■नव गीत : डॉ. दीक्षा चौबे [दुर्ग,छत्तीसगढ़]
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अंबर-आनन रंगोली से,
रूप रहा निखार
दौड़-भाग कर रहे पयोधर,
सजे वंदनवार.
झप-झप कर आँखें मटकाते ,
ग्रहों की सुन बैन ।
हलचल कैसी यहाँ मची है ,
चाँद है बेचैन ।
शित कौमुदी कादम्बरी की ,
कर रही शृंगार ।।
दीपित सिंदूरी आभा से ,
नील-पटल अनूप ।
झीने आँचल से ज्यों छन कर ,
दमके वधू रूप ।
साँझ सलोनी सकुचाती-सी ,
चल देहरी पार ।।
चाँद-सजीला बाँका छोरा ,
राजसी हैं ठाठ ।
राजदंड सप्तर्षि उठाए ,
शील का दे पाठ ।
उल्का पिंड तोड़ अनुशासन ,
दिया देश निकार ।।
उछल-उछल कर ऊँची लहरें ,
अंबर रहे झाँक ।
प्रतिबिंबित है रूप मनोहर ,
शुचि चंद्र की फाँक ।
निलय निरखने नील गगन का ,
उठ रहा है ज्वार ।।
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chhattisgarhaaspaas
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