■कविता आसपास. ■श्यामलाल साहू.
4 years ago
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♀ जिंदगी धूप-छांव सी.
धुरी पे अपनी धरती यह
निरंतर चलती रहती है
कभी अंधेरा कभी उजाला
के खेलों को सहती है.
आज खिला है झर जाएगा
मुरझाकर निश्चय इक रोज
फूल–फूल के कानों में
तितली जा जा कर कहती है.
आज नहीं तो कल आएगा
निश्चय मधुमासों का काल
कभी कौव्वे की कॉव-कॉव
कभी कोयल कुहु-कुहु करती है.
गहराइयाँ कितनी ही नापो
तल पर आना तेरा तय है
नशा यौवन की चढ़ चढ़कर
हर बार उतरती रहती है
कब तक उड़कर नभमंडल में
अपना समय बिताओगे
गर्म हवा भी शबनम से मिल
धरती पर पग धरती है.
धन-सत्ता के बल पर प्यारे
गरमी नहीं दिखाना तुम
ज़िंदगी धूप-छॉव सी
दौरों से सभी गुजरती है.
●कवि संपर्क-
●98279 29593
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chhattisgarhaaspaas
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