दो व्यंग्य रचना : दीप्ति श्रीवास्तव [जुनवानी भिलाई, जिला – दुर्ग छत्तीसगढ़]
▪️ जादुई शाम
कौन कहता है शाम नीरस होती है , हमने तो सुना शामें रंगीन होती है । ये लो जनाब अब और भी नयापन शाम के साथ जुड़ गया जादुई शाम ….। इस शब्द के जुड़ने से हम नहीं अब शाम ही शर्माने लगी ,कहीं हसी शाम शबाब पर होती है, तो कहीं शाम को बारह बजे जवानी चढ़ने लगती है । अब हम यह तो नहीं जानते आखिरकार वे है कौन लोग ? जिन्हें शाम का खुमार अलसाई निशा की मदहोशी पर चढ़ता है । यह सीढ़ी से चढ़ने वाली चीज तो है नहीं बल्कि शाम की सीढ़ी बना लोग अपना काम निकालने या बनाने उसका उपयोग करते हैं । एक साहब की फाइल फंस गई फिर तो एड़ी चोटी का जोर लगाया तब जाकर इस सीढ़ी से रास्ता फाइल तक पहुंच गया और फाइल का दरवाजा रूपी पेज की तीमारदारी कर खटाखट किशोरों जैसे चलते हुए आगे बढ़ गई और लौटकर साहब की तकदीर बना गई । यही तो कमाल होता है इन शामों का जब शबाब पर होती है तब आंखों में सपने जगाती हैं जिन्हें पूरा करने शाम को इत्र लगा रंगीन बनाने का काम करते हैं चालक मनुज । वही बनते हैं जनता के रखवाले । इन रखवालों का दिन सफेद कपड़ों की जिल्द चढ़ा होता और शाम आते आते जिल्द अपने कवर से बाहर आने बेताब होती है । कभी कभी सफेद कपड़ों की जिल्दों के नाम होती कुत्सित शामें जिन्हें नाम दिया जाता रंगीन शामें ।
बेचारे आम आदमी की शाम तो सब्जी-भाजी में जूझते हुए बीतती एक-एक पैसा दांत में पकड़ खर्चा करना पड़ता तब जाकर महीने में दाल आटे का भाव बराबर बैठता है वरना हर शाम नीरस सी गुजरती हुई टेलीविजन या मोबाइल से बिताने की मजबूरी होती। जब कभी अचानक से कुछ पैसा हाथ आता या दीपावली बोनस मिलता शाम जादुई बन कुछ खरीदारी कर मन का करने की आजादी व प्रसन्नता हिलोरें मारती । वह छोटा सा एमआउंट झोली में खुशियों का सैलाब लाकर परिवार और परिस्थितियों से थोड़ा सा सुकून दे जाता है ।
आजकल के किशोरों की शामें ही दिन होती है हमारा जमाना था जब ‘जल्दी उठना जल्दी सोना । जीवन के लिए है सोना-सोना ।’ जमाना बदला कहावत भी बदल गई जब सोना यानि कनक समय के साथ ऊंचाई नाप सकता है । तब कहावत क्यों नहीं बदल सकती । युवाओं का दिन चढ़ता बारह बजे से जैसे रागों के गाने का पहर निर्धारित होता है । वैसे ही आज की पीढ़ी का दिन चढ़ता है बारह बजे नींद से उठने के साथ, खाने पहनने की आदतों का अब क्या बोले ! उनको कहेंगे शाम नशीली होती है वे सीधे अर्थ निकालेंगे मद्म पदार्थ से न कि श्रृंगार रस से । युवतियों को अब भाता बड़ा श्रृंगार , महंगे-महंगे ब्रांडेड मस्करे लिपिस्टिक में पैसा पानी की तरह बहाती । तन के लिए पौष्टिक न सही पिज्जा बर्गर की कैलोरी स्तर की मानती । उनकी शामें अब पूर्वज पीढ़ी सी नहीं रही यह जादुई शामें उनकी दादी नानी की अथक परिश्रम का परिणाम है जिसमें मिली उन्हें आजादी स्वतंत्रता।
अब उन्हें समझना होगा स्वतंत्रता और स्वच्छंदता में अतंर जिससे भविष्य की आने वाली पीढ़ी को दे सकेगी सही दिशा और बेहतरीन शामें।
