कविता आसपास : अनुवादित रचना : पल्लव चटर्जी
•गणतंत्र की मंत्रणा
•कवि : पल्लव चटर्जी
•अनुवाद : तारकनाथ चौधुरी
[बांग्ला से हिंदी में अनुवाद]
पारदर्शी काँच से घिरा रेस्तराँ
करीने से सजे डाइनिंग टेबल्स
और मँहगे परिधानों में आये
रईसजा़दों की खि़दमत करते
ड्रेसकोड वाले बेयरे…
थोडे़-थोडे़ अंतराल में
फ़रमाईशें पूरी हो रही हैं-
पहले सादा पानी
फिर रंगीन पानी
और फिर धीरे-धीरे
लजी़ज़ पकवानों के पात्र
रखे जा रहे हैं टेबिल पर
बीच-बीच में ठहाकों की गूँज से
अपने होने का एहसास
औरों को दिलाते ग्राहक…ज़्यादातर लोगों ने रेस्तराँ की खा़स
मटन बिरयानी ,चिकेन कडा़ही और नान का ही आॅर्डर दिया हुआ है
गंभीर विषयों पर मंत्रणाएँ हो रही हैं और संकेतों में
पकवानों की तारीफें भी
काँच की दीवार के उस तरफ खडे़
गोकुल,विशाखा और लालटू
भीतर बैठे लोगों के खाने के अंदाज़ की
नकलें कर रहे हैं और असली
मुस्कुराहटें बिखेर रहे हैं
उनको यकी़न है
भीतर बैठे लोगों का जूठन
उनके हिस्से आयेगा ही
क्योंकि छोड़ना उनकी फि़तरत है
मंत्रणा होने लगी है-
गोकुल,विशाखा,लालटू के बीच
किसी और की घुसपैठ नहीं चाहते वे-
इस बँटवारे में
टाॅमी भी दुम हिलाता शामिल हो गया है अब
उनके दल में…
बारी-बारी से सबके पास जाकर
अपनी जातिगत आवाज़ में
अपना अनुरोध रख रहा है
उन तीनों को टाॅमी के शामिल होने से
ऐतराज़ नहीं है
जैसे वे रेस्तराँ के भीतर बैठे लोगों से बेहतर समझते हैं-
“समन्वित गणतंत्र को।”
•संपर्क –
•पल्लव चटर्जी : 81093 03936
•तारकनाथ चौधुरी : 83494 08210
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