■इस माह की कवयित्री. ■दिलशाद सैफ़ी.

【 रायपुर छत्तीसगढ़ की कवयित्री दिलशाद सैफी 25 वर्षों से रचनात्मक लेखन में सक्रिय हैं. देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं, लघु कथाएं,लेख प्रकाशित होते रहती है. लेखन के लिए कई मंचों से सम्मानित भी होते रहती हैं. ‘छत्तीसगढ़ आसपास’ के इस स्तम्भ ‘इस माह की कवयित्री’ में इस माह दिलशाद सैफी की तीन रचना को शामिल कर रहे हैं. अपनी राय से अवगत कराएं-सम्पादक. 】
♀ 1 जहाँ का खुदा
मैं सही तु गलत इस बात-बात पे जिरह करता है
बांटता है क्यों दिलो को मज़हबो में बता तो ज़रा
क्या ऐसा करने को तुझे तेरा खुदा कहता है
कोई डाले जो बुरी नज़र वतन पे हमारे बता तो ज़रा
खून तेरा भी खौलता है खून मेरा भी खौलता है
क्यों पालता हो बेवजह नफरत दिलो में बता तो ज़रा
होता है जो दंगा घर तेरा भी जलता,घर मेरा भी जलता है
जो खून तेरी मेरी रगो में बहता है बता तो ज़रा
क्या तेरी रगो में भगवा मेरी रगो में हरा बहता है
रब ने बनाया तुझे मिट्टी से मुझे मिट्टी से बता तो ज़रा
दफन हो मुझे मिलना है तुझे खाक हो मिलना है
कुदरत के हर शै में बसे भगवा, सब्ज रंग बता तो ज़रा
फिर क्यों तू इन्हें अलग धर्मो में बांटता फिरता है
हर धर्म की खुशबू फैली है मेरे वतन की फिज़ाओ में
अरे खुदा ने फर्क कहाँ किया दुनिया बना के बता तो ज़रा
और एक तू है जो इस जहाँ का खुदा बनता फिरता
है…।
♀ 2 जीवन और संघर्ष
संघर्ष से भरी जीवन की शाम है और
उजाले की आस लिए परेशान मैं हूँ..!!
तपती दोपहरी में चल रहा खुला सर
दो रोटीयो की जुगाड़ में मैं हूँ..!!
ठहरता तपिश से डरकर अगर
मगर पेट की अगन को बुझाने ..!!
कर रहा संघर्ष दिन प्रतिदिन
हर विपत्ति को झेलने तैयार मैं हूँ..!!
गर मैं हूँ तो मेरे अपने है,उन अपनो के
कुछ अरमान और ख्वा़हिशे हैं..!!
उनकी आँखों में चमकती ख्वा़हिशे है
उनकी सपनो को पुरा करने तैयार मैं हूँ..!!
अब न गरमी की तपिश सताती है
न बारिश मे भीगने का डर..!!
कड़कती ठंड में खुला बदन
हर मुसीबत से लड़ने तैयार मैं हूँ..!!
क्योंकि मैं आदमी हूँ, इसलिए जीवन में
संघर्ष करता हुआ जिंदगी की भागदौड़ में
गिरफ्तार मैं हूँ ..!!
♀ 3 अंदर छिपे भेड़ियें
अकसर ही हमे सुनने को
मिल जाते है
या फिर दिख ही जाते है
ये भेड़िये हमे
रात के घने अंधेरो पर
सड़को में
या फिर किसी सुनसान
गलियों पर
अपने उस शिकार की
तलाश में
चाहे वो दो साल की
दुधमुही बच्ची हो
या छ:साल की गुड़िया
बारह साल की
अबोध लड़की,नहीं तो
तीस साल की
विवाहित महिला या कोई
नहीं मिली तो
साठ बरस की वृद्ध स्त्री
क्या फर्क पड़ता है
इन्हें….””!
क्योंकि ये तो अवारा है …।
इन्हें तो सिर्फ
अपनी भूख से मतलब है
पर उन लोगों की
कैसे पहचान हो भला…??
जो हमारे आसपास
घरों के भीतर ही रिश्तोंं का
लिबास ओढ़े
दुबकें बैठे हैं,इन्हे कैसे जाने
यही तो वो असली
भेड़िये है जो दबे पाँव कब
आकर तुम्हें दबोच ले
तुम्हारे अपनो के हमदर्द बन
घड़ियाली आँसू बहा
अपने होने दिखावा करते जाए
और अंदर ही अंदर तुम्हें
दीमक की तरह खोखला कर दें
हां ये अंदर बैठे भेडिये
उन भेड़ियों से ज्यादा ख़तरनाक है
■कवयित्री संपर्क-
■88898 04412
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chhattisgarhaaspaas
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