5 जून पर्यावरण दिवस पर विशेष रचना : शुचि ‘ भवि ‘

•विश्व पर्यावरण दिवस
सुनो
चीत्कार तुम भी तो सुनो
मैंने सुनी है
वृक्ष की है
अश्क,ज़ख़्म,फ़ुगां
सब देखे आज मैंने उसके
तुम भी तो देखो,,
अकेला बचा है आज वो
कल काट ले गए उसके साथियों को
छोड़ दिया इसे
काम का नहीं है अब ये
तना भी बूढ़ा
फल भी नहीं
फूल भी नहीं अब
सुनो
बूढ़े तो तुम भी होते हो न
अजर तुम भी नहीं
मगर वारिस अपना चाहते
पुश्तें चलनी चाहिए तुम्हारी
और इसका क्या
इसके वंश का क्या
कौन करेगा इसकी चिंता
सुनो
कह रहा देखो
रो कर आज
फल खिलाए थे इसने
तुम्हारे परदादा को
लगाया था उन्होंने इसे
अपने बचपन में
और तुमने
अपने पिता द्वारा लगाए
वृक्षों को भी काट दिया
मकान बड़ा जो करना था
मगर जब छाया ही नहीं होगी
स्नेह की,आशीष की
तो कैसे फलेगा ये मकां तुम्हें
सुनो
चलो न
चुप कराते हैं उसे
थोड़ा हँसाते हैं न उसे
एक नन्हा वृक्ष लगाकर
उसका वारिस दिलाते हैं उसे,,,

•संपर्क –
•98268 03394
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chhattisgarhaaspaas
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