लघु कथा :डॉ.अंजना श्रीवास्तव [ भिलाई छत्तीसगढ़ ]
🌸 इंतज़ार
आज मैं वृद्धा आश्रम के गेट पर अंदर से लगा ताला देखकर अचंभित हो गई। मुझे ताज्जुब ताज्जुब हुआ क्योंकि मैं अक्सर आश्रम में जाकर कुछ समय वृद्धों के साथ गुजारती हूं। उनके साथ कुछ भावनात्मक पहलुओं पर बात करती हूं। उनके दुखों को कुछ पल दूर करने का प्रयास करती हूं। मगर आज अंदर से ताला क्यों लगा दिया गया?
मैंने आवाज लगाई। आज अंदर से ताला क्यों लगा दिया है। चौकीदार तुरंत दौड़कर आया और ताला खोला । मैंने चौकीदार से पूछा ताला क्यों लगा रखा है। चौकीदार ने एक महिला की तरफ देख कर बोला- यह औरत गेट खोल कर भाग जाएगी। मैंने पूछा- क्यों?
चौकीदार बोला- इसकी बेटियां इस आश्रम में छोड़कर चली गई है।
मैंने उस महिला को ध्यान से देखा। वह कुछ भुनभूना रही थी । मैंने उससे पूछा- कैसी हो दाई? वह बोली अच्छी हूं। उसने मुझे गहरी निगाहों से ऊपर से लेकर नीचे तक ध्यान से देखा। फिर गेट की तरफ देखने लगी। बोली- मेरी बेटियां आने वाली है।
मैं आगे बढ़ गई। अन्य मां और बाबा से बात करने लगी परंतु मेरा ध्यान उसी महिला पर था। मेरा दिमाग उसके चेहरे को देख रहा था। मैं फिर उसके पास गई और बोली- चलो पहले खाना खा लेते हैं। थोड़ी देर में बेटियां आ जाएंगे। वह बोली- नहीं मैं खाना नहीं खाऊंगी जब तक तेरी बेटियां नहीं आ जाएगी।
आश्रम में सब लोग भोजन कर रहे थे। मैंने कई बार उससे आग्रह किया। मगर वह शून्य सी गेट की तरफ देखती रही। उसकी निगाहें बेटियों को ढूंढ रही थी। उसको सिर्फ बेटियों का इंतजार था। उसे इस बात का एहसास नहीं था कि बेटियां अब नहीं आएंगी।
मैं भी अपने कदम घर जाने के लिए बढ़ाने लगी। मुझे उसके दर्द, वेदना, पीड़ा का एहसास हो रहा था। मैंने एक बार फिर पलट कर देखा जैसे वह मुझसे याचना कर रही हो मेरी बेटियों को बुला दो,,, मेरी बेटियों को बुला दो। और मैं खामोश आगे बढ़ गई।
•संपर्क –
•99819 23250
🌸🌸🌸🌸🌸🌸
chhattisgarhaaspaas
विज्ञापन (Advertisement)