साहित्य : कविता आसपास : डॉ. प्रेमकुमार पाण्डेय [केंद्रीय विद्यालय, वेंकटगिरी, आंध्रप्रदेश]
🌸 चाँद और रोटी
आज एक सूखे पेड़ की
सबसे ऊंची टहनी पर
मैं टांग आया
दूधिया चांद
जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि
देश में कोई भूखा न सोए।
इक्कीसवीं सदी में
पानी युद्ध होगा
दूरदृष्टा की तरह
बेहतरीन एप्पल फोन से
प्यासी नदी में
सोती नाव का चित्र उतार
सोशल मीडिया पर डाला
जल और यातायात की
समस्या से निजात पाने ।
समस्याएं बड़ी नहीं होतीं
बस आपका
उदारता , कल्पनाशीलता
वैज्ञानिकता और
वक्-जाल पर
दृढ़ से दृढ़तम अभ्यास हो।
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🌸 संबंध
कल बाज़ार में
एक सहकर्मी से मुलाकात हुई
वे नन्ही बच्ची के साथ
नई चप्पल सीने से लगाए
खिलती उतर रही थी सीढ़ियां
मानों चढ़ रही हो
पाने परी लोक।
मेरी टटोलती निगाहों को ताड़
उन्होंने छूटते ही बताया
बहन है
मैं उम्र के कुलाबे मिला ही रहा था
उन्होंने स्थिति साफ़ की
मेरे चाचा की लड़की
पिता के सबसे छोटे भाई की।
सम्बन्धों का जीवित रहना
देता है सुकून
जैसे फूलों का खिलना
माली का पानी का पाइप पकड़ना
कांट-छांट पर भी मुस्कुराना।
आनन्द और दूना हो जाता है
जब कोई किसी का
थामता है हाथ
पार कराया सड़क
परोसता है थाली
बिना किसी खून के संबंध के
जैसे नर्स मुस्कुराती है
हरी चादर पर एक अंजान के
सिर पर हाथ रखते हुए।
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🌸 नदी और प्याऊ
प्रेम धीरे-धीरे
होता जा रहा है क्षीण
ठीक नदी की तरह।
चिलचिलाती दोपहरी में
थके हारे पथिक वास्ते
बिछाता था पलक पांवड़े
जगह-जगह प्याऊ
लाल चूनर ओढ़े
अब कोई नहीं करता इंतज़ार
अमृत कलश ढालने को।
ड्राइंगरुम की अनपढ़ी
सज्जित बुक सेल्फ की
दरार में
गौरैया नहीं रखती तिनका
बंद है आवागमन
हवाओं का।
घाटियां विस्मित
स्रोत हैं सूखे
प्रवाह मंद
छीजती जा रही है नदी
आहिस्ता-आहिस्ता
संवेदना की तरह।
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•संपर्क –
•98265 61819
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chhattisgarhaaspaas
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