कविता आसपास : रंजना द्विवेदी { रायपुर छत्तीसगढ़ }
3 years ago
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🌸 मेरा तुम्हें इतना समझना
क्या काफी न था….
मेरा तुम्हे इतना समझना
क्या काफी न था
और क्या समझना बाकी था
मुझे लगा हम बखूबी समझते है
एक दूसरे को किंतु
हर रोज एक नया पन्ना खुल जाता है
हमारे दरमिया और फिर से हो जाते हैं अनजान
नए सिरे से फिर कोशिश करती हूं
तुम्हे समझने की
एक नई आकृति बना लेती हू तुम्हारी
अपने अंतकरण में और फिर पूजने लगती हूं
क्यों हर बार तुम्हे अपने प्रेम का
प्रमाण मैं दू
हर बार अपनी सत्यता क्यों मैं
प्रमाणित करु
तुम्हे भरोसा था ना मुझ पर
फिर आज क्यों तुम्हारा भरोसा
डगमगा जाता है
मेरी हर बात पर एक प्रश्न चिन्ह लग जाता है
क्यों हमारे प्रेम को इतना गिरा देते हो
रोज पढ़ती हूं तुम्हे नए सिरे से
लगता हैं अच्छे से जानती हु तुम्हे
हर बार की तरह मैं अनुत्तीर्ण रह जाती हूं
•संपर्क –
•97557 94666
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chhattisgarhaaspaas
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