■कविता आसपास : सुनीता अग्रवाल [ राँची ]
♀ सखियाँ मेरी
सखियाँ मेरी
सारी सखि मुझे
लगती बड़ी प्यारी है॥
दुनियाँ में ये सखियाँ
सबसे न्यारी हैं॥
नहीं बताते मन की
व्यथा तो,जाने कैसे
आवाज़ से ही मेरी
वो जान लेती
कैसी ये यारी है॥
सखियों का मेरे
जीवन में होने से ही
गुलज़ार मेरी ज़िंदगी हुई॥
सारे सपने सभी अरमान
पूरे होते जब
सखियाँ संग होती॥
दर्द तकलीफ़ मिनटों में
जाने कैसे छूँ मंतर
ये कर देती॥
उदास हो हम कभी
कहाँ से जाने यें
रौनक़ ले आती॥
नहीं कमी खलती
अपनों की
इतना अपनापन ये
सारीं मिल कर लुटाती॥
इनके होने से ही आनंद है
ज़िंदगी के हर सफ़र में
रूठ भी जाऊँ तो न जाने
कौन से हुनर से आख़िर
मना लेती हैं॥
जीवन में इनके होने से
पता नही लगता
कैसे दिन गुजरता
कैसे बीत जाती शाम है॥
नहीं कभी दिन रुकता
नहीं ठहरती शाम है।
सखियाँ ही गुलशन
ये ही गुलफ़ाम है॥
पन्नों पर उतरना इन्हें
संभव ही नहीं
दिलों में ये राज करती,
सखियों से ही जीवन है॥
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chhattisgarhaaspaas
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