5 जून विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष रचना : एन एल मौर्य ‘ प्रीतम ‘
•विरासत
मरुस्थल में अकेला मानव
जिसके चारो तरफ
शवों का अम्बार लगा था
कुल्हाड़ी से अपने ही सिर पर
वार कर रहा था
/पापी हूं, संसार में जीने का
मुझको कोई अधिकार नहीं है/
ऐसा कह चिल्ला रहा था
कांपती डोलती एक बुढ़िया आई
सिर पर हाथ फेरते बोली —
/बेटा तुम कौन इस निर्जन में
क्यों मचा रहे रूदन
क्या यहां पर फिर से कोई
महाभारत, कलिंग युद्ध हुआ है
या कोई आतातायि किया है धारासायी/
वह बोला -/नहीं -नही यहां कोई युद्ध नहीं हुआ है/
/तो क्या इन लाशों का अम्बार
तुमने किया है संघार/
वह बोला -/हां -हा
मैं हूं इन लाशों का जिम्मेदार
वनों को काट पत्थरों को तोड़
मानव को रोटी दिया है
जलचर थलचर नभचर
लाखों प़जातियां विलूप्त हो गई है
विरान धरती मरी नदियां विषैले सागर
क्या हम यही विरासत छोड़ जायेंगे
आने वाली पीढ़ियों के लिए —
सारी पृथ्वी प़दूषण से भर गई है
आदमी मरणासन्न में पहुंच गया है
पृथ्वी मानव रहित हो जायेगी
इसकी मैनें कभी कोई
कल्पना ही नहीं की थी/
तब बुढ़िया बोली -/
वसुधा को नाश करने का सरजाम जूटा
विश्व मानव बारुद के ढेर पर बैठा
खुद के खोदे कब़ में पैर लटका
मजे से हिला रहा है
मानों यही सृष्टिकर्ता है
गर्व से इठला रहा है
मैं वो ही धरा हूं जिसका हृदय
मानव छ्लनी कर रहा है/
वह वसुंधरा का पैर पकड़
रुदन करते हुए कहा –
/मां मानव सभी प़ाणियों को बचा लो/
वह बोली -/
गर बचाना चाहता है
मेरे अस्तित्व और अपने वंश को
तो जा —
नदियों सागर को और गंदा होने से रोक
ज़हर उगलते कल कारखानों को बंदकर
दिन प़तिदिन होते दोहन को रोक
जो कर रहे हैं वनों का विनाश उनको टोक
क्या ऐसा कर सकता है/
वह शांत स्वर में बोला –
/नहीं अब ये संभव नहीं है
दोहन की प़क़िया इतनी तेज हो गई है
सागर के नीचे शिखरों के उपर
ग़ह नक्षत्रों पर क्षण प़ति क्षण
दोहन के खोज की प़क़िया हो रही है
अब इनको रोकना असंभव है/
/तो जा अधिक से अधिक पेड़ लगा
जो तुमने विनाश कर डाला है/
उसने तत्क्षण प़तिज्ञा की –
/वसुधा को वनों से आच्छादित कर
विश्व मानव को अमर करना है
आने वाली पीढ़ियों के लिए
शुद्ध हवा विशुद्ध पानी
विरासत में यही छोड़ना है /
•कवि संपर्क –
•83197 23617
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chhattisgarhaaspaas
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