कविता आसपास : डॉ. प्रेमकुमार पाण्डेय [केंद्रीय विद्यालय, वेंकटगिरी, आंध्रप्रदेश]
▪️ विडम्बना
पुरुष को मालूम है
राकेट साइंस
गोली चलने से पहले ही
कर लेता है जांच पूरी
लजा जाती है सी बी आई ।
हर पुरुष को मालूम है
पी एम ओ में क्या चल रहा है यूक्रेन युद्ध का नतीजा,
भविष्य वक्ता भी भरते हैं पानी।
अगर कुछ नहीं मालूम है तो
खिचड़ी कैसे बनाते हैं?
नमक कितना पड़ेगा साग में
पानी में चावल डालते हैं या
चावल में पानी
फटे में नहीं कर सकता
तुरपाई और बखिया।
पत्नी के प्रस्थान के बाद
पुरुष जाता है मर
होता है पैरासाइट
जीने के लिए
उसे चाहिए
एक रस भरा दरख़्त
जिससे लिपट और लहरा सके
सांस लेने के लिए
उसे चाहिए मां
बहन,बेटी और पत्नी
जिससे वह अकड़ सके
जहांपनाह की तरह।
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▪️ पुस्तकें
पैसे नहीं
तब खरीदते थे किताबें
सूंघते,चाटते
सजाते,दिखाते
बतियाते
नेहरू की तरह
कोट पर सजाते
बना गुलाब
पेट काट-काट कर।
पैसे से ऊबचूभ
पेट किताबों से बड़े
सीने छोटे
कलमकार लिखते
छपाते
खुद को ही पढ़ते
समाज की कौन कहे?
खुद को खुद ही गढ़ते ।
सुनने वालों की भीड़ में
पढ़ने वालों का टोटा है
घर बड़ा
मन बहुत , बहुत छोटा है।
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▪️ अनुभूति
भीनी खुशबू घुलते
स्मृतियों के साथ
कपाट न खुलें
ड्योढ़ी पार मत करना।
पदचाप की रुनझुन
ध्वनि-कर्ण बीच क्षणिक बाधा
दो नयन तत्पर न दिखें
ड्योढ़ी पार मत करना।
ड्योढ़ी स्पर्श
कपाट खुलने बीच
रंचमात्र भी व्यतिरेक
ड्योढ़ी पार मत करना।
सोना कसने दो
उतर चुका हूं कितना
सरोवर-सीढ़ियां
कितनी बाकी है कसर
एकाकार में।
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•संपर्क –
•98265 61819
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chhattisgarhaaspaas
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