साहित्य : लघुकथा : शुचि ‘ भवि ‘ [भिलाई छत्तीसगढ़]
🌸 संस्कार
“देख कर नहीं चल सकते, अँधे हो क्या?तीन एक ही बाइक पर, वो भी रॉंग साइड और बिना हॉर्न बजाए,…” सड़क पर औंधे पड़े विशाल ने ज़ोरदार डाँट लगाई। विशाल ज़ख्मी हालत में ही अपने मोबाइल से बाइक की फ़ोटो खींचने लगा उसकी नम्बर प्लेट पर फोकस कर, और अपनी टूटी हुई दुपहिया को भी तस्वीरों में क़ैद करने लगा। बाइक से तीन युवक उतरे, विशाल की गिरी गाड़ी को सड़क के किनारे लगाए और विशाल को उठाते हुए बोले, भैया हमने ग़लती नहीं गुनाह किया है, मगर माता पिता के संस्कारों का अपमान नहीं करेंगे, हम नहीं भागेंगे, आपकी गाड़ी भी ठीक करा देंगे, और आपको डॉक्टर को दिखाकर आपके इलाज का ख़र्च भी यथासामर्थ्य वहन करेंगे।
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🌸 झुलसता बचपन
आज उन्नति फिर से चीख़ रही थी,
“पापा जाने दो, जो करती हैं करने दो, हमें क्या, हमें नहीं खाना उनके हाथ का पका खाना”। प्रवेश भी अपनी बेटी की इस हरकत पर ख़ुशी से फूले नहीं समा रहे थे।”तुम्हारी माँ की अक़्ल ठिकाने लाने के लिए यह ज़रूरी भी है।अरे ट्रांसफ़र रुकवा नहीं सकती क्या मेरा, इतने बड़े ओहदे पर है, मगर नहीं, उसूल पति और बेटी से बढ़कर हैं न”।
सुमित्रा ने आठवीं में पढ़ रही उन्नति से पूछा कि क्या गृह कार्य मिला है, लाओ दिखाओ, और वह उसके बैग से कॉपी निकालने लगी।उन्नति से अपनी माँ के हाथ से कॉपी छीनते हुए कहा, आप रहने दो न, अपना ऑफ़िस और अपना काम देखो।पापा हैं मेरे साथ, मुझे आपके ढोंग की ज़रूरत नहीं। मामा हाइकोर्ट में हैं मगर आपके खानदान वालों को क्या फ़र्क़ पापा के सुख दुख से”।पिता की ग़लत शय में झुलसता बचपन देख कर भी सुमित्रा कुछ उपाय कर पाने में कितनी असमर्थ थी आज। तभी सुमित्रा ने बजता हुआ सेल फ़ोन उठाया और दूसरी तरफ से आवाज़ आयी, मैडम जी आपने जो हमारे गाँव में कन्या स्कूल खुलवाया था न, उसी में पढ़ी गाँव की एक बच्ची आज कलेक्टर बन गयी है और आपसे मिलना चाहती है।
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