे नहीं जो चढ़ के/अईसे रंग लगाबो जी…
– सुमित्रा ‘शिशिर’
जब मुट्ठी भर फेंका उसने/उस पर गुलाल होली में/कर दिया उसने भी उसका/गाल लाल-लाल होली में…
– टीएन कुशवाहा ‘अंजन’
दुश्मन को दोस्त बना दे ये होली/इस दिन मन में बहुत निराला होता है/सारी उदासी बह जाती है रंगों में/चेहरे पे मुस्कान अल्हादित मन होता है…
– डॉ. नौशाद अहमद सिद्दीकी ‘सब्र’
होली आई खुशियाँ लाई
तन-मन में रंगों की बौछार लाई…
– प्रदीप श्रीवास्तव
बसंत शिवरात्रि और होली का दिनवा/भारत भूमि बन जाती है ‘प्रीतम’ स्वर्गवां/गोप-गोपियों के संग कृष्ण मनाएं शिवरात्रिया/और भोले बृज में संतों के संग खेलें होलिया…
– एनएल मौर्य ‘प्रीतम’
घर फुंकने की हमको इजाजत न मिल सकी/रूसवाईयों से फिर कभी राहत न मिल सकी…
– सुशील यादव
गृह नक्षत्र चांद सितारे आजमा रहे हैं/वक्त बुरा है/हमको सारे आज़मा रहे हैं…
– ओमवीर करन
एक पूरी जिंदगी जिस सोच के साये में गुजरी/आज मैं उस सोच का सच देख तिल-तिल जल रहा हूँ…
– सतीश कुमार त्रिपाठी
चरण में मन लागा/हमार प्रभु/सांवली सूरत मोहनी मूरत/देखी रूप तम भागा/हमार प्रभु…
– बुद्धसेन शर्मा
लोग गैस बिजली राशन का पैसा हार जाते हैं/शाम को दो पैग लगाते हैं/तान के सो जाते हैं…
– राकेश गुप्ता ‘रूसिया’
आयुष्मान योजना हा पोषण आहार होगे हे/डाक्टर अउ दवाखाना के रोजगार होगे हे…
– टीआर कोशरिया ‘अलकरहा’


👉 • सभागार में उपस्थित रचनाकार
इसके अलावा इनकी रचनाओं को भी सराहा गया-
नीता कम्बोज ‘शीरी’, विजय कुमार, कलावती देवी, ओशिन कम्बोज, शिल्पी दास, शंकरलाल देवांगन, बैकुंठ महानंद, पुरानिकलाल चेलक, डामनलाल वर्मा, सुरेश कुमार बंछोर ‘अभ्यार्थी’, डॉ. नरेंद्र कुमार देवांगन, मुकेश भटनागर, रविशंकर मिश्रा, अर्जुन वर्मा और सोनिया सोनी.

‘साहित्य सृजन परिषद्’ संगठन का विस्तार करते हुए छत्तीसगढ़ी कवि टीआर कोशरिया ‘अलकहरा’ को परिषद् का उपाध्यक्ष सर्व सम्मति से मनोनीत किया गया.
👉 • पं. प्रभुनाथ मिश्र उद्बोधन देते हुए…
कार्यक्रम का संचालन ‘साहित्य सृजन परिषद्’ की उपाध्यक्ष नीता कम्बोज ‘शीरी’ और आभार व्यक्त परिषद् के महासचिव ओमवीर करन ने किया.
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कार्यक्रम के अंत में बीते दिनों दिवंगत हुए ‘साहित्य सृजन परिषद्’ की उपाध्यक्ष नीलम जायसवाल की माताश्री व कवि ओमप्रकाश जायसवाल की पत्नी स्व. यशोदा देवी और हज़लकार स्व. रामबरन कोरी ‘कशिश’ की आत्मा की शांति के लिए दो मिनट मौन रहकर विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित किया गया. 🕉 शांति
[ • रपट : डॉ. नौशाद अहमद सिद्दीकी ‘सब्र’ ]
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