साहित्य आसपास : दीप्ति श्रीवास्तव [भिलाई छत्तीसगढ़]
🌸 अचार
मौसम आया आम का
अचार बनाने की जुगत में लग गई हूं
स्वयं के हाथ के अचार में
मां के जैसे बनाये अचार का स्वाद उतारने में लगी हूं
हां अब मैं मां जैसा बनने लगी हूं
वैसे ही रिश्तों में कशिश महसूस करने लगी हूं
अब समझदार हो चली हूं
रिश्तों का बसअचार बना
सहेजने लगी हूं
जो भी बातों में नमक मिर्च लगा
परोसता है
उसे दिल के मर्तबन में भर ऊपर से कपड़ा लपेट
अंधेरे कोने में डालने लगी हूं
समय आने पर मर्तबन खोल
परोस देती हूं
जी की भड़ास निकाल बी.पी.
नार्मल कर लेती हूं
अब मैं भी अचार के आम की तरह परिपक्व होने लगी हूं
समय की चेरी जो पड़ बातों का अर्थ समझने लगी हूं
रिश्तों को प्रिजर्व करने तेल मालिश करना सीख गई हूं ।
अचार में पड़े नमक सी खरी हो गई हूं
तेज सही पर अपनों से अपनत्व बनाना सीख गई हूं
मसालों और फांकों से मिलावटी
स्वाद बनाना सीख गई हूं।
स्नेह पात्र का स्वाद बनना जान गई हूं
अचार है तो भोजन में
ज़ायका है
रिश्ते हैं तो खुशहाली है
पुराना आम का अचार और
पुराना रिश्ता विश्वसनीय होता
अचार की तासीर मुंह से है लार टपकाती
मधुर रिश्ते जिंदगी में
भीनी खुशबू है लातें
•संपर्क –
•94062 41497
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chhattisgarhaaspaas
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