कविता आसपास : सुनीता अग्रवाल [राँची, झारखंड]
▪️ सखी पनघट आई है
करके बहाना पानी का
सखि पनघट पर देखो आई है।
आई है सखि,आई है
हरि को देखने आई है।
कर के बहाना पानी का।
देखा उसने जब कान्हा को
कान्हा थे खड़े मुसकाय रहे।
मुसकाए रहे हरि मुसकाए रहे,
थे श्याम बड़े हर्षाये हुए॥
कर के बहाना पानी का
सखि पनघट पर देखो आई है।
कान्हा तो है कृष्ण मुरारी
कृष्ण मुरारी है वो गिरधारी
सुन गिरधारी मेरे बनवारी
सूरत तेरी मुझे लगे प्यारी।
कर के बहाना पानी का
सखि पनघट पर देखो आई है।
छलिया है वो नटखट है वो
फोड़ दी उसने मटकी मेरी।
मटकी फोड़ी मेरी मटकी फोड़ी
और भीगा दी चुनरी मेरी॥
कर के बहाना पानी का
सखि पनघट पर देखो आई है।
सारे जग का स्वामी है वो
राधे को देखने को तरसता है।
तरसता है वो तड़पता है वो
राधे राधे नित जपता है॥
करके बहाना पानी का
सखि पनघट पर देखो आई है।
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▪️ गुलाब
नाज़ुक है वो है मासूम भी,
मुझको ख़ूब रिझाता भी,
नख़रे उसके बड़े लाजवाब,
क्या सखि साजन! ना सखि गुलाब।
गुँथ बालों में मेरे ये इतरावे,
देवों को भी ये ख़ूब लुभावे,
लगता नहीं कभी यह ख़राब।
क्या सखि साजन! ना सखि गुलाब।
ढूँढती जिसको मेरी नज़र है,
न दिखे तो होती फ़िकर है,
पाने को जिसको हर कोई बेताब,
क्या सखि साजन! ना सखि गुलाब।
अदायें उसकी है निराली,
घटा में है उससे ही हरियाली,
ग़ज़ब है उसका हुस्न-ओ-शबाब,
क्या सखि साजन! ना सखि गुलाब।
हर नज़र तलबगार है उसकी,
हर कोई का सपना है वो,
है जैसे कोई खुली किताब,
क्या सखि साजन! ना सखि गुलाब।
निहारती जिसको शाम-सवेरे,
बिन उसके सारे साज अधूरे,
नशा भी उसमें जैसे शराब,
क्या सखि साजन! ना सखि गुलाब।
चाँद सा चमकता भी वो,
किताबों में रखी याद है वो,
रूप जैसे हो कोई आफ़ताब,
क्या सखि साजन! ना सखि गुलाब।
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•संपर्क –
•76774 57423
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chhattisgarhaaspaas
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