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▪️ चांदनी रात
इस चांदनी रात के कहने ही क्या पहले ही चांदनी अपना अर्थ बताते हुए भावुक हो उठी नाजुक मासूम सुन्दर शांत । यह तो नारी के लिए उपमा होती है किसी पुरुष के लिए सुना है चांदनी पुरुष । अरे जरा बोल कर तो देखिए हंसी के फव्वारे छूट पड़ेंगे । मन-मन भर बोरे हंसी के उड़ेले जायेंगे । लो भैया अब कोमल सुकुमार पुरुष को चांदनी कहकर सम्बोधित कर रहे हैं । हमारी फिल्मों में तो ऐसे हीरो को चाकलेटी हीरो के खिताब से नवाजा गया है। क्या पता जब स्त्री पुरुष की बराबरी कर पतलून कमीज पर उतर आई तो पुरूष पीछे क्यों रहे । वह भी चार घंटा मेकअप करा चांदनी पुरुष कहलाने की इच्छा रखता हो ।
चांद की चांदनी की अपनी खूबसूरत कलाएं होती है जब वह हर दिन अंगड़ाई लेकर कलाएं बदलती है तब चांदनी रात और खूबसूरत हो जाती है । दूज का चांद हो जी तुम… जुमले अधरों पर सज जाते हैं कभी-कभी मक्खन पालिश के लिए समर्पित होता है । यह कहने वाले का दिल जानता है कि मन पर पत्थर रख लबों को जुबान दी है।
चतुर्थी वह भी जब गणेश की पूजा अर्चना वाली रात किसी ने चांद के दीदार कर लिया तब महापाप सिर पर आ जायेगा । तभी तो गणेश चतुर्थी के दिन चांद की ओर से हम नजरें फेर लेते हैं । यह तो अपना अपना नजरिया होता है दुश्मन से पंगा ले या भीगी बिल्ली बन रास्ता न काटें।
वहीं करवाचौथ का चांद अपनी चांदनी से प्यार का इकरार करवाता है । सजे-धजे जोड़े रात में चांद को अर्ध्य देते प्यार से अपने रिश्ते की गांठ मजबूत करते हुए पवित्र अहसासों में भर जाते हैं। कितना महत्वपूर्ण हो उठता है चांद उस दिन उनके जीवन में पत्नी के लिए पति चांद तो पति के लिए पत्नी चांदनी । इस गठबंधन से चांदनी रात में रूहानी दुनिया बन धरातल पर आ उनके पावस बंधन को अलौकिक बना कहने मजबूर करती है चांदनी रात में इकबार तुम्हें देखा है । अजी अपनी पत्नी को बार-बार देख अघा जाते हैं मगर घर में रहना भी तो है।
चौदहवीं का चांद तो अपने ऊपर गाना ही बनवा दिलों में जगह बना लिया चौदहवीं का चांद हो तुम या अफताब…
इस चांदनी रात के किस्से बुनते सुनते प्रेमी चातक पक्षी की माफिक हो गये ।
जब हम छोटे थे तब घरों के आंगन बड़े-बड़े हुआ करते थे । बिजली भी कई-कई दिनों तक बिना बताए भाग जाती थी अपने मायके । तब हम बच्चों की फौज गर्मी की चांदनी रात में आंगन में खूब धींगामुश्ती करती । बड़े बूढ़े आंगन में रस्सी की चारपाई पर हमसे अपना शरीर खूंदवाते हुए चांदनी रात का आनंद लेते । यादों में बसी है वे चांदनी रातें । होती तो अब भी है चांदनी रात उस पर आधुनिकता का नकाब पहना कर चांदनी बिखेरने से आनंद लेने वाली टोली नदारद है। मोबाइल टेलीविजन ने उसकी दुनिया में वीरानापन भर दिया है। आज चांदनी रात रो रो कर सोशल मीडिया को कोस रही है। इसी ने मेरा महत्व गिरा दिया।
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chhattisgarhaaspaas
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