साहित्य : कविता आसपास : रंजना द्विवेदी [रायपुर छत्तीसगढ़ ]
🌸 स्त्री एक रूप अनेक
अनुरुक्त रूप लेकर
अमृत तुल्य हो जाती है
विरक्त रूप धर वह
पल में विष बन जाती है
वही स्त्री कहलाती है
शरदकालीन अमृतमयी
ज्योत्सना बन वह
विषाद के घन घटाओ से दूर ले जाती है
वही स्त्री कहलाती है
जिसके पुण्य स्पर्श मात्र से
दरिद्र की कुटिया पावन हो जाती है
स्वार्थमयी पृथ्वी की
कलुष कालिमा जो मिटाती है
वही स्त्री कहलाती है
घर के कोने कोने मे होकर भी
उसका कोई अपना घर नहीं होता
सबको संभालती है
सहेजती है हर तिनका बटोरती है
तमाम उधड़नो की तुरपाई करते करते
वह खुद ही उधड़ कर रह जाती है वही स्त्री कहलाती है
सबका दर्द महसूस करती
खुद का दर्द भूल जाती है
जीवन के रंगमंच पर विविध किरदार निभा वह
निज का अस्तित्व मिटाती है
वही स्त्री कहलाती है
सबका साथ निभाती है वह
हमदर्द हमराह बन जाती है
अफसोस,उसके जीवन का कोई
हमसफर नहीं होता
अकेले ही संघर्षपथ पर चलती जाती है
नए सिरे से फिर वह
नए आयाम बनाती है
वही स्त्री कहलाती है,,
•संपर्क –
•97557 94666
🌸🌸🌸🌸🌸🌸
chhattisgarhaaspaas
विज्ञापन (Advertisement)